श्वेताश्वतरोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Shvetashvatara Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 53, कुल 276 में से
संदर्भ में पढ़ेंअध्याय १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ३९
न तत्तथा तत्र कुतो हि तत्त्वम् ॥ | रहती, उसमें वास्तविकता कैसे हो
मही घटत्वं घटतः कपालिका | सकती है ? देखो, मृत्तिका ही घटरूप
कपालिकाचूर्णरजस्ततोऽणुः । | हो जाती है, फिर वही घटसे कपाल,
जनैः स्वकर्मस्तिमितआत्मनिश्चयै- | कपालसे चूर्ण रज और रजसे अणु-
रालक्ष्यते ब्रूहि किमत्र वस्तु ॥ | रूप हो जाती है। फिर बताओ तो
तस्मान्न विज्ञानमृतेऽस्ति किञ्चि- | सही, अपने कर्मके वशीभूत हो
त्क्वचित्कदाचिद्द्विज वस्तुजातम्। | आत्मनिश्चयको भूले हुए मनुष्य इसमें
विज्ञानमेकं निजकर्मभेद- | कौन-सी सत्य वस्तु देखते हैं ? अतः
विभिन्नचित्तैर्बहुधाभ्युपेतम् ॥ | हे द्विज ! विज्ञानके सिवा कभी कहीं
ज्ञानं विशुद्धं विमलं विशोक- | कोई भी पदार्थसमूह नहीं है।
मशेषलोभादिनिरस्तसङ्गम् । | अपने-अपने कर्मोंके कारण विभिन्न
एकं सदैकं परमः परेशः | चित्तवृत्तियोंसे युक्त पुरुषोंको एक
स वासुदेवो न यतोऽन्यदस्ति ॥ | विज्ञान ही विभिन्नरूपसे प्रतीत हो
सद्भाव एवं भवतो मयोक्तो | रहा है। राग-द्वेषादि मलसे रहित,
ज्ञानं तथा सत्यमसत्यमन्यत् । | शोकशून्य, लोभादि सम्पूर्ण दोषोंसे
एतन्तु यत्संव्यवहारभूतं | वर्जित, सदा एकरस एवं असंग एकमात्र
तत्रापि चोक्तं भुवनाश्रितं ते ॥" | विशुद्ध विज्ञान ही वह सर्वश्रेष्ठ परमेश्वर
(२।१२। ४१-४५) | वासुदेव है; उससे भिन्न और कुछ
"अविद्यासंचितं कर्म | भी नहीं है। इस प्रकार मैंने तुम्हारे
तच्चाशेषेषु जन्तुषु ॥ | प्रति परमार्थका निरूपण किया।
आत्मा शुद्धोऽक्षरः शान्तो | बस, एक ज्ञान ही सत्य है, और
निर्गुणः प्रकृतेः परः । | सब मिथ्या है। उसके सिवा यह जो
| व्यावहारिक सत्य है उस त्रिभुवनके
| विषयमें भी वर्णन कर दिया।"
| "कर्म अविद्याजनित है और वह
| सभी जीवोंमें विद्यमान है; किन्तु
| आत्मा शुद्ध, निर्विकार, शान्त,
| निर्गुण और प्रकृतिसे अतीत है।