सम्पूर्ण सुन्दरकाण्ड (श्रीरामचरितमानस पंचम सोपान - गीताप्रेस गोरखपुर सविस्तार सटीक)
Sampoorna Sundarkand of Ramcharitmanas
गोस्वामी तुलसीदास (गीताप्रेस गोरखपुर) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४२ * श्रीरामचरितमानस *
सीता मन भरोस तब भयऊ।
पुनि लघु रूप पवनसुत लयऊ॥५॥
तब (उसे देखकर) सीताजीके मनमें विश्वास हुआ। हनुमान्जीने
फिर छोटा रूप धारण कर लिया॥ ५॥
[दोहा १६]
सुनु माता साखामृग नहिं बल बुद्धि बिसाल।
प्रभु प्रताप तें गरुड़हि खाइ परम लघु ब्याल॥
हे माता! सुनो, वानरोंमें बहुत बल-बुद्धि नहीं होती। परन्तु
प्रभुके प्रतापसे बहुत छोटा सर्प भी गरुड़को खा सकता है
(अत्यन्त निर्बल भी महान् बलवान्को मार सकता है) ॥ १६ ॥
मन संतोष सुनत कपि बानी।
भगति प्रताप तेज बल सानी॥
आसिष दीन्हि रामप्रिय जाना।
होहु तात बल सील निधाना॥ १॥
भक्ति, प्रताप, तेज और बलसे सनी हुई हनुमान्जीकी वाणी
सुनकर सीताजीके मनमें सन्तोष हुआ। उन्होंने श्रीरामजीके प्रिय
जानकर हनुमान्जीको आशीर्वाद दिया कि हे तात! तुम बल
और शीलके निधान होओ॥ १॥
अजर अमर गुननिधि सुत होहू।
करहुँ बहुत रघुनायक छोहू॥
करहुँ कृपा प्रभु अस सुनि काना।
निर्भर प्रेम मगन हनुमाना॥ २॥
हे पुत्र! तुम अजर (बुढ़ापेसे रहित), अमर और गुणोंके