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श्वेताश्वतरोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Shvetashvatara Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished276 पृष्ठ

११४ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय १

११४ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय १
व्यगमनादिभेदप्रत्यस्तमयाद्विनैवो- | गन्तव्य और गमनादि सम्पूर्ण भेदकी
त्क्रान्तिं देवयानं च ब्रह्म- | निवृत्ति हो जानेसे उत्क्रान्ति और
ज्ञानसमनन्तरं जीवन्मुक्तो ब्रह्म- | देवयानमार्गके बिना ही ब्रह्मज्ञानके
ज्ञानसमनन्तरं ब्रह्मानन्दमनुभूय | अनन्तर जीवन्मुक्त हो जाता है।
आत्मरतिरात्मतृप्त आत्मनैवान्तः- | वह ब्रह्मज्ञानके पश्चात् ब्रह्मानन्दका
सुखोऽन्तरारामोऽन्तर्ज्योतिरात्म- | अनुभव कर आत्मरति और आत्मतृप्त
क्रीड आत्मरतिरात्ममिथुन | हो अपने आत्मामें ही आन्तरिक
आत्मानन्द इहैव स्वाराज्ये | सुख, रमण एवं प्रकाशका अनुभव
भूम्नि स्वे महिम्न्यमृतोऽवतिष्ठते । | करता हुआ आत्मक्रीड, आत्मरति,
तद्धेतुत्वाद्वाह्यविषयपरित्यागेन | आत्ममिथुन और आत्मानन्द होकर
ब्रह्मण्याधाय वाङ्मनःकायनिष्पाद्यं | इसी लोकमें स्वाराज्य अर्थात् अपनी
श्रौतस्मार्तलक्षणं कर्म कृत्वा | सार्वभौम महिमामें अमृतरूपसे स्थित
विशुद्धसत्त्वो योगारूढो भूत्वा | हो जाता है। वह बाह्य विषयोंको
शमादिसाधनसंपन्नः । | त्यागकर मन, वाणी और शरीरसे
“योगी युञ्जीत सतत- | होनेवाले सम्पूर्ण श्रौत-स्मार्त कर्मोंको
मात्मानं रहसि स्थितः । | ब्रह्मार्पण करके अनुष्ठान करता हुआ
एकाकी यतचित्तात्मा | शुद्धचित्त और योगारूढ होकर
निराशीरपरिग्रहः ॥ | शमादि साधनोंसे सम्पन्न हो जाता
एवं युञ्जन्सदात्मानं | है, क्योंकि ये ही साधन ब्रह्मज्ञानकी
योगी विगतकल्मषः । | प्राप्तिके हेतु हैं।
सुखेन ब्रह्मसंस्पर्श- | “ध्यानयोगीको एकान्तमें अकेले
मत्यन्तं सुखमश्नुते ॥ | ही स्थित हो सब प्रकारकी आशा और
| परिग्रहका त्याग कर शरीर और मनका
| निग्रह करते हुए निरन्तर योगका
| अभ्यास करना चाहिये । इस प्रकार
| सर्वदा योगसाधनमें लगा हुआ वह
| पापहीन योगी सुगमतासे ही ब्रह्म-
| साक्षात्काररूप अत्यन्त उत्कृष्ट सुख

अध्याय १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ११५

अध्याय १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ११५
सर्वभूतस्थमात्मानं प्राप्त कर लेता है। जिसकी सर्वत्र
सर्वभूतानि चात्मनि । समदृष्टि है वह योगयुक्त पुरुष
ईक्षते योगयुक्तात्मा अपने आत्माको सम्पूर्ण भूतोंमें और
सर्वत्र समदर्शनः ॥” सम्पूर्ण भूतोंको अपने आत्मामें स्थित
(गीता ६ । १०, २८, २९) देखता है।” “इस प्रकार सर्वत्र समान
“समं पश्यन्हि सर्वत्र भावसे स्थित ईश्वरको समानरूपसे
समवस्थितमीश्वरम् । देखता हुआ वह स्वयं अपना घात
न हिनस्त्यात्मनात्मानं नहीं करता, और फिर परमगतिको
ततो याति परां गतिम्॥” प्राप्त होता है।” इत्यादि स्मृतिवाक्य
(गीता १३ । २८) इसमें प्रमाण हैं ॥११॥
इति स्मृतेः ॥ ११ ॥
ब्रह्मकी ज्ञातव्यता
यस्माज्ज्ञानानन्तरं परमपुरुषा- क्योंकि ज्ञानके पश्चात् परम
र्थसिद्धिस्तस्मात्— पुरुषार्थकी सिद्धि होती है, इसलिये—
एतज्ज्ञेयं नित्यमेवात्मसंस्थं
नातः परं वेदितव्यं हि किञ्चित् ।
भोक्ता भोग्यं प्रेरितारं च मत्वा
सर्वं प्रोक्तं त्रिविधं ब्रह्ममेतत् ॥१२॥
अपने आत्मामें स्थित इस ब्रह्मको सर्वदा ही जानना चाहिये । इससे
बढ़कर और कोई ज्ञातव्य पदार्थ नहीं है। भोक्ता (जीव), भोग्य
(जगत्) और प्रेरक (ईश्वर)—यह तीन प्रकारसे कहा हुआ पूर्ण ब्रह्म
ही है--ऐसा जानना चाहिये ॥ १२ ॥
एतत्प्रकृतं केवलात्माकाश- इस प्रकृत विशुद्ध आत्माकाशस्वरूप
ब्रह्मरूपं नित्यं नियमेन ज्ञेयम् । ब्रह्मको नित्य—नियमसे जानना

