श्वेताश्वतरोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Shvetashvatara Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
अध्याय १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ३५
अध्याय १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ३५
माया परा प्रकृतिस्तत्तत्समुत्थौ । │ जगत्की मूल कारण है। उसीसे
कामक्रोधौ लोभमोहौ भयं च │ काम, क्रोध, लोभ, मोह, भय, विषाद,
विषादशोकौ च विकल्पजालम्॥ │ शोक तथा अन्य विकल्पजाल उत्पन्न हुए
धर्माधर्मौ सुखदुःखे च सृष्टि- │ हैं। और उसीसे धर्म-अधर्म, सुख-दुःख
र्विनाशपाकौ नरके गतिश्च। │ और सृष्टि-विनाशरूप परिणाम, नरकमें
वासः स्वर्गे जातयश्चाश्रमाश्च │ जाना, स्वर्गमें रहना, जाति, आश्रम,
रागद्वेषौ विविधा व्याधयश्च॥ │ राग, द्वेष, तरह-तरहकी व्याधियाँ,
कौमारतारुण्यजरावियोग- │ कुमारावस्था, तरुणता, वृद्धावस्था,
संयोगभोगानशनव्रतानि । │ वियोग, संयोग, भोग, उपवास और
इतीदमीदृग्विद्यं निधाय │ व्रत प्रकट हुए हैं। इन सबको
तूष्णीमासीनः सुमतिं विविद्धि॥” │ इस प्रकार [ प्रकृतिका ही विकार ]
│ जाननेवाला पुरुष इन्हें प्रकृतिमें
│ स्थापित कर मौनभावसे स्थित रहता
│ है। उसे ही तुम शुभ मतिवाला
│ जानो।”
तथा च श्रीविष्णुधर्मे षड- │ तथा श्रीविष्णुधर्मोत्तरपुराणके
ध्यायाम्— │ अन्तर्गत षडध्यायीमें भी कहा
“अनादिसम्बन्धवत्या │ है—“यह क्षेत्रज्ञ अपनेमें
क्षेत्रज्ञोऽयमविद्यया । │ अनादिकालसे सम्बद्ध हुई अविद्यासे
युक्तः पश्यति भेदेन │ युक्त होकर अपने अन्तःकरणमें स्थित
ब्रह्म तत्त्वात्मनि स्थितम्॥ │ ब्रह्मको भेदरूपसे देखता है। जबतक
पश्यत्यात्मानमन्यञ्च │ जीव परमात्मासे भिन्न अपनेको तथा
यावद्वै परमात्मनः। │ अन्य जीवोंको देखता है तबतक वह
तावत्संस्राम्यते जन्तु- │ अपने कर्मोंद्वारा मोहित होकर संसारमें
र्मोहितो निजकर्मणा ॥ │ भटकाया जाता है। जब इसके सम्पूर्ण
संक्षीणाशेषकर्मा तु │ कर्म क्षीण हो जाते हैं तो यह शुद्ध
परं ब्रह्म प्रपश्यति । │ परब्रह्मको अपनेसे अभिन्नरूपसे
३६ श्वेताश्वतरोपनिषद् '[ अध्याय १
३६ श्वेताश्वतरोपनिषद् '[ अध्याय १
अभेदेनात्मनः शुद्धं | देखता है, और शुद्ध हो जानेके
शुद्धत्वादक्षयो भवेत् ॥ | कारण यह अक्षय हो जाता है ।
अविद्या च क्रियाः सर्वा | समस्त कर्म अविद्यारूप हैं और ज्ञान
विद्या ज्ञानं प्रचक्षते । | विद्या कहलाता है । कर्मसे जीवको
कर्मणा जायते जन्तु- | जन्म लेना पड़ता है और ज्ञानसे वह
र्विद्यया च विमुच्यते ॥ | मुक्त हो जाता है । अद्वैत ही परमार्थ
अद्वैतं परमार्थो हि | है और द्वैत उससे भिन्न (अपरमार्थ)
द्वैतं तद्भिन्न उच्यते । | कहा जाता है । हे राजन् ! पशु,
पशुतिर्यङ्मनुष्याख्यं | तिर्यक्, मनुष्य और नारकी जीव—
तथैव नृप नारकम् ॥ | यह चार प्रकारका भेद मिथ्या ज्ञानके
चतुर्विधोऽपि भेदोऽयं | ही कारण है । मैं अन्य हूँ, यह अन्य
मिथ्याज्ञाननिबन्धनः । | है और ये सब अन्य हैं—यही द्वैत
अहमन्योऽपरश्चाय- | कहलानेवाला अज्ञान है । अब
ममी चात्र तथापरे ॥ | अद्वैतके विषयमें श्रवण करो ।
अज्ञानमेतद्द्वैताख्य- | "अद्वैततत्त्व मैं-मेरा, तू-तेरा आदि
मद्वैतं श्रूयतां परम् । | बुद्धिसे रहित, निर्विकल्प, निर्विकार
मम त्वहमिति प्रज्ञा- | और अनिर्वचनीयरूपसे अनुभूत
वियुक्तमविकल्पवत् ॥ | होता है । द्वैत मनोवृत्तिरूप है,
अविकार्यमनाख्येय- | परमार्थतः अद्वैत ही तो है; अतः
मद्वैतमनुभूयते । | धर्माधर्मरूप निमित्तके कारण उत्पन्न
मनोवृत्तिमयं द्वैत- | हुई मनकी वृत्तियोंका निरोध करना
मद्वैतं परमार्थतः ॥ | चाहिये । उनका निरोध हो जानेपर
मनसो वृत्तयस्तस्मा- | द्वैतकी सिद्धि नहीं होती ।
द्धर्माधर्मनिमित्तजाः । | यह जो कुछ चराचर जगत्
निरोद्धव्यास्तन्निरोधे | है सब मनका दृश्यमात्र है ।
द्वैतं नैवोपपद्यते ॥ |
मनोदृष्टमिदं सर्वं |
यत्किञ्चित्सचराचरम् । |
अध्याय १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ३७
अध्याय १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ३७
मनसो ह्यमनीभावे- मनका अमनीभाव ( नाश ) हो
ऽद्वैतभावं तदाप्नुयात् ॥ जानेपर यह अद्वैतभावको प्राप्त हो
कर्मणां भावना येयं जाता है । यह जो कर्मोंकी भावना है
सा ब्रह्मपरिपन्थिनी । वह ब्रह्मानुभवमें विघ्नरूप है, क्योंकि
कर्मभावनया तुल्यं कर्मोंकी भावनाके अनुकूल ही
विज्ञानमुपजायते ॥ विज्ञान प्राप्त होता है । विज्ञान तो
तादृग्भवति विज्ञप्ति- वैसा ही होता है जैसी कि भावना
र्यादृशी खलु भावना । होती है । अतः भावनाका नाश
क्षये तस्याः परं ब्रह्म हो जानेपर परब्रह्मका स्वयं ही
स्वयमेव प्रकाशते ॥ अनुभव होने लगता है । हे राजन् !
