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शिवताण्डव स्तोत्रम् (लङ्काधिपति रावण प्रणीत - सान्वय संस्कृत मूल एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shiva Tandava Stotram of Ravana

दशानन रावण (व्याख्याकार: पं. ज्वाला प्रसाद चतुर्वेदी) द्वारा

DevanagariHindipublished52 पृष्ठ

( २७ )
तिन ते परे जो हीनविकृत तुरीय धाम
ताकौ अर्धमात्र सूक्ष्म ध्वनि सौं जतावै है
एक है कै एक, त्यों अनेक हैं अनेक रूप
सरनद ! आप कौं प्रनवपद गावे है ॥२७॥
हे शरण देने वाले ! आप सब में व्यापक होकर अर्थात
ओंकार से ऋग्, यजु, साम तीनों वेद जाग्रत, स्वप्न, सुषुप्ति
तीनों अवस्था स्वर्ग, मृत्यु और पाताल तीनों लोक—ब्रह्मा,
विष्णु, रुद्र तीनों देवता इनको धारण करते हुए आपका चौथा
पवित्र धाम है, जिनको तुरीय कहते हैं, उस चैतन्य स्वरूप को भी
स्मरण करता हुआ हे भगवन ! समस्त रूप में व्यस्त ऐसे आपकी
स्तुति किया करता हूँ ॥२७॥
भवः शर्वा रुद्रः पशुपतिरथोग्रः सह महां-
स्तथा भीमेशानाविति तदाभिधानाष्टकमिदम् ।
अमुष्मिन् प्रत्येकं प्रविचरति देव ! श्रुतिरपि
प्रियायास्मैधामने प्रणिहितनमस्योऽस्मिभवते॥२८॥
भव, शर्व, रुद्र, पशुपति, महादेव उग्र
भीम औ ईसान—ये जो आठ दिव्य नाम हैं
एहो देव ! वेद इन में ते एक एकहू कौं
बोलिबे के हेतु बरनत आठों जाम हैं
प्रानहू ते प्यारे मेरे परम अधार आप
आप कौ सरूप दिव्य ललित ललाम हैं
याते हम भक्ति अनुरक्ति भरे अन्तर में
आप को निरन्तर ही करत प्रनाम हैं ॥२८॥

( २८ )
हे देवाधिदेव ! १. भव (उत्पत्तिकर्ता) २. शर्व (सर्वरूप
शुभ कर्ता) ३. रुद्र (रोदन कर्ता) ४. पशुपति (जीवों का पालक)
५. उग्र (क्रोधी) ६. महादेव सब में महान विशिष्ट, ७. भीम
(भयंकर) ८. ईशान (विशिष्ट, ऐश्वर्यवान) के लिए सभी
नमस्कार करते हैं ॥२८॥
नमो नेदिष्ठाय प्रियदव दविष्ठाय च नमो ।
नमः क्षोदिष्ठाय स्मरहर ! महिष्ठाय च नमः
निमोवर्षष्ठाय त्रिनयन ! यविष्ठाय च नमो
नमः सर्वस्मै ते तदिदमिति शर्वाय च नमः॥२९॥
एहो बन वीथिन में बिहरन बारे ! अति
निकट हमारे भगवान कौ प्रनाम है
अति दूरबारे कौं प्रनाम मदनारे ! त्योंही
लघुतर परम महान कौं प्रनाम है
तीन नैनवारे प्रभो ! अतिवय बूढ़हू कौं
नव वय रूढ़ त्यों जबान को प्रनाम है
सब मैं तुम्हीं हौ, सब रूप में तुम्ही हौ देव
'यह', 'वह' सकल जहान को प्रनाम है ॥२९॥
हे कामदेवनाशक ! आप समीप रहने वाले हो और दूर
रहने वाले भी हो, सूक्ष्म-से-सूक्ष्म और बड़े-से-बड़े रूप को धारण
करते हो, सब रीति से शिव आपको नमस्कार है ॥२९॥

( २६ )
बहलरजसे विश्वोत्पत्तौ भवाय नमो नमः
प्रबलतमसे तत्संहारे हराय नमो नमः
जनसुखकृते सत्वोद्रिक्तौ मृडाय नमो नमः
प्रमहसि पदे निस्त्रैगुण्ये शिवाय नमो नमः ॥३०॥
बिस्व बिरचैवे कौ रजोगुन अधिक जाको
भव के प्रभाव भव रूप को नमन है,
तम के बढ़े पै जान समय संहारहू को
हर है हरत, हर रूप कौं नमन है ।
शुद्ध सत्व वृद्धि की सुजोग पाय लोगन कौं
सुख दैनवारे मृडरूप कौं नमन है,
त्रिगुन रहित हित परम प्रकासमय
पद में लसित शिव रूप कौं नमन है ॥३०॥
संसार की उत्पत्ति के समय आपने रजोगुण सहित जो भव
रूप धारण किया, और सृष्टि के पालन करने को सत्व गुण
सहित सत्यरूप और प्रलय करने के समय तमोगुण सहित हर
रूप धारण किया; मोक्ष के समय तीनों गुणों से रहित अर्थात
निर्गुण शिव शान्त रूप धारण किया। हे भगवन ! आपके स्वयं
प्रकाश अनेक शिव स्वरूपों को नमस्कार है ॥३०॥

