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सम्पूर्ण सुन्दरकाण्ड (श्रीरामचरितमानस पंचम सोपान - गीताप्रेस गोरखपुर सविस्तार सटीक)

सम्पूर्ण सुन्दरकाण्ड (श्रीरामचरितमानस पंचम सोपान - गीताप्रेस गोरखपुर सविस्तार सटीक)

Sampoorna Sundarkand of Ramcharitmanas

गोस्वामी तुलसीदास (गीताप्रेस गोरखपुर) द्वारा

DevanagariHindipublished128 पृष्ठ

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पृष्ठ 46

४६ * श्रीरामचरितमानस *
कपि देखा दारुन भट आवा।
कटकटाइ गर्जा अरु धावा॥२॥
इन्द्रको जीतनेवाला अतुलनीय योद्धा मेघनाद चला। भाईका
मारा जाना सुन उसे क्रोध हो आया। हनुमान्‌जीने देखा कि
अबकी भयानक योद्धा आया है। तब वे कटकटाकर गर्जे
और दौड़े॥२॥
अति बिसाल तरु एक उपारा।
बिरथ कीन्ह लंकेस कुमारा॥
रहे महाभट ताके संगा।
गहि गहि कपि मर्दइ निज अंगा॥३॥
उन्होंने एक बहुत बड़ा वृक्ष उखाड़ लिया और [उसके
प्रहारसे] लंकेश्वर रावणके पुत्र मेघनादको बिना रथका कर दिया
(रथको तोड़कर उसे नीचे पटक दिया)। उसके साथ जो बड़े-
बड़े योद्धा थे, उनको पकड़-पकड़कर हनुमान्‌जी अपने शरीरसे
मसलने लगे॥३॥
तिन्हहि निपाति ताहि सन बाजा।
भिरे जुगल मानहुँ गजराजा॥
मुठिका मारि चढ़ा तरु जाई।
ताहि एक छन मुरुछा आई॥४॥
उन सबको मारकर फिर मेघनादसे लड़ने लगे। [लड़ते हुए
वे ऐसे मालूम होते थे] मानो दो गजराज (श्रेष्ठ हाथी) भिड़ गये
हों। हनुमान्‌जी उसे एक घूँसा मारकर वृक्षपर जा चढ़े। उसको
क्षणभरके लिये मूर्च्छा आ गयी॥४॥