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सम्पूर्ण सुन्दरकाण्ड (श्रीरामचरितमानस पंचम सोपान - गीताप्रेस गोरखपुर सविस्तार सटीक)

सम्पूर्ण सुन्दरकाण्ड (श्रीरामचरितमानस पंचम सोपान - गीताप्रेस गोरखपुर सविस्तार सटीक)

Sampoorna Sundarkand of Ramcharitmanas

गोस्वामी तुलसीदास (गीताप्रेस गोरखपुर) द्वारा

DevanagariHindipublished128 पृष्ठ

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पृष्ठ 41
  • सुन्दरकाण्ड * ४१
    कछुक दिवस जननी धरु धीरा।
    कपिन्ह सहित अइहहिं रघुबीरा ॥ २ ॥
    हे माता! मैं आपको अभी यहाँसे लिवा जाऊँ; पर
    श्रीरामचन्द्रजीकी शपथ है, मुझे प्रभु (उन)-की आज्ञा नहीं है।
    [अतः] हे माता! कुछ दिन और धीरज धरो। श्रीरामचन्द्रजी
    वानरोंसहित यहाँ आवेंगे ॥ २ ॥
    निसिचर मारि तोहि लै जैहहिं।
    तिहुँ पुर नारदादि जसु गैहहिं ॥
    हैं सुत कपि सब तुम्हहि समाना।
    जातुधान अति भट बलवाना ॥ ३ ॥
    और राक्षसोंको मारकर आपको ले जायँगे। नारद आदि
    [ऋषि-मुनि] तीनों लोकोंमें उनका यश गावेंगे। [सीताजीने
    कहा—] हे पुत्र! सब वानर तुम्हारे ही समान (नन्हें-नन्हें-से)
    होंगे, राक्षस तो बड़े बलवान् योद्धा हैं ॥ ३ ॥
    मोरें हृदय परम संदेहा।
    सुनि कपि प्रगट कीन्हि निज देहा ॥
    कनक भूधराकार सरीरा।
    समर भयंकर अतिबल बीरा ॥ ४ ॥
    अतः मेरे हृदयमें बड़ा भारी सन्देह होता है [कि तुम-जैसे
    बंदर राक्षसोंको कैसे जीतेंगे!] यह सुनकर हनुमान्जीने अपना
    शरीर प्रकट किया। सोनेके पर्वत (सुमेरु)-के आकारका
    (अत्यन्त विशाल) शरीर था, जो युद्धमें शत्रुओंके हृदयमें भय
    उत्पन्न करनेवाला, अत्यन्त बलवान् और वीर था ॥ ४ ॥