११६ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय १

११६ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय १
किमन्यान्यसंस्थं न स्वात्मसंस्थं | चाहिये। क्या यह किसी अन्यमें
ज्ञेयं नानात्मनि बाह्ये। श्रूयते | स्थित है ? नहीं, इसे अपने आत्मामें
च—"तमात्मस्थं येऽनुपश्यन्ति | ही स्थित जानना चाहिये, किसी
धीरास्तेषां शान्तिः शाश्वती | बाह्य अनात्मामें नहीं। श्रुति भी
नेतरेषाम्” (क० उ० २।२। | कहती है—"जो बुद्धिमान् आत्मामें
१२) इति। | स्थित उस परब्रह्मको देखते हैं उन्हें
| ही नित्य शान्ति प्राप्त होती है,
| दूसरोंको नहीं।"
तथा च शिवधर्मोत्तरे योगि- | तथा शिवधर्मोत्तरमें भी योगियों-
नामात्मनि स्थितिः— | की आत्मामें ही स्थिति दिखलायी है—
"शिवमात्मनि पश्यन्ति | "योगिजन शिवका आत्मामें ही
प्रतिमासु न योगिनः। | दर्शन करते हैं, प्रतिमाओंमें नहीं।
आत्मस्थं यः परित्यज्य | जो पुरुष आत्मामें स्थित शिवका
बहिःस्थं यजते शिवम्॥ | परित्याग कर बाह्य शिवका पूजन
हस्तस्थं पिण्डमुत्सृज्य | करता है वह मानो हाथका ग्रास
लिह्यात्कूर्परमात्मनः । | गिराकर केवल अपनी हथेली चाटता
सर्वत्रावस्थितं शान्तं | है। जिस प्रकार अन्धा आदमी उदय
न पश्यन्तीह शङ्करम्॥ | हुए सूर्यको नहीं देख सकता उसी
ज्ञानचक्षुर्विहीनत्वा- | प्रकार ज्ञाननेत्रोंसे रहित होनेके
दन्धः सूर्यं यथोदितम् । | कारण लोग सर्वत्र विद्यमान शान्त-
यः पश्येत्सर्वगं शान्तं | स्वरूप शिवका दर्शन नहीं कर
तस्याध्यात्मस्थितः शिवः॥ | पाते। जो पुरुष सर्वगत शान्तमूर्ति
आत्मस्थं ये न पश्यन्ति | शिवका दर्शन करता है उसके तो
तीर्थे मार्गन्ति ते शिवम्। | अन्तःकरणमें ही शिव विराजमान
| हैं, किन्तु जो आत्मस्थ शिवको नहीं
| देख सकते वे ही उन्हें तीर्थस्थानमें

अध्याय १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ११७

अध्याय १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ११७

आत्मस्थं तीर्थमुत्सृज्य | खोजते हैं । जो पुरुष आत्मस्थ
बहिस्तीर्थादि यो व्रजेत् ॥ | तीर्थको त्यागकर बाह्य तीर्थादिमें
करस्थं स महारत्नं | जाता है वह मानो अपने हाथका
त्यक्त्वा काचं विमार्गति । | महारत्न गिराकर काँच ढूँढ़ता
| फिरता है ।"
अथवैतद्यदपरोक्षं प्रत्यगात्म- | अथवा [ इसका यह भी तात्पर्य
त्वं तन्नित्यमविनाशि स्वे महिम्नि | हो सकता है कि ] यह जो अपरोक्ष
स्थितं ब्रह्मैव ज्ञेयम् । कस्मात् ? | प्रत्यगात्मा है उसे अपनी महिमामें
हिशब्दो यस्मादर्थे । यस्मान्नातः | स्थित नित्य और अविनाशी ब्रह्म ही
परं वेदितव्यमस्ति किञ्चिदपि । | जानना चाहिये । क्यों?—यहाँ 'हि'
श्रूयते च बृहदारण्यके—"तदे- | शब्द 'यस्मात् ( क्योंकि )' अर्थमें
तत्पदनीयमस्य सर्वस्य यदयमा- | है—क्योंकि इससे बढ़कर और
त्मा" (बृ० उ० १।४।७) इति । | कुछ भी जाननेयोग्य नहीं है ।
| बृहदारण्यकश्रुतिमें भी ऐसा ही है—
| "यह जो आत्मा है वही समस्त
| जीवोंका गन्तव्य स्थान है ।"
कथमेतज्ज्ञेयम् ? इत्याह—भोक्ता | इसे किस प्रकार जानना चाहिये ?
जीवो भोग्यमितरत्सर्वं प्रेरितान्त- | सो श्रुति बतलाती है—जीव भोक्ता
र्यामी परमेश्वरः । तदेतत्त्रिविधं | है, भोक्ता और अन्तर्यामीसे
प्रोक्तं ब्रह्मैवेति । भोक्त्राद्यशेष- | अतिरिक्त और सब भोग्य है तथा
भेदप्रपञ्चविलापनेनैव निर्विशेषं | अन्तर्यामी परमेश्वर प्रेरिता है—यह तीन
ब्रह्मात्मानं जानीयादित्यर्थः । | प्रकारसे कहा हुआ ब्रह्म ही है इस
| प्रकार [ जानना चाहिये ] । तात्पर्य यह
| है कि भोक्तादि सम्पूर्ण भेदरूप प्रपञ्च-
| का लय करके ही निर्विशेष ब्रह्मको
| आत्मस्वरूपसे जानना चाहिये ।

११८ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय १

११८ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय १
तथा चोक्तं कावषेयगीतायाम्—
“त्यक्त्वा सर्वविकल्पांश्च
स्वात्मस्थं निश्चलं मनः ।
कृत्वाऽशान्तो भवेद्योगी
दग्धेन्धन इवानलः ॥”
तथा च श्रीविष्णुपुराणे—
“तस्यैव कल्पनाहीन-
स्वरूपग्रहणं हि यत् ।
मनसा ध्याननिष्पाद्यं
समाधिः सोऽभिधीयते ॥”
(६ । ६ । ९२)
इति ॥ १२ ॥
ऐसा ही कावषेय गीतामें भी कहा है—“योगी सम्पूर्ण विकल्पों- को त्यागकर मनको अपने आत्मामें निश्चलरूपसे स्थिर कर जिसका ईँधन जल चुका है उस अग्निके समान शान्त हो जाता है ।”
तथा श्रीविष्णुपुराणमें कहा है— “उस ध्येय परमेश्वरका ही जो मनके द्वारा ध्यानसे सिद्ध होनेयोग्य कल्पनाहीन ( ध्याता, ध्यान और ध्येयके भेदसे रहित ) स्वरूप ग्रहण किया जाता है उसे ही समाधि कहते हैं ॥१२॥
प्रणव-चिन्तनसे ब्रह्म-साक्षात्कारका दृष्टान्तोंद्वारा समर्थन
इदानीम् “ओमित्येतेनैवाक्ष-
रेण परं पुरुषमभिध्यायीत” (प्र०
उ० ५ । ५) । “ओमित्यात्मानं
युञ्जीत” (महानारा० २४ । १)।
“ओमित्यात्मानं ध्यायीत” इति
श्रुतेरात्मानमन्विष्य पराभिध्याने
प्रणवस्य नियमादभिध्यानाङ्गत्वेन
प्रणवं दर्शयति—
अब “ॐ इस अक्षरसे ही परम पुरुषका ध्यान करना चाहिये” “ॐ इस अक्षरके द्वारा ही आत्मचिन्तन करना चाहिये” “ॐ इस अक्षरके द्वारा ही आत्माका ध्यान करना चाहिये” इत्यादि श्रुतियोंसे आत्मा- न्वेषण करके उसका ध्यान करनेमें प्रणवचिन्तनका नियम होनेसे श्रुति प्रणवको आत्मचिन्तनके अंगरूपसे प्रदर्शित करती है—
वह्नेर्यथा योनिगतस्य मूर्ति-
र्नदृश्यते नैव च लिङ्गनाशः ।

