सम्पूर्ण सुन्दरकाण्ड (श्रीरामचरितमानस पंचम सोपान - गीताप्रेस गोरखपुर सविस्तार सटीक)

सम्पूर्ण सुन्दरकाण्ड (श्रीरामचरितमानस पंचम सोपान - गीताप्रेस गोरखपुर सविस्तार सटीक)
Sampoorna Sundarkand of Ramcharitmanas
गोस्वामी तुलसीदास (गीताप्रेस गोरखपुर) द्वारा
DevanagariHindipublished128 पृष्ठ
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- सुन्दरकाण्ड * ३३
सुनत बचन पद गहि समुझाएसि।
प्रभु प्रताप बल सुजसु सुनाएसि॥
निसि न अनल मिल सुनु सुकुमारी।
अस कहि सो निज भवन सिधारी॥ ३॥
सीताजीके वचन सुनकर त्रिजटाने चरण पकड़कर उन्हें
समझाया और प्रभुका प्रताप, बल और सुयश सुनाया। [उसने
कहा—] हे सुकुमारी! सुनो, रात्रिके समय आग नहीं मिलेगी।
ऐसा कहकर वह अपने घर चली गयी॥ ३॥
कह सीता बिधि भा प्रतिकूला।
मिलिहि न पावक मिटिहि न सूला॥
देखिअत प्रगट गगन अंगारा।
अवनि न आवत एकउ तारा॥ ४॥
सीताजी [मन-ही-मन] कहने लगीं—[क्या करूँ] विधाता
ही विपरीत हो गया। न आग मिलेगी, न पीड़ा मिटेगी।
आकाशमें अंगारे प्रकट दिखायी दे रहे हैं, पर पृथ्वीपर एक भी
तारा नहीं आता॥ ४॥
पावकमय ससि स्रवत न आगी।
मानहुँ मोहि जानि हतभागी॥
सुनहि बिनय मम बिटप असोका।
सत्य नाम करु हरु मम सोका॥ ५॥
चन्द्रमा अग्निमय है, किन्तु वह भी मानो मुझे हतभागिनी
जानकर आग नहीं बरसाता। हे अशोकवृक्ष! मेरी विनती सुन!
मेरा शोक हर ले और अपना [अशोक] नाम सत्य कर॥ ५॥