सम्पूर्ण सुन्दरकाण्ड (श्रीरामचरितमानस पंचम सोपान - गीताप्रेस गोरखपुर सविस्तार सटीक)

सम्पूर्ण सुन्दरकाण्ड (श्रीरामचरितमानस पंचम सोपान - गीताप्रेस गोरखपुर सविस्तार सटीक)
Sampoorna Sundarkand of Ramcharitmanas
गोस्वामी तुलसीदास (गीताप्रेस गोरखपुर) द्वारा
DevanagariHindipublished128 पृष्ठ
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- सुन्दरकाण्ड * ३५
सीता मन बिचार कर नाना।
मधुर बचन बोलेउ हनुमाना॥ २॥
[वे सोचने लगीं—] श्रीरघुनाथजी तो सर्वथा अजेय हैं, उन्हें
कौन जीत सकता है? और मायासे ऐसी (मायाके उपादानसे
सर्वथा रहित दिव्य, चिन्मय) अँगूठी बनायी नहीं जा सकती।
सीताजी मनमें अनेक प्रकारके विचार कर रही थीं। इसी समय
हनुमान्जी मधुर वचन बोले—॥ २॥
रामचंद्र गुन बरनैं लागा।
सुनतहिं सीता कर दुख भागा॥
लागीं सुनैं श्रवन मन लाई।
आदिहु तें सब कथा सुनाई॥ ३॥
वे श्रीरामचन्द्रजीके गुणोंका वर्णन करने लगे, [जिनके]
सुनते ही सीताजीका दुःख भाग गया। वे कान और मन लगाकर
उन्हें सुनने लगीं। हनुमान्जीने आदिसे लेकर सारी कथा कह
सुनायी॥ ३॥
श्रवनामृत जेहिं कथा सुहाई।
कही सो प्रगट होति किन भाई॥
तब हनुमंत निकट चलि गयऊ।
फिरि बैठीं मन बिसमय भयऊ॥ ४॥
[सीताजी बोलीं—] जिसने कानोंके लिये अमृतरूप यह
सुन्दर कथा कही, वह हे भाई! प्रकट क्यों नहीं होता? तब
हनुमान्जी पास चले गये। उन्हें देखकर सीताजी फिरकर (मुख
फेरकर) बैठ गयीं; उनके मनमें आश्चर्य हुआ॥ ४॥