अध्याय १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ११९

अध्याय १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ११९
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स भूय एवेन्धनयोनिगृह्य-
स्तद्वोभयं वै प्रणवेन देहे ॥१३॥

जिस प्रकार अपने आश्रय [ काष्ठ ] में स्थित अग्निका रूप दिखायी
नहीं देता और न उसके लिङ्ग ( सूक्ष्मस्वरूप ) का ही नाश होता है
और फिर ईंधनरूप कारणके द्वारा ही उसका ग्रहण हो सकता है उसी प्रकार
अग्नि और अग्निलिङ्गके समान ही इस देहमें प्रणवके द्वारा आत्माका ग्रहण
किया जा सकता है ॥ १३ ॥

वह्नेर्यथेति। वह्नेर्यथा योनि- | 'वह्नेर्यथा' इत्यादि । जिस प्रकार
गतस्यारणिगतस्य मूर्तिः स्वरूपं | योनि अर्थात् अरणिमें स्थित अग्निकी
न दृश्यते मथनात्प्राङ्नैव च | मूर्ति–स्वरूपको मन्थनसे पूर्व देखा
लिङ्गस्य सूक्ष्मदेहस्य विनाशः। | नहीं जा सकता और न उसके लिंग
स एवारणिगतोऽग्निर्भूयः पुनः | यानी सूक्ष्म रूपका नाश ही होता
पुनरिन्धनयोनिना मथनेन गृह्यः। | है । तथा अरणिमें स्थित वह अग्नि
योनिशब्दोऽत्र कारणवचनः । | फिर ईंधनयोनिसे पुनः-पुनः मन्थन
इन्धनेन कारणेन पुनः पुनर्मथ- | करनेपर प्रकट देखा भी जा
नाद्गृह्यः। 'तद्वोभयम्' इवार्थो | सकता है। यहाँ 'योनि' शब्द
वाशब्दः। तच्चोभयं तदुभयमिव | कारणका वाचक है; अर्थात् ईंधनरूप
मथनात्प्राङ् न गृह्यते। मथनेन | कारणके द्वारा पुनः-पुनः मन्थन
च गृह्यते । तद्वदात्मा वह्निस्था- | करनेपर वह ग्रहण किया जा सकता
| है । 'तद्वा उभयम्' यहाँ वा शब्द
| इव ( सादृश्य ) अर्थमें है । अर्थात्
| उन दोनों (अग्नि और अग्नि-लिंग) के
| समान, जैसे मन्थनसे पूर्व उनका
| ग्रहण नहीं होता था किन्तु मन्थन
| करनेपर वे दिखायी देने लगते हैं,
| उसी प्रकार अग्निस्थानीय आत्मा

१२० श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय १

१२० श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय १
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नीयः प्रणवेनोत्तरारणिस्थानीयेन । उत्तरारणिस्थानीय प्रणवके द्वारा मनन-
मननाद्गृह्यते देहेऽधरारणिस्था- । से अधरारणिस्थानीय देहमें ग्रहण
नीये ॥ १३ ॥ । किया जा सकता है ॥१३॥
तदेव प्रपञ्चयति— । अब श्रुति उस ( मन्थन ) का
। ही विस्तारसे वर्णन करती है---
स्वदेहमरणिं कृत्वा प्रणवं चोत्तरारणिम् ।
ध्याननिर्मथनाभ्यासाद्देवं पश्येन्निगूढवत् ॥ १४॥
अपने देहको अरणि और प्रणवको उत्तरारणि करके ध्यानरूप
मन्थनके अभ्याससे स्वप्रकाश परमात्माको छिपे हुए [ अग्नि ] के समान
देखे ॥ १४ ॥
स्वदेहमिति । स्वदेहमरणिं । ‘स्वदेहम्’ इत्यादि । अपने देहको
। अरणि—नीचेका काष्ठ करके, तथा
कृत्वाधरारणिं ध्यानमेव निर्मथनं । ध्यान ही निर्मन्थन है, उस निर्मन्थन-
तस्य निर्मथनस्याभ्यासाद्देवं ज्यो- । के अभ्याससे देव—ज्योतिस्वरूप
। परमात्माको छिपे हुए अग्निके समान
तीरूपं प्रपश्येन्निगूढाग्निवत् ॥१४॥ । देखे ॥ १४ ॥
उक्तस्यार्थस्य द्रढिम्ने दृष्टान्तान् । उपर्युक्त अर्थकी पुष्टिके लिये
बहून्दर्शयति— । श्रुति बहुत-से दृष्टान्त दिखाती है—
तिलेषु तैलं दधनीव सर्पि-
रापः स्रोतःस्वरणीषु चाग्निः ।
एवमात्मात्मनि गृह्यतेऽसौ
सत्येनैनं तपसा योऽनुपश्यति ॥१५॥

अध्याय १ ] शाङ्करभाष्यार्थ १२१

अध्याय १ ] शाङ्करभाष्यार्थ १२१
जिस प्रकार तिलोंमें तैल, दहीमें घी, स्रोतोंमें जल और काष्ठोंमें
अग्नि देखे जाते हैं उसी प्रकार जो पुरुष सत्य और तपके द्वारा इसे वारम्बार
देखनेका प्रयत्न करता है उसे यह आत्मा आत्मामें ही दिखायी देता है ॥१५॥
तिलेष्विति । यन्त्रपीडनेन | 'तिलेषु' इत्यादि । जिस प्रकार
| यन्त्रसे पेरनेपर तिलोंमें तैल दिखायी
तैलं गृह्यते । दधिनि मथनेन | देता है, मन्थन करनेपर दहीमें घी
सर्पिरिव । आपः स्रोतःसु नदीषु | देखा जाता है, पृथिवी खोदनेपर
| स्रोत—अन्तःस्रोता नदियोंमें जल
भूखननेन । अरणीषु चाग्निर्मथ- | दिखायी देता है और मन्थन करनेपर
| काष्ठोंमें अग्निकी उपलब्धि होती है
नेन । एवमात्मात्मनि स्वात्मनि | उसी प्रकार मननसे आत्मामें अपने
गृह्यतेऽसौ मननेनात्मभूतदेहादि- | अन्तरात्मामें ही इस आत्माकी
| उपलब्धि होती है, अर्थात् आत्मभूत
ष्वन्नमयाद्यशेषोपाधिप्रविलापनेन | देहादिमें जो अन्नमयादि सम्पूर्ण
| उपाधियाँ हैं उनका लय करनेपर
निर्विशेषे पूर्णानन्दे स्वात्मन्येवा- | अपने निर्विशेष पूर्णानन्दस्वरूप
| आत्मामें ही इस ( परमात्मा ) का
वगम्यत इत्यर्थः । | अनुभव होता है ।
केन तर्हि पुरुषेणात्मन्येव | अच्छा तो किस पुरुषको आत्मा-
| में ही इस आत्माकी उपलब्धि होती
गृह्यते ? इत्यत आह—सत्येन | है, सो अब बतलाते हैं—सत्यसे
| अर्थात् यथार्थ और प्राणिमात्रके लिये
यथाभूतहितार्थवचनेन भूत- | हितकर सम्भाषणसे, क्योंकि “जो
हितेन । “सत्यं भूतहितं प्रोक्तम्” | प्राणियोंके लिये हितकर हो उसे सत्य
| कहते हैं” ऐसी स्मृति है तथा मन
इति स्मरणात् । तपसेन्द्रियमन- | और इन्द्रियोंकी एकाग्रतारूप तपसे,
सामैकाग्र्यलक्षणेन । “मनसश्चे- | क्योंकि स्मृति कहती है “मन और

