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सम्पूर्ण सुन्दरकाण्ड (श्रीरामचरितमानस पंचम सोपान - गीताप्रेस गोरखपुर सविस्तार सटीक)

सम्पूर्ण सुन्दरकाण्ड (श्रीरामचरितमानस पंचम सोपान - गीताप्रेस गोरखपुर सविस्तार सटीक)

Sampoorna Sundarkand of Ramcharitmanas

गोस्वामी तुलसीदास (गीताप्रेस गोरखपुर) द्वारा

DevanagariHindipublished128 पृष्ठ

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पृष्ठ 32

३२ * श्रीरामचरितमानस *
मैं पुकारकर (निश्चयके साथ) कहती हूँ कि यह स्वप्न चार
(कुछ ही) दिनों बाद सत्य होकर रहेगा। उसके वचन सुनकर वे
सब राक्षसियाँ डर गयीं और जानकीजीके चरणोंपर गिर पड़ीं ॥ ४ ॥
[दोहा ११]
जहँ तहँ गईं सकल तब सीता कर मन सोच।
मास दिवस बीतें मोहि मारिहि निसिचर पोच॥
तब (इसके बाद) वे सब जहाँ-तहाँ चली गयीं। सीताजी
मनमें सोच करने लगीं कि एक महीना बीत जानेपर नीच राक्षस
रावण मुझे मारेगा॥ ११॥
त्रिजटा सन बोलीं कर जोरी।
मातु बिपति संगिनि तैं मोरी॥
तजौं देह करु बेगि उपाई।
दुसह बिरहु अब नहिं सहि जाई॥ १॥
सीताजी हाथ जोड़कर त्रिजटासे बोलीं—हे माता! तू मेरी
विपत्तिकी संगिनी है। जल्दी कोई ऐसा उपाय कर जिससे मैं
शरीर छोड़ सकूँ। विरह असह्य हो चला है, अब यह सहा नहीं
जाता॥ १॥
आनि काठ रचु चिता बनाई।
मातु अनल पुनि देहि लगाई॥
सत्य करहि मम प्रीति सयानी।
सुनै को श्रवन सूल सम बानी॥ २॥
काठ लाकर चिता बनाकर सजा दे। हे माता! फिर उसमें
आग लगा दे। हे सयानी! तू मेरी प्रीतिको सत्य कर दे। रावणकी
शूलके समान दुःख देनेवाली वाणी कानोंसे कौन सुने?॥ २॥