परात्मनोर्मनुष्येन्द्र आत्मा और परब्रह्मका जो विभाग है
विभागोऽज्ञानकल्पितः । वह अज्ञानकल्पित ही है । इसीसे
क्षये तस्यात्मपरयो- उसका क्षय हो जानेपर फिर आत्मा
रविभागोऽत एव हि ॥ और परब्रह्मका अभेद ही निश्चित
आत्मा क्षेत्रज्ञसंज्ञो हि होता है । क्षेत्रज्ञसंज्ञक आत्मा प्रकृतिके
संयुक्तः प्राकृतैर्गुणैः । गुणोंसे युक्त है, वही उनसे रहित
तैरेव विगतः शुद्धः होकर शुद्ध होनेपर परमात्मा
परमात्मा निगद्यते ॥” कहलाता है ।”
तथा च श्रीविष्णुपुराणे— ऐसा ही श्रीविष्णुपुराणमें भी कहा
“परमात्मा त्वमेवैको है—“हे जगत्पते ! तुम्हीं एकमात्र
नान्योऽस्ति जगतः पते । परमात्मा हो; तुमसे भिन्न और कुछ भी
तवैष महिमा येन नहीं है । जिससे यह चराचर जगत्
व्याप्तमेतच्चराचरम् ॥ व्याप्त है वह यह तुम्हारी ही
यदेतद्दृश्यते मूर्त्त- महिमा है । यह जो कुछ मूर्त्त जगत्
मेतज्ज्ञानात्मनस्तव । दिखायी देता है ज्ञानस्वरूप आपका ही
भ्रान्तिज्ञानेन पश्यन्ति रूप है । असंयमी लोग अपने भ्रमपूर्ण
जगद्रूपमयोगिनः ॥ ज्ञानके अनुसार इसे जगद्रूप देखते हैं।
३८ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय १
३८ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय १
ज्ञानस्वरूपमखिलं | इस सम्पूर्ण ज्ञानस्वरूप जगत्को
जगदेतद्बुद्धयः । | अर्थस्वरूप देखनेवाले बुद्धिहीन
अर्थस्वरूपं पश्यन्तो | पुरुषोंको मोहरूप महासागरमें
भ्राम्यन्ते मोहसंप्लवे ॥ | भटकना पड़ता है । किन्तु जो
ये तु ज्ञानविदः शुद्ध- | शुद्धचित्त ज्ञानीलोग हैं वे इस
चेतसस्तेऽखिलं जगत् । | सम्पूर्ण जगत्को आप परमात्माका
ज्ञानात्मकं प्रपश्यन्ति | ज्ञानमय स्वरूप ही देखते हैं ।”
त्वद्रूपं पारमेश्वरम् ॥” | “जिसका ऐसा निश्चय है कि 'मैं
(१।४।३८-४१) | तथा यह सम्पूर्ण जगत् जनार्दन
“अहं हरिः सर्वमिदं जनार्दनो | श्रीहरि ही हैं उनसे भिन्न कोई भी
नान्यत्ततः कारणकार्यजातम् । | कार्य-कारणवर्ग नहीं है, उस पुरुषको
ईदृङ्मनो यस्य न तस्य भूयो | फिर सांसारिक राग-द्वेषादि द्वन्द्वरूप
भवोद्भवा द्वन्द्वगदा भवन्ति ॥” | रोग नहीं होते ।”
(१।२२।८७) |
“ज्ञानस्वरूपमत्यन्तं | “जो परमार्थतः ( वास्तवमें )
निर्मलं परमार्थतः । | अत्यन्त निर्मल ज्ञानस्वरूप परमात्मा है
तदेवार्थस्वरूपेण | वही अज्ञान-दृष्टिसे विभिन्न पदार्थोंके
भ्रान्तिदर्शनतः स्थितम् ॥” | रूपमें प्रतीत हो रहा है ।” “वे विश्व-
(१।२।६) | मूर्ति भगवान् ज्ञानस्वरूप हैं, पदार्थाकार
“ज्ञानस्वरूपो भगवान्यतोऽसा- | नहीं हैं, इसलिये इन पर्वत, समुद्र
वशेषमूर्तिर्न तु वस्तुभूतः । | और पृथिवी आदि विभिन्न पदार्थोंको
ततो हि शैलाब्धिधरादिभेदा- | तुम विज्ञानका ही विलास जानो ।”
ञ्जानीहि विज्ञानविजृम्भितानि ॥ | “हे द्विज ! क्या घट-पटादि कोई भी
(२।१२।३९) | ऐसी वस्तु है जो आदि, मध्य और
वस्त्वस्ति किं कुत्राचिदादिमध्य- | अन्तसे रहित एवं सर्वदा एक रूपमें
पर्यन्तहीनं सततैकरूपम् । | ही रहनेवाली हो । पृथिवीपर जो
यच्चान्यथात्वं द्विज याति भूमौ | वस्तु बदलती रहती है, पूर्ववत् नहीं
अध्याय १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ३९
अध्याय १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ३९
न तत्तथा तत्र कुतो हि तत्त्वम् ॥ | रहती, उसमें वास्तविकता कैसे हो
मही घटत्वं घटतः कपालिका | सकती है ? देखो, मृत्तिका ही घटरूप
कपालिकाचूर्णरजस्ततोऽणुः । | हो जाती है, फिर वही घटसे कपाल,
जनैः स्वकर्मस्तिमितआत्मनिश्चयै- | कपालसे चूर्ण रज और रजसे अणु-
रालक्ष्यते ब्रूहि किमत्र वस्तु ॥ | रूप हो जाती है। फिर बताओ तो
तस्मान्न विज्ञानमृतेऽस्ति किञ्चि- | सही, अपने कर्मके वशीभूत हो
त्क्वचित्कदाचिद्द्विज वस्तुजातम्। | आत्मनिश्चयको भूले हुए मनुष्य इसमें
विज्ञानमेकं निजकर्मभेद- | कौन-सी सत्य वस्तु देखते हैं ? अतः
विभिन्नचित्तैर्बहुधाभ्युपेतम् ॥ | हे द्विज ! विज्ञानके सिवा कभी कहीं
ज्ञानं विशुद्धं विमलं विशोक- | कोई भी पदार्थसमूह नहीं है।
मशेषलोभादिनिरस्तसङ्गम् । | अपने-अपने कर्मोंके कारण विभिन्न
एकं सदैकं परमः परेशः | चित्तवृत्तियोंसे युक्त पुरुषोंको एक
स वासुदेवो न यतोऽन्यदस्ति ॥ | विज्ञान ही विभिन्नरूपसे प्रतीत हो
सद्भाव एवं भवतो मयोक्तो | रहा है। राग-द्वेषादि मलसे रहित,
ज्ञानं तथा सत्यमसत्यमन्यत् । | शोकशून्य, लोभादि सम्पूर्ण दोषोंसे
एतन्तु यत्संव्यवहारभूतं | वर्जित, सदा एकरस एवं असंग एकमात्र
तत्रापि चोक्तं भुवनाश्रितं ते ॥" | विशुद्ध विज्ञान ही वह सर्वश्रेष्ठ परमेश्वर
(२।१२। ४१-४५) | वासुदेव है; उससे भिन्न और कुछ
"अविद्यासंचितं कर्म | भी नहीं है। इस प्रकार मैंने तुम्हारे
तच्चाशेषेषु जन्तुषु ॥ | प्रति परमार्थका निरूपण किया।
आत्मा शुद्धोऽक्षरः शान्तो | बस, एक ज्ञान ही सत्य है, और
निर्गुणः प्रकृतेः परः । | सब मिथ्या है। उसके सिवा यह जो
| व्यावहारिक सत्य है उस त्रिभुवनके
| विषयमें भी वर्णन कर दिया।"
| "कर्म अविद्याजनित है और वह
| सभी जीवोंमें विद्यमान है; किन्तु
| आत्मा शुद्ध, निर्विकार, शान्त,
| निर्गुण और प्रकृतिसे अतीत है।
४० श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय १
४० श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय १
प्रवृद्ध्यपचयौ न स्त सम्पूर्ण प्राणियोंमें विद्यमान उस एक
एकस्याखिलजन्तुषु ॥" आत्माके वृद्धि और क्षय नहीं होते।"
(२।१३।७०-७१)
"यत्त कालान्तरेणापि हे राजन् ! जो कालान्तरमें भी
नान्यसंज्ञामुपैति वै। परिणामादिके कारण होनेवाली किसी
परिणामादिसंभूतां अन्य संज्ञाको प्राप्त नहीं होती वही
तद्वस्तु नृप तच्च किम् ॥" परमार्थ वस्तु है। ऐसी वस्तु [आत्माके
(२।१३।१००)
"यद्यन्योऽस्ति परः कोऽपि सिवा ] और क्या है ? हे नृपश्रेष्ठ !