१२२ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय १

१२२ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय १
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न्द्रियाणां च ऐकाग्र्यं परमं तपः" | इन्द्रियोंकी एकाग्रता ही परम तप है।"
इति स्मरणात् । एनमात्मानं | अतः इन सत्य और तपके द्वारा जो
योऽनुपश्यति ॥ १५ ॥ | इस आत्माको देखता है [ उसे इसकी उपलब्धि होती है ] ॥ १५ ॥
कथमेनमनुपश्यति ? इत्यत | इस परमात्माको किस प्रकार देखता है ? सो बताते हैं—
आह— |
सर्वव्यापिनमात्मानं क्षीरे सर्पिरिवार्पितम् ।
आत्मविद्यातपोमूलं तद्ब्रह्मोपनिषत्परम् ॥
तद्ब्रह्मोपनिषत्परम् ॥१६॥
जो आत्मविद्या और तपका मूल है तथा जिसमें परम श्रेय आश्रित
है उस सर्वव्यापी आत्माको दूधमें विद्यमान घृतके समान देखता है ॥१६॥
सर्वव्यापिनमिति । सर्वं प्रकृ- | 'सर्वव्यापिनम्' इत्यादि । जो
त्यादिविशेषान्तं व्याप्यावस्थितं | केवल देहेन्द्रियादि अध्यात्ममात्रमें
न देहेन्द्रियाद्यध्यात्ममात्रावस्थि- | ही स्थित नहीं है अपि तु प्रकृतिसे
तमात्मानं क्षीरे सर्पिरिव सारत्वेन | लेकर पञ्चभूतपर्यन्त सबको व्याप्त
निरन्तरतयात्मत्वेन सर्वेष्वर्पित- | करके स्थित है, उस आत्माको दूधमें
मात्मविद्यातपोमूलं कारणम् । | साररूपसे स्थित घीके समान सबमें
श्रूयते च—"एष ह्येव साधुकर्म | अखण्ड आत्मभावसे विद्यमान तथा
कारयति।" (कौषी० उ० ३।८) | आत्मविद्या और तपके मूल यानी
"ददामि बुद्धियोगं तं येन | कारणरूपसे देखते हैं । श्रुति भी
मामुपयान्ति ते" ( गीता १० । | कहती है—"यही शुभ कर्म कराता
१०) इति । | है", तथा [स्मृति कहती है—] "मैं उन्हें वह बुद्धियोग देता हूँ जिससे वे मुझे प्राप्त कर लेते हैं।"

अध्याय १ ] शाङ्करभाष्यार्थ १२३

अध्याय १ ] शाङ्करभाष्यार्थ १२३
अथवाऽऽत्मविद्या च तपश्च अथवा ऐसा भी अर्थ हो सकता
यस्यात्मलाभे मूलं हेतुरिति । है—आत्मविद्या और तप ये जिस आत्माकी प्राप्तिके मूल यानी कारण
तथा च श्रुतिः—"विद्ययामृत- हैं, जैसा कि श्रुति कहती है—
मश्नुते" (ई० उ० ११)। "तपसा "ज्ञानसे अमृतकी प्राप्ति होती है"
ब्रह्म विजिज्ञासस्व" (तै० उ० ३। "तपसे ब्रह्मको जाननेकी इच्छा
२। १) इति च। ब्रह्मोपनिषत्प- करो" इत्यादि । 'ब्रह्मोपनिषत्परम्'—
रमुपनिषण्णमस्मिन्परं श्रेय इति । जिसमें परम श्रेय उपनिषण्ण (आश्रित) है । तात्पर्य यह है कि जो सत्यादि-
यः सत्यादिसाधनसंयुक्तः स एनं साधनसम्पन्न है वही जो दूधमें घृतके
सर्वव्यापिनमात्मानं क्षीरे सर्पि- समान सर्वगत और आत्मविद्या एवं तपका मूल है तथा जो ब्रह्मोपनिषत्पर
रिवार्पितमात्मविद्यातपोमूलं तद्ब्र- है, उस सर्वव्यापी आत्माको देखता है । अर्थात् आत्मदर्शी पुरुष इस
ह्मोपनिषत्परमनुपश्यति सर्वगतं सर्वगत ब्रह्मको आत्मामें ही देखता
ब्रह्मात्मदर्शिनात्मन्येव गृह्यते ना- है, जो असत्यादियुक्त और अन्न-
सत्यादियुक्तेन परिच्छिन्नब्रह्मान्न- मयादिरूपसे परिच्छिन्न देहमें ही आत्मबुद्धि करनेवाला है उसे ब्रह्मकी
मयाद्यात्मना । श्रूयते च— उपलब्धि नहीं होती । श्रुति भी कहती है—"यह आत्मा सर्वदा
"सत्येन लभ्यस्तपसा ह्येष आत्मा सत्य, तप, सम्यग्ज्ञान और ब्रह्मचर्य-
सम्यग्ज्ञानेन ब्रह्मचर्येण नित्यम् । के द्वारा प्राप्त किया जा सकता है,
तथा जिनमें कुटिलता, असत्य और
न येषु जिह्ममनृतं न माया च" कपट नहीं होता वे ही इसे प्राप्त कर
(प्र० उ० १।१६) इति। द्विर्वचन- सकते हैं ।" यहाँ 'ब्रह्मोपनिषत्परम्'
मध्यापरिसमाप्त्यर्थम् ॥ १६॥ इसका दो बार पाठ अध्यायकी समाप्ति सूचित करनेके लिये है॥१६॥

