सम्पूर्ण सुन्दरकाण्ड (श्रीरामचरितमानस पंचम सोपान - गीताप्रेस गोरखपुर सविस्तार सटीक)

सम्पूर्ण सुन्दरकाण्ड (श्रीरामचरितमानस पंचम सोपान - गीताप्रेस गोरखपुर सविस्तार सटीक)
Sampoorna Sundarkand of Ramcharitmanas
गोस्वामी तुलसीदास (गीताप्रेस गोरखपुर) द्वारा
DevanagariHindipublished128 पृष्ठ
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- सुन्दरकाण्ड * ४३
खजाने होओ। श्रीरघुनाथजी तुमपर बहुत कृपा करें। 'प्रभु कृपा
करें' ऐसा कानोंसे सुनते ही हनुमान्जी पूर्ण प्रेममें मग्न हो गये॥२॥
बार बार नाएसि पद सीसा।
बोला बचन जोरि कर कीसा॥
अब कृतकृत्य भयउँ मैं माता।
आसिष तव अमोघ बिख्याता॥३॥
हनुमान्जीने बार-बार सीताजीके चरणोंमें सिर नवाया और
फिर हाथ जोड़कर कहा—हे माता! अब मैं कृतार्थ हो गया।
आपका आशीर्वाद अमोघ (अचूक) है, यह बात प्रसिद्ध है॥३॥
सुनहु मातु मोहि अतिसय भूखा।
लागि देखि सुंदर फल रूखा॥
सुनु सुत करहिं बिपिन रखवारी।
परम सुभट रजनीचर भारी॥४॥
हे माता! सुनो, सुन्दर फलवाले वृक्षोंको देखकर मुझे बड़ी
ही भूख लग आयी है। [सीताजीने कहा—] हे बेटा! सुनो, बड़े
भारी योद्धा राक्षस इस वनकी रखवाली करते हैं॥४॥
तिन्ह कर भय माता मोहि नाहीं।
जौं तुम्ह सुख मानहु मन माहीं॥५॥
[हनुमान्जीने कहा—] हे माता! यदि आप मनमें सुख मानें
(प्रसन्न होकर आज्ञा दें) तो मुझे उनका भय तो बिलकुल नहीं
है॥५॥
[दोहा १७]
देखि बुद्धि बल निपुन कपि कहेउ जानकीं जाहु।
रघुपति चरन हृदयँ धरि तात मधुर फल खाहु॥