मत्तः पार्थिवसत्तम । यदि मुझसे भिन्न कोई और पदार्थ
तदैषोऽहमयं चान्यो होता तो यह, मैं, अमुक, अन्य
वक्तुमेवमपीष्यते ॥ आदि भी कहना ठीक हो सकता
यदा समस्तदेहेषु था। जब कि सम्पूर्ण शरीरोंमें एक
पुमानेकेको व्यवस्थितः। ही पुरुष स्थित है तो 'आप कौन हैं ?'
तदा हि को भवान्सोऽह- 'मैं वह हूँ' इत्यादि वाक्य वञ्चनामात्त्र
मित्येतद्विप्रलम्भनम् ॥ हैं ! तुम राजा हो, यह पालकी है,
त्वं राजा शिविका चेयं हम तुम्हारे सामने चलनेवाले वाहक
वयं वाहाः पुरःसराः ।
अयं च भवतो लोको हैं और ये तुम्हारे परिजन हैं—
न सदेतत्तवोच्यते ॥" यह तुम ठीक नहीं कहते।"
(२।१३। ९०-९२)
"वस्तु राजेति यल्लोके "व्यवहारमें जो वस्तु राजा है, जो
यच्च राजभटात्मकम् । राजसेवकादि हैं और जिसे राजत्व
तथान्ये च नृपत्वं च कहते हैं तथा इनके सिवा जो अन्य
तत्तत्सङ्कल्पनामयम् ॥" पदार्थ हैं वे सब सङ्कल्पमय ही हैं।"
(२।१३।९९)
"अनाशो परमार्थश्च "अविनाशी परमार्थतत्त्वकी उपलब्धि
प्राज्ञैरभ्युपगम्यते ।"
(२।१४। २४) तो ज्ञानियोंको ही होती है।"
अध्याय १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ४१
अध्याय १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ४१
"परमार्थस्तु भूपाल "राजन् ! तुम मुझसे संक्षेपमें
संक्षेपाच्छ्रूयतां मम ॥ परमार्थतत्त्व श्रवण करो । सर्वव्यापी,
एको व्यापी समः शुद्धो सर्वत्र समभावसे स्थित, शुद्ध, निर्गुण,
निर्गुणः प्रकृतेः परः । प्रकृतिसे अतीत, जन्म और वृद्धि
जन्मवृद्ध्यादिरहित आदिसे रहित, सर्वगत एवं अविनाशी
आत्मा सर्वगतोऽव्ययः ॥ आत्मा एक है । वह परम ज्ञानमय
परज्ञानमयः सद्भि- है । हे राजन् ! उस प्रभुका
र्नामजात्यादिभिः प्रभुः। वास्तविक नाम एवं जाति आदि-
न योगवान्न युक्तोऽभू- से संयोग न तो है, न हुआ
न्नैव पार्थिव योक्ष्यते ॥ है और न कभी होगा ही ।
तस्यात्मपरदेहेषु उसका अपने और दूसरोंके देहों-
संयोगो ह्येक एव यत् । के साथ एक ही संयोग है ।
विज्ञानं परमार्थोऽसौ इस प्रकारका जो विशेष ज्ञान
द्वैतिनोऽतथ्यदर्शिनः ॥" है वही परमार्थ है । द्वैतवादी तो
(२।१४।२८-३१) अपरमार्थदर्शी हैं । हे विद्वन् ! इस
"एवमेकमिदं विद्ब- प्रकार यह सारा जगत् वासुदेवसंज्ञक
न्भेदि सकलं जगत् । परमात्माका एक अभिन्न स्वरूप
वासुदेवाभिधेयस्य ही है ।"
स्वरूपं परमात्मनः ॥" "[गुरुवर ऋभुके] इस उपदेशसे
(२।१५।३५) निदाघ भी अद्वैतपरायण हो गया;
"निदाघोऽप्युपदेशेन और तब वह समस्त प्राणियोंको
तेनाद्वैतपरोऽभवत् ॥ आत्माके साथ अभेदरूपसे देखने
सर्वभूतान्यभेदेन लगा तथा उसे ब्रह्मका साक्षात्कार हो
स ददर्श तदात्मनः । गया । हे द्विज ! इससे उसने उत्कृष्ट
तथा ब्रह्म ततो मुक्ति- मोक्षपद प्राप्त कर लिया । जिस प्रकार
मवाप परमां द्विजः ॥ एक ही आकाश सफेद और नीले आदि
सितनीलादिभेदेन भेदसे विभिन्न प्रकारका दिखायी
यथैकं दृश्यते नभः ।
४२ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय १
४२ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय १
[वाम भाग]
भ्रान्तदृष्टिभिरात्मापि
तथैकः सन्पृथक्पृथक् ॥”
( २ । १६ । १९-२० )
“एकः समस्तं यदिहास्ति किञ्चि-
त्तदच्युतो नास्ति परततोऽन्यत् ।
सोऽहं स च त्वं स च सर्वमेत-
दात्मस्वरूपं त्यज भेदमोहम् ॥
इतीरितस्तेन स राजवर्य-
स्तत्याज भेदं परमार्थदृष्टिः ।
स चापि जातिस्मरणात्प्रबोध-
स्तत्रैव जन्मन्यपवर्गमाप ॥”
( २ । १६ । २२—२४ )
तथा लैङ्गे—
“तस्मादज्ञानमूलो हि
संसारः सर्वदेहिनाम् ।
परतन्त्रे स्वतन्त्रे च
भिदाभावाद्दिचारतः ॥
एकत्वमपि नास्त्येव
द्वैतं तत्र कुतोऽस्त्यहो ।
एकं नास्त्यथ मर्त्यं च
कुतो मृतसमुद्भवः ॥
नान्तःप्रज्ञो बहिष्प्रज्ञो
न चोभयत एव च ।
[दक्षिण भाग]
देता है उसी प्रकार जिनकी दृष्टि
भ्रमग्रस्त है उन लोगोंको आत्मा एक
होनेपर भी पृथक्-पृथक् दिखायी
देता है।” “इस जगत्में जो कुछ है
वह सब एकमात्र श्रीहरि ही है;
उनसे भिन्न और कुछ भी नहीं है।
वही मैं हूँ, वही तुम हो और यह
सारा जगत् भी आत्मस्वरूप श्रीहरि
ही है। तुम भेदभ्रमको छोड़ दो।
उस (अवधूत) के ऐसा कहनेपर
उस सौवीरनरेशने परमार्थदृष्टिसे
सम्पन्न हो भेदबुद्धि छोड़ दी, और
उस ब्राह्मणने भी पूर्वजन्मका स्मरण
रहनेसे तत्त्वज्ञान प्राप्त कर उसी जन्ममें
मोक्षपद प्राप्त कर लिया।”
तथा लिङ्गपुराणमें कहा है—
“अतः समस्त प्राणियोंको यह संसार
अज्ञानके ही कारण प्राप्त हुआ है;
क्योंकि विचार करनेपर स्वतन्त्र
परमात्मा और परतन्त्र जीवमें कोई
भेद नहीं है। अहो ! जब उसमें
एकत्व भी नहीं है तो द्वैत कहाँसे
हो सकता है? जब एक नहीं और
कोई मर्त्य (मरणधर्मा) भी नहीं तो
मृत्यु कहाँसे हो सकती है? वह
न अन्तःप्रज्ञ (भीतरकी जाननेवाला)
हैं, न बहिष्प्रज्ञ (बाहरकी जानने-
वाला) है, न दोनों ओरकी जानने-
अध्याय १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ४३
अध्याय १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ४३
[ वाम स्तम्भ ]
न प्रज्ञानघनस्त्वेवं
न प्रज्ञोऽप्रज्ञ एव सः ॥
विदिते नास्ति वेद्यं च
निर्वाणं परमार्थतः ।
अज्ञानतिमिरात्सर्वं
नात्र कार्या विचारणा ॥
ज्ञानं च बन्धनं चैव
मोक्षो नाप्यात्मनो द्विजाः।
न ह्येषा प्रकृतिर्जीवो
विकृतिश्च विकारतः ।
विकारो नैव मायैषा
सदसद्व्यक्तिवर्जिता ॥”
तथाह भगवान्पाराशरः—
“अस्माद्वि जायते विश्व-
मत्रैव प्रविलीयते ।
स मायी मायया बद्धः
करोति विविधास्तनूः ॥
न चात्रैवं संसरति
न च संसारयेत्परम् ।
न कर्ता नैव भोक्ता च
न च प्रकृतिपूरुषौ ॥
न माया नैव च प्राण-
श्चैतन्यं परमार्थतः ।
[ दक्षिण स्तम्भ ]
वाला है और न प्रज्ञानघन है।
इसीलिये वह न प्रज्ञ (प्रकृष्ट ज्ञानवान्)
है और न अप्रज्ञ ( ज्ञानहीन ) ही
है। ज्ञान हो जानेपर तो कोई ज्ञेय
ही नहीं रहता; अतः परमार्थतः
निर्वाणस्वरूप ही है। सब कुछ
अज्ञानान्धकारके ही कारण है। इसमें
किसी प्रकारका विचार करनेकी
आवश्यकता नहीं है। हे द्विजगण !