इति श्रीमद्गोविन्दभगवत्पूज्यपादशिष्यपरमहंसपरिव्राजकाचार्यश्रीमच्छङ्कर-
भगवत्प्रणीते श्वेताश्वतरोपनिषद्भाष्ये प्रथमोऽध्यायः ॥ १ ॥

द्वितीय अध्याय

द्वितीय अध्याय
ध्यानकी सिद्धिके लिये सवितासे अनुज्ञा-प्रार्थना
ध्यानमुक्तं ध्याननिर्मथनाभ्या- | [ प्रथम अध्यायमें ] 'ध्यान-
द्वितीयाध्याया- साद्देवं पश्येन्निगूढ- | निर्मथनाभ्यासाद्देवं पश्येन्निगूढवत्'
रम्मप्रयोजनम् वदिति परमात्म- | इत्यादि मन्त्रसे परमात्माके साक्षात्कार-
दर्शनोपायत्वेन। इदानीं तदपेक्षि- | के उपायरूपसे ध्यान बताया गया ।
तसाधनविधानार्थं द्वितीयोऽध्याय | अब उसके लिये अपेक्षित साधनोंका
आरभ्यते। तत्र प्रथमं तत्सिद्धयर्थं | विधान करनेके लिये द्वितीय अध्याय
सवितारमाशास्ते- | आरम्भ किया जाता है । उसमें
पहले उसकी सिद्धिके लिये सविता
देवतासे प्रार्थना करते हैं—
युञ्जानः प्रथमं मनस्तत्त्वाय सविता धियः ।
अग्नेर्ज्योतिर्निचाय्य पृथिव्या अध्याभरत ॥ १ ॥
सविता देवता हमारे मन और अन्य प्राणोंको परमात्मामें लगाते हुए
अग्नि आदि [ इन्द्रियाभिमानी देवताओं ] की ज्योति ( बाह्यविषयप्रकाशन-
सामर्थ्य) का अवलोकन कर तत्त्वज्ञानके लिये उसे पृथिवी (पार्थिव पदार्थों )
से ऊपर [ शरीरस्थ इन्द्रियोंमें ] स्थापित करे ॥१॥
युञ्जान इति । युञ्जानः प्रथमं | 'युञ्जानः' इत्यादि। प्रथम मनको
मनः प्रथमं ध्यानारम्भे मनः | नियुक्त करते हुए अर्थात् पहले—
परमात्मनि संयोजनीयं धिय | ध्यानके आरम्भमें परमात्मामें लगाये
इतरानपि प्राणान् । "प्राणा वै | जाने योग्य मन और धियों—अन्य
प्राणोंको भी [ प्रवृत्त करते हुए ]

अध्याय २ ] शाङ्करभाष्यार्थ १२५

अध्याय २ ] शाङ्करभाष्यार्थ १२५

धियः" इति श्रुतेः । अथवा धियो सविता देवता अग्नि आदि इन्द्रिया-
बाह्यविषयज्ञानानि । किमर्थम् ? भिमानी देवताओंके विषयप्रकाशन-
तत्त्वाय तत्त्वज्ञानाय सविता सामर्थ्यका अवलोकन कर उसे
धियो बाह्यविषयज्ञानादग्नेर्ज्योतिः पृथिवीसे ऊपर इस शरीर [ शरीर-
प्रकाशं निचाय्य दृष्ट्वा पृथिव्या रूप इन्द्रियों ] में स्थापित करे ।
अध्यस्मिञ्शरीरे आभरदाहरत् । किस लिये ?—तत्त्व अर्थात् तत्त्व-
ज्ञानके लिये । यहाँ "प्राण ही
धी है" इस अन्य श्रुतिके अनुसार
'धियः' का अर्थ प्राण किया गया
है । अथवा 'धियः' का अर्थ बाह्य-
विषयप्रकाशन भी हो सकता है ।

एतदुक्तं भवति—ज्ञाने प्र- यहाँ यह कहा गया है कि
मन्त्रनिष्कर्षः वृत्तस्य मम मनो जिसकी कृपासे योगकी प्राप्ति होती
बाह्यविषयज्ञानादुप- है, वह सविता देवता ज्ञानमें प्रवृत्त
संहृत्य परमात्मन्येव संयोजयितु- हुए मेरे मनको बाह्य विषयोंके प्रका-
मनुग्राहकदेवतात्मनामग्न्यादीनां शनसे रोककर परमात्मामें ही
यत्सर्ववस्तुप्रकाशनसामर्थ्यं तत् लगानेके लिये इन्द्रियानुग्राहक अग्नि
सर्वमस्मद्वागादिषु संपादयेत् आदि देवताओंकी जो समस्त वस्तुओं-
सविता यत्प्रसादादवाप्यते योग को प्रकाशित करनेकी शक्ति है उस
इत्यर्थः । अग्निशब्द इतरासामप्य- सबको हमारी वागादि इन्द्रियोंमें
नुग्राहकदेवतानामुपलक्षणार्थः॥१॥ स्थापित करे । यहाँ 'अग्नि' शब्द
अन्य इन्द्रियानुग्राहक देवताओंको
भी उपलक्षित करानेके लिये है ॥१॥


युक्तेन मनसा वयं देवस्य सवितुः सवे । सुवर्गे-
याय शक्त्या ॥ २ ॥

१२६ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय २

१२६ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय २
सविता देवताकी अनुमति होनेपर उन्हींकी प्रेरणासे परमात्मामें लगे
हुए मनके द्वारा हम यथाशक्ति परमात्मप्राप्तिके हेतुभूत ध्यानकर्मके लिये
प्रयत्न करेंगे ॥२॥
युक्तेनेति । यदा तत्त्वाय मनो | 'युक्तेन' इत्यादि । जिस समय
योजयन्ननुग्राहकदेवताशक्त्याधा- | तत्त्वज्ञानके लिये मनोनिग्रह करते
नेन देहेन्द्रियदार्ढ्यं करोति तदा | हुए अनुग्राहक देवताओके शक्ति-
युक्तेन सवित्रा परमात्मनि संयो- | सञ्चारके द्वारा [ सविता ] देह और
जितेन मनसा वयं तस्य देवस्य | इन्द्रियोंकी दृढता कर देगा उस
सवितुः सवेऽनुज्ञायां सत्यां सुव- | समय युक्त—सविता देवताद्वारा
र्गेयाय स्वर्गप्राप्तिहेतुभूताय ध्यान- | परमात्मामें लगाये हुए मनके द्वारा
कर्मणे यथासामर्थ्यं प्रयतामहे । | हम उस देवका सव प्राप्त होनेपर
परमात्मवचनोऽत्र स्वर्गशब्दः । | अर्थात् उनकी अनुज्ञा मिलनेपर
तत्प्रकरणात्तस्यैव सुखरूपत्वात्त- | सुवर्गेय—स्वर्गप्राप्तिके हेतुभूत ध्यान-
दंशत्वाच्चेतरस्य सुखस्य । तथा | कर्मके लिये यथाशक्ति प्रयत्न करेंगे।
च श्रुतिः—"एतस्यैवानन्दस्या- | यहाँ 'स्वर्ग' शब्द परमात्मवाची है,
न्यान्यि भूतानि मात्रामुपजीवन्ति" | क्योंकि परमात्माका ही यहाँ प्रकरण
(बृ० उ० ४। ३। ३२) इति॥२॥ | है, वही सुखस्वरूप है तथा अन्य
| सब सुख भी उसीके अंश हैं। ऐसी
| ही यह श्रुति भी है--"इसी
| आनन्दकी सूक्ष्मतर मात्राके आश्रय-
| से अन्य सब जीव जीवित रहते
| हैं" ॥ २ ॥
युक्त्वायैति पुनरपि सोऽप्येवं | 'युक्त्वाय' इत्यादि मन्त्रसे, फिर
करोत्विति प्रार्थना— | भी वह ऐसा करे—ऐसी प्रार्थना
| करते हैं—

