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सर्वकोश
सम्पूर्ण सुन्दरकाण्ड (श्रीरामचरितमानस पंचम सोपान - गीताप्रेस गोरखपुर सविस्तार सटीक)

सम्पूर्ण सुन्दरकाण्ड (श्रीरामचरितमानस पंचम सोपान - गीताप्रेस गोरखपुर सविस्तार सटीक)

Sampoorna Sundarkand of Ramcharitmanas

गोस्वामी तुलसीदास (गीताप्रेस गोरखपुर) द्वारा

DevanagariHindipublished128 पृष्ठ

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पृष्ठ 38

३८ * श्रीरामचरितमानस *
जल भर आया। [बड़े दुःखसे वे बोलीं—] हा नाथ! आपने मुझे
बिलकुल ही भुला दिया! सीताजीको विरहसे परम व्याकुल
देखकर हनुमान्‌जी कोमल और विनीत वचन बोले—॥४॥
मातु कुसल प्रभु अनुज समेता।
तव दुख दुखी सुकृपा निकेता॥
जनि जननी मानहु जियँ ऊना।
तुम्ह ते प्रेमु राम कें दूना॥५॥
हे माता! सुन्दर कृपाके धाम प्रभु भाई लक्ष्मणजीके सहित
[शरीरसे ] कुशल हैं, परन्तु आपके दुःखसे दुःखी हैं। हे माता!
मनमें ग्लानि न मानिये (मन छोटा करके दुःख न कीजिये)।
श्रीरामचन्द्रजीके हृदयमें आपसे दूना प्रेम है॥५॥
[दोहा १४]
रघुपति कर संदेसु अब सुनु जननी धरि धीर।
अस कहि कपि गदगद भयउ भरे बिलोचन नीर॥
हे माता! अब धीरज धरकर श्रीरघुनाथजीका संदेश सुनिये।
ऐसा कहकर हनुमान्‌जी प्रेमसे गद्गद हो गये। उनके नेत्रोंमें
[प्रेमाश्रुओंका] जल भर आया॥१४॥
कहेउ राम बियोग तव सीता।
मो कहुँ सकल भए बिपरीता॥
नव तरु किसलय मनहुँ कृसानू।
कालनिसा सम निसि ससि भानू॥१॥
[हनुमान्‌जी बोले—] श्रीरामचन्द्रजीने कहा है कि हे सीते!
तुम्हारे वियोगमें मेरे लिये सभी पदार्थ प्रतिकूल हो गये हैं।
वृक्षोंके नये-नये कोमल पत्ते मानो अग्निके समान, रात्रि