आत्माका न ज्ञान होता है, न बन्धन
होता है और न मोक्ष ही होता है।
जीव न तो यह प्रकृति है, न
विकृति है और न इनका विकार ही
है, क्योंकि ये सब विकारी हैं। यह
सब तो सत्-असत्से विलक्षण माया
ही है।”
तथा भगवान् पराशर कहते हैं—
“इसीसे विश्व उत्पन्न होता है और
इसीमें लीन हो जाता है। वह
मायामय मायासे बँधकर स्वयं ही
अनेक प्रकारके शरीर धारण कर
लेता है। किन्तु इस प्रकार न तो
वह स्वयं संसारको प्राप्त होता है
और न किसी अन्यको ही संसारमें
प्रवृत्त करता है क्योंकि वह न कर्ता
है, न भोक्ता है, न प्रकृति या पुरुष
है, न माया है और न प्राण है;
वस्तुतः वह तो चैतन्य है। अतः
४३ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय १
४३ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय १
तस्मादज्ञानमूलो हि | समस्त प्राणियोंको अज्ञानके कारण
संसारः सर्वदेहिनाम् ॥ | ही संसारकी प्राप्ति हुई है । आत्मा
नित्यः सर्वगतो ह्यात्मा | तो नित्य, सर्वगत, कूटस्थ और
कूटस्थो दोषवर्जितः । | निर्दोष है । वह एक अपनी
एकः स भिद्यते शक्त्या | मायाशक्तिके द्वारा ही भेदको प्राप्त
मायया न स्वभावतः ॥ | होता है, स्वरूपतः नहीं । अतः
तस्मादद्वैतमेवाहु- | मुनियोंने परमार्थतः अद्वैत ही बतलाया
र्मुनयः परमार्थतः । | है; विद्वानोंने इस जगत्को ज्ञानस्वरूप
ज्ञानस्वरूपमेवाहु- | ही कहा है । जिनकी दृष्टि दूषित है
र्जगदेतद्विचक्षणाः ॥ | वे अन्यलोग ही अज्ञानवश इसे
अर्थस्वरूपमज्ञाना- | परमार्थस्वरूप समझते हैं । चैतन्य
त्पश्यन्त्यन्ये कुदृष्टयः । | आत्मा तो स्वभावतः कूटस्थ, निर्गुण
कूटस्थो निर्गुणो व्यापी | और सर्वव्यापक है । भ्रान्तिदर्शी
चैतन्यात्मा स्वभावतः ॥ | लोगोंको ही वह पदार्थाकार प्रतीत
दृश्यते ह्यर्थरूपेण | होता है । जिस समय पुरुष आत्माका
पुरुषैर्भ्रान्तदर्शिभिः । | परमार्थरूपसे साक्षात्कार करता है
यदा पश्यति चात्मानं | और इस द्वैतप्रपञ्चको मायामात्र
केवलं परमार्थतः ॥ | समझता है उसी समय उसे शान्ति
मायामात्रमिदं द्वैतं | प्राप्त होती है । अतः केवल विज्ञान
तदा भवति निर्वृतः । | ही है, प्रपञ्च या संसार नहीं है ।”
तस्माद्विज्ञानमेवास्ति
न प्रपञ्चो न संसृतिः ॥”
एवं श्रुत्यादिना नामादिकारणो- | इस प्रकार श्रुति आदिके द्वारा
[प्रपञ्चस्य] पन्यासमुखेन स्व- | नामादिके कारणोंका दिग्दर्शन कराने-
[मिथ्यात्वम्] रूपेण च बाधित- | से तथा स्वरूपतः बाधित होनेके
त्वात्प्रपञ्चस्य मिथ्यात्वमवगम्यते । | कारण प्रपञ्चका मिथ्यात्व जाना जाता
अस्थूलादिलक्षणस्य ब्रह्मण- | है। ब्रह्म अस्थूलादि लक्षणोंवाला है,
स्तद्विपरीतस्थूलाकारो मिथ्या | अतः उससे विपरीत स्थूलाकार
अध्याय १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ४५
अध्याय १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ४५
भवितुमर्हति । यथैकस्य | प्रपञ्च मिथ्या होना ही चाहिये । जिस
चन्द्रमसस्तद्विपरीतद्वितीयाकार- | प्रकार एक चन्द्रमाका दूसरा आकार
स्तद्वत् । | मिथ्या होता है उसी प्रकार इसे
| समझना चाहिये ।
तथा च सूत्रकारो “न स्थान- | इसी प्रकार सूत्रकार भगवान्
(पार्श्व टिप्पणी: सूत्रक्रमतोपन्यास-) तोऽपि परस्योभय- | व्यासने भी “न स्थानतोऽपि परस्यो-
(पार्श्व टिप्पणी: पूर्वकं ब्रह्मणो) लिङ्गं सर्वत्र हि” | भयलिङ्गं सर्वत्र हि” इस सूत्रद्वारा स्व-
(पार्श्व टिप्पणी: निर्विशेषत्व-) ( ब्र० सू० ३ । | रूपसे और उपाधिसे भी ब्रह्मके[सविशेष
(पार्श्व टिप्पणी: समर्थनम्) २ । ११ ) | और निर्विशेष ] दो परस्पर-विरुद्ध रूप
इति स्वरूपत उपाधितश्च विरुद्ध- | सम्भव न होनेके कारण ब्रह्म निर्विशेष
रूपद्वयासम्भवान्निर्विशेषमेव ब्रह्मे- | ही है ऐसा उपपादन कर [ फिर “न
| भेदादिति चेन्न प्रत्येकमद्वचनात्”
त्युपपाद्य “न भेदात्”... ( ब्र० | इस सूत्रके ] ‘न भेदात्’ इस
सू० ३ । २ । १२) इति भेद- | अंशद्वारा ऐसी आशंका कर कि ‘क्या
| भेदश्रुतिके सामर्थ्यसे ब्रह्मको सविशेष
श्रुतिबलात्किमिति सविशेषमपि | भी नहीं माना जा सकता’ “नै
ब्रह्म नाभ्युपगम्यत इत्याशङ्क्य “न | प्रत्येकमद्वचनात्” इस अंशसे यह
प्रत्येकमद्वचनात्” इत्युपाधि- | निश्चय किया है कि उपाधिजनित
| भेद श्रुतिसे ही बाधित होनेके कारण
भेदस्य श्रुत्यैव बाधितत्वादभेद- | अभेदश्रुतिके सामर्थ्यसे सविशेष
श्रुतिबलात्सविशेषस्य ग्रहणायो- | ब्रह्मका ग्रहण नहीं किया जा सकता,
गान्निर्विशेषमेवेत्युपपाद्य “अपि | इसलिये वह निर्विशेष ही है । इसके
१. परब्रह्म उपाधिसे भी [ सविशेष-निर्विशेष ] उभयरूप नहीं हो सकता,
क्योंकि सर्वत्र उसका निर्विशेषरूपसे ही वर्णन किया गया है ।
२. [ यदि कहो ] ऐसा नहीं है, क्योंकि [ ‘चतुष्पाद् ब्रह्म’ ‘षोडशकलं ब्रह्म’
इत्यादि रूपसे ] प्रत्येक विद्यामें उसका भेदरूपसे वर्णन किया है ।
३. तो ऐसा नहीं है, क्योंकि प्रत्येक औपाधिक भेदमें [ ‘अयमेव स
