श्वेताश्वतरोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Shvetashvatara Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 138, कुल 276 में से
संदर्भ में पढ़ेंद्वितीय अध्याय
ध्यानकी सिद्धिके लिये सवितासे अनुज्ञा-प्रार्थना
ध्यानमुक्तं ध्याननिर्मथनाभ्या- | [ प्रथम अध्यायमें ] 'ध्यान-
द्वितीयाध्याया- साद्देवं पश्येन्निगूढ- | निर्मथनाभ्यासाद्देवं पश्येन्निगूढवत्'
रम्मप्रयोजनम् वदिति परमात्म- | इत्यादि मन्त्रसे परमात्माके साक्षात्कार-
दर्शनोपायत्वेन। इदानीं तदपेक्षि- | के उपायरूपसे ध्यान बताया गया ।
तसाधनविधानार्थं द्वितीयोऽध्याय | अब उसके लिये अपेक्षित साधनोंका
आरभ्यते। तत्र प्रथमं तत्सिद्धयर्थं | विधान करनेके लिये द्वितीय अध्याय
सवितारमाशास्ते- | आरम्भ किया जाता है । उसमें
पहले उसकी सिद्धिके लिये सविता
देवतासे प्रार्थना करते हैं—
युञ्जानः प्रथमं मनस्तत्त्वाय सविता धियः ।
अग्नेर्ज्योतिर्निचाय्य पृथिव्या अध्याभरत ॥ १ ॥
सविता देवता हमारे मन और अन्य प्राणोंको परमात्मामें लगाते हुए
अग्नि आदि [ इन्द्रियाभिमानी देवताओं ] की ज्योति ( बाह्यविषयप्रकाशन-
सामर्थ्य) का अवलोकन कर तत्त्वज्ञानके लिये उसे पृथिवी (पार्थिव पदार्थों )
से ऊपर [ शरीरस्थ इन्द्रियोंमें ] स्थापित करे ॥१॥
युञ्जान इति । युञ्जानः प्रथमं | 'युञ्जानः' इत्यादि। प्रथम मनको
मनः प्रथमं ध्यानारम्भे मनः | नियुक्त करते हुए अर्थात् पहले—
परमात्मनि संयोजनीयं धिय | ध्यानके आरम्भमें परमात्मामें लगाये
इतरानपि प्राणान् । "प्राणा वै | जाने योग्य मन और धियों—अन्य
प्राणोंको भी [ प्रवृत्त करते हुए ]