अध्याय २ ] शाङ्करभाष्यार्थ १२७

अध्याय २ ] शाङ्करभाष्यार्थ १२७
युक्त्वाय मनसा देवान्सुवर्यतो धिया दिवम् ।
बृहज्ज्योतिः करिष्यतः सविता प्रसुवाति तान् ॥ ३ ॥
पूर्णानन्दस्वरूप परमात्माकी ओर जाते हुए तथा सम्यग्दर्शनके द्वारा
ज्योतिःस्वरूप ब्रह्मका प्रकाशन करते हुए मनके सहित इन्द्रियोंको परमात्मा-
से संयुक्त कर वह सवितृदेव उन्हें अनुज्ञा (सामर्थ्य) प्रदान करे ॥३॥
युक्त्वाय योजयित्वा देवान् मनआदीनि करणानि तेषां विशेषणं सुवः स्वर्गं सुखं पूर्णानन्दब्रह्म, यत इति द्वितीयाबहुवचनं पूर्णानन्दब्रह्म गच्छतो न शब्दादिविषयान् ।
पुनरपि विशेषणान्तरं धिया सम्यग्दर्शनेन दिवं द्योतनस्वभावं चैतन्यैकरसं बृहन्महद्ब्रह्म ज्योतिः प्रकाशं करिष्यतः पूर्णानन्दब्रह्माविष्करिष्यतः। अत्र द्वितीयाबहुवचनम् ।
देवताओं, मन आदि इन्द्रियोंको [ परमात्मामें ] युक्त—संयोजित कर—उन इन्द्रियोंका विशेषण है 'सुवर्यतः' सुवः-अर्थात् स्वर्ग—सुख यानी पूर्णानन्दस्वरूप ब्रह्मके प्रति यतः—जाती हुई [इन्द्रियोंको]। यहाँ 'यतः' यह शब्द द्वितीयाका बहुवचन है । तात्पर्य यह है कि पूर्णानन्द ब्रह्मकी ओर जाती हुई इन्द्रियोंको [ परमात्मामें संयोजित कर ], शब्दादि विषयोंकी ओर जानेवाली इन्द्रियोंको नहीं ।
[इन्द्रियोंके लिये] पुनः एक दूसरा विशेषण भी दिया जाता है—जो 'धिया' यानी सम्यग्दर्शनके द्वारा दिवम्—द्योतनस्वभाव चैतन्यैकरस बृहत्-महत् अर्थात् ब्रह्मको ज्योतिः—प्रकाशित करेंगी, अर्थात् पूर्णानन्द ब्रह्मका प्रादुर्भाव—अनुभव करेंगी [ उन इन्द्रियोंको ]—यहाँ 'करिष्यतः' में द्वितीयाका बहुवचन है—

१२८ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय २

१२८ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय २

सविता प्रसुवाति तान्करणानि । | उन इन्द्रियोंको सवितृदेव अनुज्ञा देता
यथा करणानि विषयेभ्यो निवृत्ता- | है। तात्पर्य यह है कि इन्द्रियाँ
| विषयोंसे निवृत्त हो आत्माभिमुखी
न्यात्माभिमुखान्यात्मप्रकाशमेव | होकर जिस प्रकार आत्माको ही
| प्रकाशित करें वैसी अनुज्ञा (सामर्थ्य)
कुर्युस्तथानुजानातु सवितेत्यर्थः॥३॥ | उन्हें सवितादेवता प्रदान करे ॥३॥

तस्यैवमनुजानतो महती परि- | इस प्रकार अनुज्ञा देनेवाले उस
ष्टुतिः कर्तव्येत्याह— | देवकी महती स्तुति करनी उचित है
| —इस अभिप्रायसे श्रुति कहती है—
युञ्जते मन उत युञ्जते धियो
विप्रा विप्रस्य बृहतो विपश्चितः ।
वि होत्रा दधे वयुनाविदेक
इन्मही देवस्य सवितुः परिष्टुतिः ॥ ४ ॥
जो विप्रगण मन और इन्द्रियोंको परमात्मामें लगाते हैं उनको चाहिये
कि जिस एक प्रज्ञावित्ने होतृसाध्य [ यज्ञादि ] क्रियाओंका विधान किया
है उस महान्, सर्वज्ञ और विप्र ( विशेषरूपसे व्यापक ) सवितृदेवकी
महती स्तुति करें ॥ ४ ॥
युञ्जत इति । युञ्जते योज- | 'युञ्जते' इत्यादि । जो विप्र-
यन्ति ये विप्रा मन उत युञ्जते | ब्राह्मण, मन एवं अन्य इन्द्रियोंको
धिय इतराण्यपि करणानि । धी- | परमात्मामें लगाते हैं। इन्द्रियाँ बुद्धि-
हेतुत्वात्करणेषु धीशब्दप्रयोगः । | जनित हैं इसलिये उनके लिये 'धी'
| शब्दका प्रयोग किया गया है। ऐसा
तथा च श्रुत्यन्तरम्—"यदा | ही एक दूसरी श्रुति भी कहती है
पञ्चावतिष्ठन्ते ज्ञानानि मनसा | —"जब मनके सहित पाँच ज्ञान