योऽयमात्मा’ इत्यादि श्रुतिके द्वारा ] उसका अभेद ही बतलाया गया है ।
४६ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय १
४६ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय १
चैवमेके” (ब्र० सू० ३।२।१३) | पश्चात् “अपि चैवमेके” इस सूत्रसे
इति भेदनिन्दापूर्वकमभेदमेवैके | यह निश्चय किया है कि कोई-कोई
शाखिनः समामनन्ति—“मन- | शाखावाले भेददृष्टिकी निन्दा करते
सैवेदमाप्तव्यम्” (क० उ० ४। | हुए अभेदका ही प्रतिपादन करते
११)। “नेह नानास्ति किञ्चन।” | हैं। [ उनका कथन है कि ] “यह
मृत्योः स मृत्युमाप्नोति य इह | मनसे ही प्राप्त किया जा सकता है”,
नानेव पश्यति” (बृ० उ० ४। | “यहाँ नाना कुछ नहीं है”,
४।१९)। “एकधैवानुद्रष्टव्य- | “यहाँ जो अनेकवत् देखता है वह
मिति” (बृ० उ० ४।४।२०)। | मृत्युसे मृत्युको प्राप्त होता है”,
“भोक्ता भोग्यं प्रेरितारं च मत्वा | “उसे एकरूप ही देखना चाहिये”,
सर्वं प्रोक्तं त्रिविधं ब्रह्ममेतत्” | तथा “भोक्ता, भोग्य और प्रेरक
(श्वेता० उ० १। १२) इति | मानकर जिसे तीन प्रकारका कहा
सर्वभोग्यभोक्तृनियन्तृलक्षणस्य | गया है वह सब ब्रह्म ही है”
प्रपञ्चस्य ब्रह्मैकस्वभावताभिधीयत | इत्यादि श्रुतियोंसे भोक्ता, भोग्य और
इति। | प्रेरकरूप सम्पूर्ण प्रपञ्च एकमात्र
| ब्रह्मस्वरूप ही कहा गया है।
पुनरपि निर्विशेषपक्षे दृढीकृते | इस प्रकार फिर भी निर्विशेष
सविशेषत्वमाशङ्क्य किमित्येकस्वरूपस्य | पक्षकी ही पुष्टि होनेपर ‘एकस्वरूप
तन्निरसनं उभयस्वरूपासंभवे- | ब्रह्मका उभयरूप होना असम्भव
श्रुतिविरोध- | है, इसलिये ब्रह्मको निराकार ही
परिहारश्च ऽनाकारमेव ब्रह्माव- | क्यों निश्चय किया जाता है उससे
धार्यते न पुनर्विपरीतमित्याशङ्क्य | विपरीत साकार क्यों नहीं माना जाता’
“अरूपवदेव हि तत्प्रधानत्वात्” | ऐसी आशंका कर “अरूपवदेव हि
(ब्र० सू० ३।२।१४) इति रूपाद्या- | तत्प्रधानत्वात्” इस सूत्रसे यह कहा
१. अपि तु किसी-किसी शाखावाले इस प्रकार ही [ अर्थात् भेदकी निन्दा-
पूर्वक अभेदका ही ] प्रतिपादन करते हैं ।
२. ब्रह्म रूपरहित ही है, क्योंकि प्रधानतया ब्रह्मका प्रतिपादन करनेवाली
‘अस्थूलम्’ इत्यादि श्रुति निर्गुणप्रधान ही है ।
[अध्याय १ ] शाङ्करभाष्यार्थे ४७
[अध्याय १ ] शाङ्करभाष्यार्थे ४७
[संस्कृत-मूलम्]
काररहितमेव ब्रह्मावधारयितव्यम्।
कस्मात् ? तत्प्रधानत्वात् । “अ-
स्थूलमनण्वह्रस्वमदीर्घम्” (बृ०
उ० ३।८।८) “अशब्दमस्पर्श-
मरूपमव्ययम्” (क० उ० ३।
१५) । “आकाशो वै नाम नाम-
रूपयोर्निर्वहिता ते यदन्तरा तद्-
ब्रह्म” (छा० उ० ४।१४।७)
“तदेतद्ब्रह्मापूर्वमनपरमनन्तरम-
बाह्यमयमात्मा ब्रह्म सर्वानुभूरित्ये-
तदनुशासनम्” (बृ० उ० २।५।
१९) इत्येवमादीनि निष्प्रपञ्च-
ब्रह्मात्मतत्त्वप्रधानानि। इतराणि
कारणब्रह्मविषयाणि न तत्प्रधा-
नानि । तत्प्रधानान्यतत्प्रधानेभ्यो
बलीयांसि भवन्ति । अतस्तत्पर-
[हिन्दी-भाषार्थः]
है कि ब्रह्मको रूपादि आकारोंसे रहित
ही निश्चय करना चाहिये। क्यों?—
इसलिये कि निर्विशेष वाक्य ही ब्रह्मका
प्रधानतया प्रतिपादन करते हैं।
यथा—“ब्रह्म न स्थूल है, न अणु
है, न ह्रस्व है, न दीर्घ है,” ““ब्रह्म शब्द
स्पर्श और रूपहीन तथा अविनाशी
है”, “आकाश (आकाशसंज्ञक
ब्रह्म) ही नामरूपका निर्वाहक है,
वे जिसके अन्तर्गत हैं वह ब्रह्म
है”, “वह ब्रह्म कारण-कार्यसे
रहित तथा अन्तर्बाह्यशून्य है यह
आत्मा सबका अनुभव करनेवाला
ब्रह्म है—यही वेदकी आज्ञा है”
इत्यादि वाक्य प्रधानतया निष्प्रपञ्च
ब्रह्मात्मतत्त्वके ही प्रतिपादक है। *
अन्य जो कारणब्रह्मविषयक वाक्य
हैं उनका मुख्य तात्पर्य ब्रह्मतत्त्वके
प्रतिपादनमें नहीं है। किसी भी
ज्ञातव्य वस्तुके सम्बन्धमें अतत्प्रधान
वाक्योंकी अपेक्षा तत्प्रधान वाक्य ही
बलवान् होते हैं। अतः प्रधानतया
ब्रह्म-तत्त्वका प्रतिपादन करनेवाली
[पाद-टिप्पणी / Footnotes]
* उनका मुख्य तात्पर्य प्रपञ्चको चेतनसे अभिन्न सिद्ध करनेमें ही है।
१. जिन वाक्योंमें ज्ञातव्य वस्तुकी चर्चा तो रहती है, पर उनका मुख्य तात्पर्य
उस वस्तुके स्वरूपका प्रतिपादन करनेमें नहीं होता, वे ‘अतत्प्रधान’ कहलाते हैं।
२. जो वाक्य मुख्यतया ज्ञातव्य ‘वस्तु’ के तत्त्वका ही प्रतिपादन करनेमें
तात्पर्य रखते हैं, वे ‘तत्प्रधान’ कहे जाते हैं।
४८ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय १
४८ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय १
श्रुतिप्रतिपन्नत्वान्निर्विशेषमेव श्रुतियोंसे ज्ञात होनेके कारण ब्रह्मको
ब्रह्मावगन्तव्यं न पुनः सविशेष- निर्विशेष ही मानना चाहिये,
मिति निर्विशेषपक्षमुपपाद्य का सविशेष नहीं। इस प्रकार निर्विशेष
तर्ह्याकारवद्विषयाणां श्रुतीनां गतिः? पक्षका समर्थन करनेपर ऐसी आशंका
इत्याकाङ्क्षायां "प्रकाशवच्चा- होनेपर कि 'फिर साकारब्रह्मपरा
वैयर्थ्यात्" (ब्र० सू० ३।२। श्रुतियोंकी क्या गति होगी?'
