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सर्वकोश
सम्पूर्ण सुन्दरकाण्ड (श्रीरामचरितमानस पंचम सोपान - गीताप्रेस गोरखपुर सविस्तार सटीक)

सम्पूर्ण सुन्दरकाण्ड (श्रीरामचरितमानस पंचम सोपान - गीताप्रेस गोरखपुर सविस्तार सटीक)

Sampoorna Sundarkand of Ramcharitmanas

गोस्वामी तुलसीदास (गीताप्रेस गोरखपुर) द्वारा

DevanagariHindipublished128 पृष्ठ

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पृष्ठ 49
  • सुन्दरकाण्ड * ४९
    फिर पुत्र-वधका स्मरण किया तो उसके हृदयमें विषाद उत्पन्न
    हो गया ॥ २० ॥
    कह लंकेस कवन तैं कीसा।
    केहि कें बल घालेहि बन खीसा॥
    की धौं श्रवन सुनेहि नहिं मोही।
    देखउँ अति असंक सठ तोही ॥ १ ॥
    लङ्कापति रावणने कहा—रे वानर! तू कौन है? किसके
    बलपर तूने वनको उजाड़कर नष्ट कर डाला ? क्या तूने कभी मुझे
    (मेरा नाम और यश) कानोंसे नहीं सुना? रे शठ! मैं तुझे
    अत्यन्त निःशङ्क देख रहा हूँ॥ १॥
    मारे निसिचर केहिं अपराधा।
    कहु सठ तोहि न प्रान कइ बाधा॥
    सुनु रावन ब्रह्मांड निकाया।
    पाइ जासु बल बिरचति माया॥ २॥
    तूने किस अपराधसे राक्षसोंको मारा? रे मूर्ख! बता, क्या
    तुझे प्राण जानेका भय नहीं है? [हनुमान्‌जीने कहा—] हे रावण!
    सुन; जिनका बल पाकर माया सम्पूर्ण ब्रह्माण्डोंके समूहोंकी
    रचना करती है; ॥ २ ॥
    जाकें बल बिरंचि हरि ईसा।
    पालत सृजत हरत दससीसा॥
    जा बल सीस धरत सहसानन।
    अंडकोस समेत गिरि कानन॥ ३ ॥
    जिनके बलसे हे दशशीश! ब्रह्मा, विष्णु, महेश (क्रमशः)