अध्याय २ ] शाङ्करभाष्यार्थ १२९

अध्याय २ ] शाङ्करभाष्यार्थ १२९
सह" (क० उ० २।३।१०) इति । | ( ज्ञानेन्द्रियाँ ) रुक जाती हैं"
विप्रस्य विशेषेण व्याप्तस्य बृहतो | इत्यादि । विप्र—विशेषरूपसे
महतो विपश्चितः सर्वज्ञस्य | व्यापक, बृहत्—महान् एवं
देवस्य सवितुर्मही महती परिष्टुतिः | विपश्चित्—सर्वज्ञ सवितृदेवकी महती
कर्तव्या । कैर्विप्रैः । | स्तुति करनी चाहिये । किन्हें
पुनरपि तमेव विशिनष्टि— | करनी चाहिये ?—ब्राह्मणोंको ।
वि होत्रा दधे होत्राः क्रिया यो | फिर भी उस सवितृदेवके ही
विदधे वयुनाविप्रज्ञावित्सर्वज्ञाना- | विशेषण दिये जाते हैं—'वि होत्रा
त्साक्षिभूत एकोऽद्वितीयः । ये | दधे' जिसने होत्रा यानी यज्ञक्रियाओं-
विप्रा मनआदिकरणानि विषयेभ्य | का विधान किया है और जो वयुना-
उपसंहृत्यात्मन्येव योजयन्ति तै- | वित्—प्रज्ञावित् अर्थात् सब कुछ
र्विप्रस्य बृहतो विपश्चितो महती | जाननेके कारण साक्षिस्वरूप है, वह
परिष्टुतिः कर्तव्या । होत्रा विदधे | [सविता देवता] एक—अद्वितीय है ।
वयुनाविदेकः सविता ॥ ४ ॥ | अर्थात् जिसने यज्ञक्रियाओंका विधान
किया वह प्रज्ञानवान् सविता एक ही
है। अतः जो ब्राह्मण मन आदि
इन्द्रियोंको विषयोंसे हटाकर आत्मामें
ही लगाते हैं उन्हें इस महान् एवं
सर्वज्ञ विप्र ( विशेषरूपसे व्यापक )
सविताकी महती स्तुति करनी
चाहिये ॥४॥
किञ्च— | तथा—
युजे वां ब्रह्म पूर्व्यं नमोभि-
र्विश्लोक एतु पथ्येव सूरेः ।
शृण्वन्तु विश्वे अमृतस्य पुत्रा
आ ये धामानि दिव्यानि तस्थुः ॥ ५ ॥

१३० श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय २

१३० श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय २
[ हे इन्द्रियवर्ग और इन्द्रियाधिष्ठातृ देवगण ! ] मैं तुमसे सम्बन्ध
रखनेवाले पुरातन ब्रह्ममें नमस्कार ( चित्त-प्रणिधान आदि ) द्वारा मन
लगाता हूँ । सन्मार्गमें विद्यमान विद्वान्की भाँति मेरा यह कीर्तनीय श्लोक
( स्तुतिपाठ ) लोकमें विस्तारको प्राप्त हो । जिन्होंने सब ओरसे दिव्य
धामोंपर अधिकार कर रखा है वे अमृत ( हिरण्यगर्भ ) के पुत्र विश्वेदेवगण
श्रवण करें ॥५॥
युजे वामिति । युजे वां समा- | 'युजे वाम्' इत्यादि। इन्द्रिय और
| उनके अनुग्राहक देवगण ! तुम
दधे वां युवयोः करणानुग्राहकयोः | दोनोंके द्वारा प्रकाश्यनीय होनेके
| कारण तुमसे सम्बन्ध रखनेवाले ब्रह्ममें
संबन्धि प्रकाश्यत्वेन तत्प्रकाशितं | मैं मनको नियुक्त—समाहित करता
| हूँ; तात्पर्य यह है कि ब्रह्म इनके
ब्रह्मेत्यर्थः । अथवा वामिति बहु- | द्वारा प्रकाशित है । अथवा 'वाम्'
| इस शब्दका यदि बहुवचनमें अर्थ
वचनार्थे युष्माकं करणभूतं ब्रह्म | किया जाय तो 'तुम्हारे करणभूत
| पूर्वतन—चिरकालीन ब्रह्ममें मैं चित्त
पूर्व्यं पूर्वं चिरन्तनं समादधे । | समाहित करता हूँ' ऐसा अर्थ होगा।
| [ किस प्रकार चित्त समाहित करता
नमोभिर्नमस्कारैश्चित्तप्रणिधाना- | हूँ ? ] नमस्कारोंद्वारा अर्थात् चित्त-
दिभिः । | प्रणिधान (मनोनियोग) आदिके द्वारा।
एष एवं समाधानस्य मम | इस प्रकार चित्तसमाधान करने-
| वाले मेरा कीर्तितव्य श्लोक ( स्तोत्र-
श्लोकः कीर्तितव्य एतु विविधमेतु | पाठ ) सन्मार्गमें वर्तमान विद्वान्‌के
| समान विविधरूप (विस्तारको प्राप्त)
पथ्येव सूरेः पथि सन्मार्गे । | हो जाय । अथवा [ 'पथ्या इव'
| ऐसा पदच्छेद करके ] पथ्याका अर्थ
अथवा पथ्या कीर्तिरित्येतद्वाक्यं | कीर्ति करना चाहिये । अर्थात्

अध्याय २ ] शाङ्करभाष्यार्थ १३१

अध्याय २ ] शाङ्करभाष्यार्थ १३१

प्रार्थनारूपं शृण्वन्तु विश्वेऽमृतस्य | [विद्वान्‌की कीर्तिकी भाँत मेरा श्लोक
ब्रह्मणः पुत्राः सूत्रात्मनो हिरण्य- | विस्तारको प्राप्त हो—] इस प्रार्थनारूप
गर्भस्य । के ते ? ये धामानि | वाक्यको अमृत—ब्रह्म यानी
दिव्यानि दिवि भवान्यातस्थु- | हिरण्यगर्भके सूर्यरूप समस्त पुत्र
रधितिष्ठन्ति ॥ ५ ॥ | सुनें । वे कौन हैं ?—जिन्होंने
| सम्पूर्ण दिव्य—द्युलोकान्तर्गत धामों-
| पर अधिकार कर रखा है ॥ ५ ॥