१५) इति चन्द्रसूर्यादीनां जला- "प्रकाशवच्चावैयर्थ्यात्" इस सूत्रसे
द्युपाधिकृतनानात्ववच्च ब्रह्मणो- यह बतलाया है कि जलादि
ऽप्युपाधिकृतनानात्वरूपस्य विद्य- उपाधियोंके कारण प्रतीत होनेवाले
मानत्वात्तदाकारवतो ब्रह्मण चन्द्र सूर्यादिके नानात्वके समान
आकारविशेषोपदेश उपासनार्थो ब्रह्मका भी उपाधिकृत नानात्वरूप
न विरुध्यते । विद्यमान है। अतः उपासनाके लिये
एवमवैयर्थ्यं नानाकारब्रह्म- औपाधिक आकारवान् ब्रह्मके किसी
विषयाणां वाक्या- आकारविशेषका उपदेश करनेमें भी
निर्विशेषपक्ष- नामिति भेदश्रुती- कोई विरोध नहीं है।
दृढीकरणम् नामौपाधिकब्रह्म- इस प्रकार नानारूप ब्रह्मविषयक
विषयत्वेनावैयर्थ्यमुक्त्वा पुनरपि श्रुतिवाक्य भी व्यर्थ नहीं हैं। इस तरह
निर्विशेषमेव ब्रह्मेति द्रढयितुम् “आह औपाधिकब्रह्मविषयिणी होनेसे भेद-
च तन्मात्रम्” (ब्र० सू० ३।२। श्रुतियोंकी अव्यर्थता बतलाकर फिर
१६) इति। "स यथा सैन्ध- भी यह दृढ करनेके लिये कि
वघनोऽनन्तरोऽबाह्यः कृत्स्नो रस- 'ब्रह्म निर्विशेष ही है' उन्होंने "आह
च तन्मात्रम्" इस सूत्रकी अवतारणा
की है। इस सूत्रमें “जिस प्रकार
नमकका डला बाहर-भीतरसे शून्य
१. [ भिन्न-भिन्न उपाधियोंमें तदनुरूप आकार धारण करनेवाले ] प्रकाशके समान उपाधिभेदसे सविशेष ब्रह्मका प्रतिपादन करनेवाली श्रुति भी व्यर्थ नहीं है।
२. श्रुतिने ब्रह्मकी चिन्मात्रताका प्रतिपादन किया है।
अध्याय १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ४९
घन एव । एवं वा अरेऽय- | [ अर्थात् बाहर-भीतर एक समान
मात्मानन्तरोऽबाह्यः कृत्स्नः प्रज्ञा- | केवल घनीभूत रस ही है] इसी प्रकार
नघन एव” ( बृ० उ० ४ । | यह आत्मा बाहर-भीतरके भेदसे
५ । १३) इति श्रुत्युपन्यासेन | रहित सब-का-सब घनीभूत प्रज्ञान
विज्ञानव्यतिरिक्तरूपान्तराभावमु- | ही है” इस श्रुतिकी व्याख्या करते
पन्यस्य “दर्शयति चाथो अपि | हुए उन्होंने यह दिखलाकर कि
स्मर्यते” (ब्र० सू० ३ । २ । १७) | विज्ञानसे भिन्न और कोई रूप है ही
इति । “अथात आदेशो नेति | नहीं “दर्शयति चाथो अपि स्मर्यते”
नेति” (बृ० उ० २ । ३ । ६) । | यह सूत्र कहा है । इसमें “इससे
“अन्यदेव तद्विदितादथो अवि- | आगे श्रुतिका यही आदेश है—यह
दितादधि” (के० उ० १ । ३) । | आत्मा ऐसा नहीं है, ऐसा नहीं है”,
“यतो वाचो निवर्तन्ते अप्राप्य | “वह विदितसे अन्य है और अविदितसे
मनसा सह” (तैत्ति० उ० २।४।१)। | भी परे है”, “जहाँसे मनके सहित
“प्रत्यस्तमितभेदं यत् | वाणी उसे न पाकर लौट आती है”,
सत्तामात्रमगोचरम् । | “जो भेदसे रहित, सत्तामात्र, वाणीका
वचसामात्मसंवेद्यं | अविषय और स्वसंवेद्य है वही ब्रह्म-
तज्ज्ञानं ब्रह्मसंज्ञितम् ।” | संज्ञक ज्ञान है”, “सर्वरूपसे विलक्षण
“विश्वस्वरूपवैरूप्यं | होना—यह परमात्माका लक्षण है”
लक्षणं परमात्मनः” | इत्यादि श्रुति-स्मृतियोंका उल्लेख करके
इत्यादिश्रुतिस्मृत्युपन्यासमु- | ब्रह्म सर्वभेदशून्य ही है—ऐसा
खेन प्रत्यस्तमितभेदमेव ब्रह्मेत्यु- | प्रतिपादन कर उन्होंने “अतएव
पपाद्य “अत एव चोपमा | चोपमा सूर्यकादिवत्” यह सूत्र
सूर्यकादिवत्” ( ब्र० सू० ३ । | कहा है । [ इसमें यह बतलाया है—]
२ । १८) इति । यत एव | क्योंकि परमात्मा चैतन्यमात्रस्वरूप,
१. 'अथात आदेशो नेति-नेति' इत्यादि श्रुति ब्रह्मको निर्विशेष प्रदर्शित करती
है और 'अनादिमत्परं ब्रह्म' इत्यादि स्मृति भी ऐसा ही कहती है ।
२. इसीलिये [ सविशेष ब्रह्मके विषयमें ] जलप्रतिबिम्बित सूर्यके समान
उपमा दी जाती है ।
५० श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय १
५० श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय १
चैतन्यमात्ररूपो नेति नेत्यात्मको | 'यह भी नहीं, यह भी नहीं' इत्यादि
विदिताविदिताभ्यामन्यो वाचाम- | रूपसे उपलक्षित स्वरूपवाला, ज्ञात
गोचरः प्रत्यस्तमितभेदो विश्व- | और अज्ञातसे भिन्न, वाणीका अविषय,
स्वरूपविलक्षणस्वरूपः परमात्मा- | सब प्रकारके भेदसे रहित और
विद्योपाधिको भेदः । अत एव | सम्पूर्ण रूपोंसे विलक्षण स्वरूपवाला
चास्योपाधिनिमित्तामपारमार्थिकीं | है इसलिये भेद अविद्यारूप उपाधिके
विशेषवत्तामभिप्रेत्य जलसूर्यादि- | कारण है। इसीसे इसकी उपाधि-
रिवेत्युपमा दीयते मोक्षशास्त्रेषु । | निमित्तक अपारमार्थिकी विशेषरूपता-
| के आशयसे ही मोक्षशास्त्रोंमें 'भेद
| जलमें प्रतिबिम्बित सूर्यादिके समान
| है' ऐसी उपमा दी जाती है।
“आकाशमेकं हि यथा |
घटादिषु पृथक्पृथक् । | “जिस प्रकार घटादि उपाधियोंमें
तथात्मैको ह्यनेकश्च | एक ही आकाश पृथक्-पृथक्-सा
जलाधारेष्विवांशूमान् ॥” | भासने लगता है उसी प्रकार विभिन्न
