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सम्पूर्ण सुन्दरकाण्ड (श्रीरामचरितमानस पंचम सोपान - गीताप्रेस गोरखपुर सविस्तार सटीक)

सम्पूर्ण सुन्दरकाण्ड (श्रीरामचरितमानस पंचम सोपान - गीताप्रेस गोरखपुर सविस्तार सटीक)

Sampoorna Sundarkand of Ramcharitmanas

गोस्वामी तुलसीदास (गीताप्रेस गोरखपुर) द्वारा

DevanagariHindipublished128 पृष्ठ

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पृष्ठ 48

४८ * श्रीरामचरितमानस *
डालते हैं, उनका दूत कहीं बन्धनमें आ सकता है? किन्तु प्रभुके
कार्यके लिये हनुमान्‌जीने स्वयं अपनेको बँधा लिया॥ २॥
कपि बंधन सुनि निसिचर धाए।
कौतुक लागि सभाँ सब आए॥
दसमुख सभा दीखि कपि जाई।
कहि न जाइ कछु अति प्रभुताई॥ ३॥
बंदरका बाँधा जाना सुनकर राक्षस दौड़े और कौतुकके लिये
(तमाशा देखनेके लिये) सब सभामें आये। हनुमान्‌जीने जाकर
रावणकी सभा देखी। उसकी अत्यन्त प्रभुता (ऐश्वर्य) कुछ कही
नहीं जाती॥ ३॥
कर जोरें सुर दिसिप बिनीता।
भृकुटि बिलोकत सकल सभीता॥
देखि प्रताप न कपि मन संका।
जिमि अहिगन महुँ गरुड़ असंका॥ ४॥
देवता और दिक्पाल हाथ जोड़े बड़ी नम्रताके साथ भयभीत
हुए सब रावणकी भौं ताक रहे हैं। (उसका रुख देख रहे हैं।)
उसका ऐसा प्रताप देखकर भी हनुमान्‌जीके मनमें जरा भी डर
नहीं हुआ। वे ऐसे निःशङ्क खड़े रहे, जैसे सर्पोंके समूहमें गरुड़
निःशङ्क (निर्भय) रहते हैं॥ ४॥
[दोहा २०]
कपिहि बिलोकि दसानन बिहसा कहि दुर्बाद।
सुत बध सुरति कीन्हि पुनि उपजा हृदयँ बिषाद॥
हनुमान्‌जीको देखकर रावण दुर्वचन कहता हुआ खूब हँसा।