सविताकी अनुज्ञाके बिना हानि
युञ्जानः प्रथमं मन इत्यादिना | ‘युञ्जानः प्रथमं मनः’ इत्यादि
सवित्रादिप्रार्थना प्रतिपादिता । | मन्त्रसे सविता आदिकी प्रार्थना कही
यस्तु पुनः प्रार्थनामक़त्वा तैर- | गयी । किन्तु जो पुरुष उनकी
ननुज्ञातः सन्योगे प्रवर्तते स | प्रार्थना न करके उनकी अनुज्ञाके
भोगहेतौ कर्मण्येव प्रवर्तत | बिना ही योगमें प्रवृत्त होता है
इत्याह— | उसकी भोगके हेतुभूत कर्मोंमें ही
| प्रवृत्ति हो जाती है—यह बात अब
| श्रुति बतलाती है—
अग्निर्यत्राभिमथ्यते वायुर्यत्राधिरुध्यते ।
सोमो यत्रातिरिच्यते तत्र संजायते मनः ॥ ६ ॥
जहाँ ( अग्न्याधानादि कर्ममें ) अग्निका मन्थन किया जाता है,
जहाँ वायुका अधिरोध होता है और जहाँ सोमरसकी अधिकता होती है
उन कर्मोंमें ही [ उसके ] मनकी प्रवृत्ति होती है ॥ ६ ॥
अग्निर्यत्रेति । अग्निर्यत्राभिम- | ‘अग्निर्यत्र’ इत्यादि । जहाँ अग्न्या-
| धानादिमें अग्निका मन्थन किया जाता
थ्यत आधानादौ । वायुर्यत्राधि- | है, जहाँ प्रवग्र्यादि ( वायुकी स्तुति

१३२ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय २

१३२ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय २

रुध्यते प्रवर्यादौ। सवित्रा प्रेरितः | आदि) में वायुका अधिरोध होता है
| अर्थात् जहाँ सवितासे प्रेरित होकर
शब्दमभिव्यक्तं करोति। सोमो | वायु शब्दको अभिव्यक्त करता है
| और जहाँ दशापवित्र (छाननेके
यत्र दशापवित्रात्पूयमानोऽति- | वस्त्र) से पवित्र किये (छाने हुए)
| सोमरसकी अधिकता होती है उस
रिच्यते तत्र क्रतौ संजायते मनः। | यज्ञकार्यमें उसका मन लग जाता है।
अग्निर्यत्राभिमथ्यत इत्यत्रापरा | 'अग्निर्यत्राभिमथ्यते' इस मन्त्रकी
| यह दूसरी व्याख्या की जाती है—
व्याख्या—अग्निः परमात्मा, | अग्नि परमात्माको कहते हैं, क्योंकि
अविद्यातत्कार्यस्य दाहकत्वात् । | वह अविद्या और उसके कार्यको
उक्तं च—"......अहमज्ञानजं | दग्ध करनेवाला है। [श्रीमद्भगवद्गीता-
| में] कहा भी है "मैं अपने भक्तोंके
तमः । नाशयाम्यआत्मभावस्थो | अन्तःकरणमें स्थित होकर प्रकाशमय
ज्ञानदीपेन भास्वता" (गीता | ज्ञानदीपकसे उनके अज्ञानजनित
१०।११) इति । यत्र | अन्धकारको नष्ट कर देता हूँ।"
यस्मिन्पुरुषे मथ्यते स्वदेह- | उस परमात्मारूपिका 'स्वदेहमरणिं
| कृत्वा' इत्यादि पूर्वमन्त्रसे कहे हुए
मरणिं कृत्वेत्यादिना पूर्वो- | ध्यानरूप निर्मन्थनके द्वारा जिस
क्तध्याननिर्मथनेन वायुर्यत्राधि- | पुरुषमें मन्थन होता है, तथा जहाँ
| वायुका अधिरोध होता है अर्थात्
रुध्यते शब्दमव्यक्तं करोति | रेचकादि क्रियाओके कारण जहाँ
रेचकादिकरणात् । सोमो यत्रा- | वायु अव्यक्त शब्द करता है और
| जहाँ अनेक जन्मोंतक [अग्निकी]
तिरिच्यतेऽनेकजन्मसेवया तत्र | सेवा करनेसे सोमकी बहुलता होती
तस्मिन्यज्ञदानतपःप्राणायामसमा- | है, उस यज्ञ, दान, तप, प्राणायाम
धिविशुद्धान्तःकरणे संजायते | एवं समाधि आदिसे विशुद्ध हुए

अध्याय २ ] शाङ्करभाष्यार्थ १३३

अध्याय २ ] शाङ्करभाष्यार्थ १३३
❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦
परिपूर्णानन्दाद्वितीयब्रह्माकारं | अन्तःकरणमें ही पूर्णानन्दाद्वितीय
मनः समुत्पद्यते, नान्यत्रा- | ब्रह्माकार मन ( मनोवृत्ति ) का उदय
शुद्धान्तःकरणे । उक्तं च— | होता है, अन्यत्र अशुद्ध अन्तः-
| करणमें नहीं । कहा भी है—
“प्राणायामविशुद्धात्मा | “क्योंकि जिसका चित्त
यस्मात्पश्यति तत्परम् । | प्राणायामके अभ्याससे शुद्ध हो
तस्मान्नातः परं किञ्चि- | गया है वही उस परमात्माका
त्प्राणायामादिति श्रुतिः ॥ | साक्षात्कार करता है, इसलिये इस
अनेकजन्मंसंसार- | प्राणायामसे बढ़कर कुछ भी नहीं
चिते पापसमुच्चये । | है—ऐसी श्रुति है । अनेक जन्मके
तत्क्षीणे जायते पुंसां | संसारसे जो पापराशि सञ्चित हो
गोविन्दाभिमुखी मतिः॥ | गयी है उसके क्षीण हो जानेपर
जन्मान्तरसहस्रेषु | पुरुषोंकी बुद्धि श्रीगोविन्दकी ओर
तपोज्ञानसमाधिभिः । | होती है । सहस्रों जन्मोंके अनन्तर
नराणां क्षीणपापानां | तप, ज्ञान और समाधिके द्वारा जिनके
कृष्णे भक्तिः प्रजायते ॥” | पाप क्षीण हो गये हैं उन पुरुषोंकी
तस्मात्प्रथमं यज्ञाद्यनुष्ठानं ततः | श्रीकृष्णचन्द्रमें भक्ति होती है ।”
| अतः सबसे पहले यज्ञादिका
प्राणायामादि ततः समाधिस्ततो | अनुष्ठान किया जाता है, फिर
| प्राणायामादिका, फिर समाधिका और
वाक्यार्थज्ञाननिष्पत्तिस्ततः कृत- | उसके पश्चात् महावाक्यके अर्थका
| ज्ञान होता है, तथा उससे कृत-
कृत्यतेति ॥ ६ ॥ | कृत्यता होती है ॥ ६ ॥
सविताकी अनुज्ञासे लाभ
यस्मादननुज्ञातस्य तस्य भोग- | क्योकि [सविता देवताकी] अनुज्ञा
| न होनेपर उसकी भोगके हेतुभूत
हेतौ कर्मण्येव प्रवृत्तिस्तस्मात्— | कर्ममें ही प्रवृत्ति होती है, इसलिये—