( याज्ञ० ३ । १४४ ) | जलाशयोंमें प्रतिबिम्बित हुए सूर्यके
“एक एव तु भूतात्मा | समान एक ही आत्मा अनेक-सा
भूते भूते व्यवस्थितः । | जान पड़ता है।” “विभिन्न भूतोंमें
एकधा बहुधा चैव | एक ही भूतात्मा स्थित है, जो जलमें
दृश्यते जलचन्द्रवत् ॥” | दिखायी देते हुए चन्द्रमाओंके समान
“यथा ह्ययं ज्योतिरात्मा विवस्वा- | एक और अनेक रूपोंमें भी देखा
नपो भिन्ना बहुधैकोऽनुगच्छन् । | जाता है।” “जिस प्रकार यह
उपाधिना क्रियते भेदरूपो | ज्योतिःस्वरूप एक ही सूर्य भिन्न-भिन्न
देवः क्षेत्रेष्वेवमजोऽयमात्मा॥” | जलाशयोंका अनेक रूप होकर
| अनुगमन करता है उसी प्रकार
| विभिन्न क्षेत्रोंमें यह एक ही अजन्मा
| आत्मदेव उपाधिके द्वारा अनेक रूप
| कर दिया जाता है।”
अध्याय १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ५१
अध्याय १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ५१
इति दृष्टान्तबलेनापि निर्वि- | इस प्रकार दृष्टान्तके बलसे भी
शेषमेव ब्रह्मेत्युपपाद्य "अम्बुवद- | यही सिद्ध करके कि ब्रह्म निर्विशेष
ग्रहणात्" (ब्र० सू० ३।२।१९) | ही है "अम्बुवद्ग्रहणात्तु न तथा-
इत्यात्मनोऽमूर्त्तत्वेन सर्वगतत्वेन | त्त्वम्" इस सूत्रसे यह आशंका की
जलसूर्यादिवन्मूर्त्तसंभिन्नदेशस्थि- | है कि आत्मा अमूर्त्त और सर्वगत है;
तत्वाभावाददृष्टान्तदार्ष्टान्तिकयोः | अतः जल-सूर्यादिके समान उसका
सादृश्यं नास्तीत्याशङ्क्य "वृद्धि- | मूर्त्तरूपसे किसी देशविशेषमें स्थित
हासभाक्त्वम्" (ब्र० सू० ३। | होना सम्भव न होनेके कारण इन
२।२०) इति न हि दृष्टान्त- | दृष्टान्त और दार्ष्टान्तिकोंकी समता
दार्ष्टान्तिकयोर्विवक्षितांशमुक्त्वा | नहीं है। इसपर "वृद्धिहासभाक्त्व-
सर्वसारूप्यं केनचिद्दर्शयितुं श- | मन्तर्भावादुभयसामञ्जस्यादेवम्" इस
क्यते। सर्वसारूप्ये दृष्टान्तदार्ष्टा- | सूत्रसे यह दिखलाया है कि विवक्षित
न्तिकभावोच्छेद एव स्यात्। | अंशको छोड़कर दृष्टान्त और
वृद्धिहासभाक्त्वमत्र विवक्षितम्। | दार्ष्टान्तिककी सर्वांशमें समानता
जलगतसूर्यप्रतिविम्बं जलवृद्धौ | कोई भी नहीं दिखला सकता। यदि
वर्धते जलह्रासे च हसति जल- | सर्वांशमें समानता हो जायगी तो
| उनका दृष्टान्त-दार्ष्टान्तिक भाव ही
| नहीं रहेगा। यहाँ ( जलसूर्यादि
| दृष्टान्तमें ) तो उनका वृद्धिहासयुक्त
| होना ही विवक्षित है। जिस प्रकार
| जलमें पड़ा हुआ सूर्यका प्रतिबिम्ब
| जलके बढ़नेपर बढ़ता, जलके घटने-
१. सूर्यसे भिन्न जलके समान सविशेष ब्रह्मकी उपाधि उससे भिन्न गृहीत न होनेके कारण सूर्यके प्रतिबिम्बसे उसकी उपमा नहीं दी जा सकती।
२. जिस प्रकार सूर्यप्रतिविम्ब जलकी वृद्धि और ह्रास होनेपर स्वयं भी वृद्धि और ह्रासका भागी होता है उसी प्रकार आत्मा वास्तवमें अविकारी और एकरूप होनेपर भी देहादि उपाधियोंके अन्तर्भूत होकर उनके वृद्धि और ह्रासका भागी होता है। इस प्रकार दृष्टान्त और दार्ष्टान्त दोनोंमें सामञ्जस्य होनेके कारण कोई विरोध नहीं है।
५२ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय १ ]
५२ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय १ ]
चलने चलति जलभेदे भिद्यत | पर घटता, जलके चलनेपर चलता
इत्येवं जलधर्मानुविधायि भवति | और जलका भेद होनेपर भिन्न-सा
न तु परमार्थतः सूर्यस्य तत्त्व- | हो जाता है, इस प्रकार वह जलके
मस्ति । एवं परमार्थतोऽविकृत- | धर्मोका अनुकरण करता है, परमार्थतः
मेकरूपमपि सद्ब्रह्म देहाद्युपाध्य- | सूर्यमें वे विकार वास्तविक नहीं
न्तर्भावाद्भवत एवोपाधिधर्मान्वृ- | होते, उसी प्रकार परमार्थतः
द्विह्रासादीनिति विवक्षितांशप्रति- | अविकारी और एकरूप होनेपर भी
पादनेन दृष्टान्तदार्ष्टान्तिकयोः | ब्रह्म देहादि उपाधियोंके अन्तर्गत
सामञ्जस्यमुक्त्वा "दर्शनाच्च" | रहनेसे उन उपाधियोंके वृद्धि-ह्रासादि
(ब्र० सू० ३।२।२१) इति | धर्मोको ग्रहण करता ही है—इस
"पुरश्चक्रे द्विपदः पुरश्चक्रे चतुष्पदः | प्रकार विवक्षित अंशके प्रतिपादनसे
पुरः स पक्षी भूत्वा पुरः पुरुष | दृष्टान्त और दार्ष्टान्तिकका सामञ्जस्य
आविशत्" (बृ० उ० २।५। | बतलाकर "दर्शनाच्च" इस सूत्रांशसे
१८) । "इन्द्रो मायाभिः पुरुरूप | "परमपुरुषने दो चरणोंवाला पुर(शरीर)
ईयते" (बृ० उ० २।५। | बनाया, चार पैरोंवाला पुर बनाया
१९) । "मायां तु प्रकृतिं | और वह पक्षी होकर उन पुरोंमें
विद्यान्मायिनं तु महेश्वरम्" | प्रवेश कर गया", "इन्द्र मायाद्वारा
(श्वेता० उ० ४।१०) । "मायी | अनेक रूपवाला हो जाता है",
सृजते विश्वमेतत्" (श्वेता० उ० | "मायाको प्रकृति जानो और
४।९) । "एकस्तथा सर्वभूता- | मायावीको महेश्वर", "मायावी इस
