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सम्पूर्ण सुन्दरकाण्ड (श्रीरामचरितमानस पंचम सोपान - गीताप्रेस गोरखपुर सविस्तार सटीक)

सम्पूर्ण सुन्दरकाण्ड (श्रीरामचरितमानस पंचम सोपान - गीताप्रेस गोरखपुर सविस्तार सटीक)

Sampoorna Sundarkand of Ramcharitmanas

गोस्वामी तुलसीदास (गीताप्रेस गोरखपुर) द्वारा

DevanagariHindipublished128 पृष्ठ

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पृष्ठ 37
  • सुन्दरकाण्ड * ३७
    पुलकित हो गया। [सीताजीने कहा—] हे तात हनुमान्!
    विरहसागरमें डूबती हुई मुझको तुम जहाज हुए॥ १ ॥
    अब कहु कुसल जाउँ बलिहारी।
    अनुज सहित सुख भवन खरारी॥
    कोमलचित कृपाल रघुराई।
    कपि केहि हेतु धरी निठुराई॥ २ ॥
    मैं बलिहारी जाती हूँ, अब छोटे भाई लक्ष्मणजीसहित खरके
    शत्रु सुखधाम प्रभुका कुशल-मङ्गल कहो। श्रीरघुनाथजी तो
    कोमलहृदय और कृपालु हैं। फिर हे हनुमान्! उन्होंने किस
    कारण यह निष्ठुरता धारण कर ली है?॥ २॥
    सहज बानि सेवक सुखदायक।
    कबहुँक सुरति करत रघुनायक॥
    कबहुँ नयन मम सीतल ताता।
    होइहहिं निरखि स्याम मृदु गाता॥ ३॥
    सेवकको सुख देना उनकी स्वाभाविक बान है। वे श्रीरघुनाथजी
    क्या कभी मेरी भी याद करते हैं? हे तात! क्या कभी उनके
    कोमल साँवले अङ्गोंको देखकर मेरे नेत्र शीतल होंगे?॥ ३॥
    बचनु न आव नयन भरे बारी।
    अहह नाथ हौं निपट बिसारी॥
    देखि परम बिरहाकुल सीता।
    बोला कपि मृदु बचन बिनीता॥ ४॥
    [मुँहसे ] वचन नहीं निकलता, नेत्रोंमें [विरहके आँसुओंका]