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सर्वकोश
श्वेताश्वतरोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

श्वेताश्वतरोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Shvetashvatara Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished276 पृष्ठ

पृष्ठ 60, कुल 276 में से

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पृष्ठ 60

४६ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय १

चैवमेके” (ब्र० सू० ३।२।१३) | पश्चात् “अपि चैवमेके” इस सूत्रसे
इति भेदनिन्दापूर्वकमभेदमेवैके | यह निश्चय किया है कि कोई-कोई
शाखिनः समामनन्ति—“मन- | शाखावाले भेददृष्टिकी निन्दा करते
सैवेदमाप्तव्यम्” (क० उ० ४। | हुए अभेदका ही प्रतिपादन करते
११)। “नेह नानास्ति किञ्चन।” | हैं। [ उनका कथन है कि ] “यह
मृत्योः स मृत्युमाप्नोति य इह | मनसे ही प्राप्त किया जा सकता है”,
नानेव पश्यति” (बृ० उ० ४। | “यहाँ नाना कुछ नहीं है”,
४।१९)। “एकधैवानुद्रष्टव्य- | “यहाँ जो अनेकवत् देखता है वह
मिति” (बृ० उ० ४।४।२०)। | मृत्युसे मृत्युको प्राप्त होता है”,
“भोक्ता भोग्यं प्रेरितारं च मत्वा | “उसे एकरूप ही देखना चाहिये”,
सर्वं प्रोक्तं त्रिविधं ब्रह्ममेतत्” | तथा “भोक्ता, भोग्य और प्रेरक
(श्वेता० उ० १। १२) इति | मानकर जिसे तीन प्रकारका कहा
सर्वभोग्यभोक्तृनियन्तृलक्षणस्य | गया है वह सब ब्रह्म ही है”
प्रपञ्चस्य ब्रह्मैकस्वभावताभिधीयत | इत्यादि श्रुतियोंसे भोक्ता, भोग्य और
इति। | प्रेरकरूप सम्पूर्ण प्रपञ्च एकमात्र
| ब्रह्मस्वरूप ही कहा गया है।
पुनरपि निर्विशेषपक्षे दृढीकृते | इस प्रकार फिर भी निर्विशेष
सविशेषत्वमाशङ्क्य किमित्येकस्वरूपस्य | पक्षकी ही पुष्टि होनेपर ‘एकस्वरूप
तन्निरसनं उभयस्वरूपासंभवे- | ब्रह्मका उभयरूप होना असम्भव
श्रुतिविरोध- | है, इसलिये ब्रह्मको निराकार ही
परिहारश्च ऽनाकारमेव ब्रह्माव- | क्यों निश्चय किया जाता है उससे
धार्यते न पुनर्विपरीतमित्याशङ्क्य | विपरीत साकार क्यों नहीं माना जाता’
“अरूपवदेव हि तत्प्रधानत्वात्” | ऐसी आशंका कर “अरूपवदेव हि
(ब्र० सू० ३।२।१४) इति रूपाद्या- | तत्प्रधानत्वात्” इस सूत्रसे यह कहा

१. अपि तु किसी-किसी शाखावाले इस प्रकार ही [ अर्थात् भेदकी निन्दा-
पूर्वक अभेदका ही ] प्रतिपादन करते हैं ।
२. ब्रह्म रूपरहित ही है, क्योंकि प्रधानतया ब्रह्मका प्रतिपादन करनेवाली
‘अस्थूलम्’ इत्यादि श्रुति निर्गुणप्रधान ही है ।