सम्पूर्ण सुन्दरकाण्ड (श्रीरामचरितमानस पंचम सोपान - गीताप्रेस गोरखपुर सविस्तार सटीक)
Sampoorna Sundarkand of Ramcharitmanas
गोस्वामी तुलसीदास (गीताप्रेस गोरखपुर) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४० * श्रीरामचरितमानस *
कह कपि हृदयँ धीर धरु माता।
सुमिरु राम सेवक सुखदाता॥
उर आनहु रघुपति प्रभुताई।
सुनि मम बचन तजहु कदराई॥ ५॥
हनुमान्जीने कहा—हे माता! हृदयमें धैर्य धारण करो और
सेवकोंको सुख देनेवाले श्रीरामजीका स्मरण करो। श्रीरघुनाथजीकी
प्रभुताको हृदयमें लाओ और मेरे वचन सुनकर कायरता छोड़
दो॥ ५॥
[दोहा १५]
निसिचर निकर पतंग सम रघुपति बान कृसानु।
जननी हृदयँ धीर धरु जरे निसाचर जानु॥
राक्षसोंके समूह पतंगोंके समान और श्रीरघुनाथजीके बाण
अग्निके समान हैं। हे माता! हृदयमें धैर्य धारण करो और
राक्षसोंको जला ही समझो॥ १५॥
जौं रघुबीर होति सुधि पाई।
करते नहिं बिलंबु रघुराई॥
राम बान रबि उएँ जानकी।
तम बरूथ कहँ जातुधान की॥ १॥
श्रीरामचन्द्रजीने यदि खबर पायी होती तो वे विलम्ब न
करते। हे जानकीजी! रामबाणरूपी सूर्यके उदय होनेपर राक्षसोंकी
सेनारूपी अन्धकार कहाँ रह सकता है?॥ १॥
अबहिं मातु मैं जाउँ लवाई।
प्रभु आयसु नहिं राम दोहाई॥