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सम्पूर्ण सुन्दरकाण्ड (श्रीरामचरितमानस पंचम सोपान - गीताप्रेस गोरखपुर सविस्तार सटीक)

सम्पूर्ण सुन्दरकाण्ड (श्रीरामचरितमानस पंचम सोपान - गीताप्रेस गोरखपुर सविस्तार सटीक)

Sampoorna Sundarkand of Ramcharitmanas

गोस्वामी तुलसीदास (गीताप्रेस गोरखपुर) द्वारा

DevanagariHindipublished128 पृष्ठ

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पृष्ठ 36

३६ * श्रीरामचरितमानस *

राम दूत मैं मातु जानकी।
सत्य सपथ करुनानिधान की॥
यह मुद्रिका मातु मैं आनी।
दीन्हि राम तुम्ह कहँ सहिदानी॥५॥
[हनुमान्जीने कहा—] हे माता जानकी! मैं श्रीरामजीका दूत
हूँ। करुणानिधानकी सच्ची शपथ करता हूँ। हे माता! यह अँगूठी
मैं ही लाया हूँ। श्रीरामजीने मुझे आपके लिये यह सहिदानी
(निशानी या पहिचान) दी है॥५॥
नर बानरहि संग कहु कैसें।
कही कथा भइ संगति जैसें॥६॥
[सीताजीने पूछा—] नर और वानरका सङ्ग कहो कैसे हुआ?
तब हनुमान्जीने जैसे सङ्ग हुआ था, वह सब कथा कही॥६॥
[दोहा १३]
कपि के बचन सप्रेम सुनि उपजा मन बिस्वास।
जाना मन क्रम बचन यह कृपासिंधु कर दास॥
हनुमान्जीके प्रेमयुक्त वचन सुनकर सीताजीके मनमें विश्वास
उत्पन्न हो गया। उन्होंने जान लिया कि यह मन, कर्म और
वचनसे कृपासागर श्रीरघुनाथजीका दास है॥१३॥
हरिजन जानि प्रीति अति गाढ़ी।
सजल नयन पुलकावलि बाढ़ी॥
बूड़त बिरह जलधि हनुमाना।
भयहु तात मो कहूँ जलजाना॥१॥
भगवान्का जन (सेवक) जानकर अत्यन्त गाढ़ी प्रीति हो
गयी। नेत्रोंमें [प्रेमाश्रुओंका] जल भर आया और शरीर अत्यन्त