न्तरात्मा रूपं रूपं प्रतिरूपो | विश्वकी रचना करता है", "उसी
बहिश्च" (क० उ० २।२।९। | प्रकार सम्पूर्ण भूतोंका एक ही
१०) । "एको देवः सर्वभूतेषु | अन्तरात्मा भिन्न-भिन्न रूपोंके अनुरूप
गूढः" (श्वेता० उ० ६।११) । | हो गया है", "समस्त भूतोंमें
| एक ही देव छिपा हुआ है",
१. श्रुतियाँ भी देहादि उपाधियोंमें ब्रह्मका अनुप्रवेश दिखलाती हैं ।
अध्याय १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ५३
अध्याय १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ५३
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“स एतमेव सीमानं विदार्यैतया | “इस मूर्धसीमाको ही विदीर्ण कर वह
द्वारा प्रापद्यत” (ऐत० उ० १ । ३ । | इसीके द्वारा शरीरमें प्रवेश कर गया”,
१२) । “स एष इह प्रविष्ट आन- | “वह नखके अग्रभागसे लेकर शिखा-
खाग्रेभ्यः” (बृ० उ० १ । ४ । | तक इस शरीरमें प्रवेश किये हुए है”,
७) । “तत्सृष्ट्वा तदेवानुप्रावि- | “उसे रचकर वह उसीमें अनुप्रविष्ट
शत्” (तैत्ति० उ० २ । ६ । १) | हो गया” इत्यादि श्रुतियोंद्वारा
इत्यादिना परस्यैव ब्रह्मण उपा- | परब्रह्मको ही उपाधिकी प्राप्ति
धियोगं दर्शयित्वा निर्विशेषमेव | दिखलाकर इस प्रकार उपसंहार
ब्रह्म । भेदस्तु जलसूर्यादिवदौ- | किया है कि ब्रह्म निर्विशेष ही है;
पाधिको मायानिबन्धन इत्युप- | उसका जो मायाजनित भेद है वह
संहृतवान् । | जल-सूर्यादिके समान उपाधिके
| कारण है ।
किञ्च ब्रह्मविदामनुभवोऽपि | इसके सिवा ब्रह्मवेत्ताओंका
[प्रपञ्चस्य] प्रपञ्चस्य बाधकः । | अनुभव भी प्रपञ्चका बाधक है,
[बाधितत्वे] तेषां निष्प्रपञ्चात्म- | क्योंकि उन्हें निष्प्रपञ्च आत्माका
[ब्रह्मविदनुभव-] दर्शनस्य विद्यमान- | अनुभव रहता है । ऐसा ही यह
[प्रदर्शनम्] त्वात् । तथा हि | श्रुति उनका अनुभव प्रदर्शित करती
तेषामनुभवं दर्शयति । “यस्मिन् | है—“जिस स्थितिमें ज्ञानीको सब
सर्वाणि भूतानि आत्मैवाभू- | भूत आत्मा ही हो जाते हैं, उसमें
द्विजानतः । तत्र को मोहः | उस एकत्वदर्शीके लिये क्या शोक
कः शोक एकत्वमनुपश्यतः” | और क्या मोह हो सकता है ?”
(ई० उ० ७) । “विदिते वेद्यं | “बोध हो जानेपर कोई ज्ञेय नहीं
नास्ति” इति । एवं निर्वाणमनु- | रहता” इत्यादि । इसी प्रकार
शासनम् । “यत्र वा अन्यदिव | निर्वाणका भी उपदेश किया है—
स्यात्तत्रान्योऽन्यत्पश्येत्” (बृ० | “जहाँ अन्य-सा हो वहाँ अन्य
उ० ४ । ३ । ३१) । “यत्र | अन्यको देखे,” किन्तु “जिस
त्वस्य सर्वमात्मैवाभूत्तत्केन कं | स्थितिमें इसे सब आत्मा ही हो गया
पश्येत्” (बृ० उ० ४ । ५ । १५)। | है उसमें किससे किसे देखे ?”
˙ श्वेता० ३—
५४ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय १
५४ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय १
[उपनिषदारम्भप्रयोजनोपसंहारः]
"यदेतद्दृश्यते मूर्त्त-
मेतज्ज्ञानात्मनस्तव ।
भ्रान्तिज्ञानेन पश्यन्ति
जगद्रूपमयोगिनः ॥
ये तु ज्ञानविदः शुद्ध-
चेतसस्तेऽखिलं जगत् ।
ज्ञानात्मकं प्रपश्यन्ति
त्वद्रूपं पारमेश्वरम् ॥"
(विष्णुपु० १ । ४ । ३९, ४१)
"निदाघोऽप्युपदेशेन
तेनाद्वैतपरोऽभवत् ।
सर्वभूतान्यशेषेण
ददर्श स तदात्मनः ॥
तथा ब्रह्म ततो मुक्ति-
मवाप परमां द्विजः ।"
(विष्णुपु० २ । १६ । १९-२०)
"अत्रात्मव्यतिरेकेण
द्वितीयं यो न पश्यति ।
ब्रह्मभूतः स एवेह
वेदशास्त्र उदाहृतः ॥"
"यह जो कुछ मूर्त्त जगत् दिखायी देता है वह ज्ञानस्वरूप आपका ही रूप है। अज्ञानीलोग भ्रान्तिज्ञानके कारण इसे जगद्रूप देखते हैं। किन्तु जो शुद्धचित्त ज्ञानवान् पुरुष हैं वे इस सम्पूर्ण जगत्को आप ज्ञानस्वरूप परमात्माका ही स्वरूप देखते हैं।" "ऋभुके उस उपदेशसे निदाघ भी अद्वैतपरायण हो गया और सब प्राणियोंको सर्वथा आत्मस्वरूप देखने लगा। तथा उसे ब्रह्मसाक्षात्कार हो गया। हे द्विज ! फिर उसे आत्यन्तिक मोक्षपद प्राप्त हो गया।" "इस लोकमें जो पुरुष आत्मासे भिन्न अन्य कुछ नहीं देखता उसीको वेद और शास्त्रोंमें ब्रह्मभूत कहा है।"
इत्येवं श्रुतिस्मृतियुक्तितोऽनुभवतश्च प्रपञ्चस्य बाधितत्वादत्यन्तविलक्षणानामसदृशरूपाणां मधुरतिक्तश्वेतपीतादीनामपि परस्पराध्यासदर्शनादमूर्तेऽप्याकाशे तलमलिनताद्यध्यासदर्शनादात्मानात्मनोरत्यन्तविलक्षणयोर्मूर्त्ताम्-
इस प्रकार श्रुति, स्मृति, युक्ति और अनुभवसे भी प्रपञ्च बाधित है, अत्यन्त विलक्षण और विभिन्नरूपवाले मधुर-तिक्त एवं श्वेत-पीतादि पदार्थोंका भी परस्पर अध्यास देखा जाता है और अमूर्त्त आकाशमें भी तलमलिनतादिका अध्यास देखा गया है, इसलिये परस्पर अत्यन्त विलक्षण मूर्त्तिमान् और मूर्त्तिहीन अनात्मा एवं