  • कृशहरिणति चेतः क्लेशवश्यं क्व चेदं
    क्व च तव गुणसीमोल्लङ्घिनो शश्वदृद्धि ।

( ३० )
इति चकितमन्दीकृत्य मां भक्तिराधा-
द्वरद ! चरणयोस्ते वाक्यपुष्पोपहारम् ॥३१॥
मेरो यह चित्त कहाँ चेरौ सै कलेसन कौ
सुध बुध कलप अलप अति पायौ है,
सीमा हीन रावरी सनातन समृद्धि कहाँ
लाँघि गुन सीमा के परेई दरसायौ, है
याते लखि चकित चकित मोहि भक्ति तव
बरद बलात गुन गान में लगायौ है
रुचि अनुसार यह बचन सुमन हार
रावरे चरन उपहार लै चढ़ायौ है ॥३१॥
हे वर देने वाले ! आपकी महिमा का तो अन्त नहीं है
और मेरा चित्त रागद्वेष और क्लेश आदि के वश होकर परिणाम
में दुर्बल है । इसी प्रकार जब मैं गुणों के वर्णन से भयभीत हुआ
तब मेरी भक्ति ने उत्साह देकर वाणीरूपी फूल की माला
आपके चरणारविन्दों को पहना दी अर्थात मेरी सामर्थ्य कहाँ
जो आपके गुणों का वर्णन करूँ, यह मेरी भक्ति ने थोड़ा सा
वर्णन कराया है ॥३१॥
असितगिरिसमं स्यात्कज्जलं सिंधुपात्रे
सुरतरुवरशाखा लेखनी पत्रमुर्वी ।
लिखति यदि गृहीत्वा शारदा सर्वकालं
तदपि तव गुणानामीश पारं ! न याति ॥३२॥•
• ये ३२ श्लोक शिवजी की महिमा के हैं । इसके आगे के
स्तोत्रों में अन्त तक फल और आपके नामों की विशेषता लिखी है ।

( ३१ )
कारे गिरिराज तुल्य काजर कौं घोरि घोरि............
स्याही करि राखै, महासिंधु मसिदानी है,
भाषा लिखिबे को साखा सुरतरु लेखनी है
कागद की करी त्योंही पूरी वसुधानी है
लै कै सब साधन अराथन में लीन सदा
लिखित महेस गुन गन की कहानी है
हारैथकि साथ, गुन गाथ कौं तिहारे नाथ
तदपि न पावै पार सारदा सयानी है ॥३२॥
हे भगवन ! यदि सरस्वती नील-पर्वत के बराबर काजल
स्याही समुद्ररूपी पात्र में डालकर कल्पवृक्ष रूपी लेखनी से
आपके गुणों को लिखे तो भी पार नहीं पा सकती क्योंकि आपके
अनन्त गुण हैं और हमारो तो सामर्थ्य ही क्या है जो आपके
गुणों का वर्णन कर सकें ॥३२॥
असुरसुरमुनीन्द्रैरर्चितस्येन्दुमौले-
र्ग्रथितगुणमहिम्नो निगुर्णस्येश्वरस्य ।
सकलगुणवरिष्ठः पुष्पदन्ताभिधानो
रुचिरमलघुवृत्तैऽ स्तोत्रमेतच्चकार ॥३३॥
पूजत जिनहि सुर असुर मुनींद्र बृन्द
भाल जिनकेई बाल इन्दु छबि पायौ है
गुन ते रहित हित रूप वे महेश जिन,
गुन महिमा कौं इते बरनि सुनायौ है

( ३२ )
खास उनकेई दस गन में महान एक
नामवन्त है जो पुष्पदन्त कहलायो है
वानेई अलघु मृदु छन्द बन्द बारो यह
वन्दन के काज अभिनन्दन बनायो है ॥३३॥
सकल गुणों में श्रेष्ठ पुष्पदंताचार्य ने यह सुन्दर स्तोत्र
देवताओं, राक्षसों और मुनियों से पूजित और चन्द्रमा जिस के
मस्तक पर शोभायमान है। प्रसिद्ध जिनके गुण हैं। ऐसे निर्गुण
श्री शिव जी की महिमा मनोहर विस्तृत छन्दों में की है ॥३३॥
अहरहरनवद्यं धूर्जटेः स्तोत्रमेतत्
पठति परमभक्त्या शुद्धचित्तः पुमान्यः ।
स भवति शिवलोके रुद्रतुल्यस्तथाऽत्र
प्रचुरतरधनायुः पुत्रवान्कीर्तिमांश्च ॥३४॥
मानस में भारि भूरि भक्ति अनुरक्ति भरे
नित्त जो मनुज शुद्धचित्त है रहत है
स्तवन बिसेस या महेस महिमा को मन्जु
रोज रोज बदन सरोज सौ कहत है
तजि सो असिव लोक सजि सिवलोक जाय
सिव भगवान की समानता गहत है
त्यौंही इतै सम्पदा अनन्त आयु दीर्घ लै
सुतहू कीरति औ सुकीरति लहत है ॥३४॥

( ३३ )
जो मनुष्य श्री शिवजी के इस सुन्दर स्तोत्र को प्रति दिन
शुद्ध चित्त से पढ़ेगा वह शिवलोक में इन्द्र के समान गिना
जायेगा और इस संसार में धन, आयु, सन्तान और अच्छी
कीर्ति पावेगा ॥३४॥
महेशान्नापरो देवो महिम्नो नापरा स्तुतिः ।
अघोरान्नापरो मंत्रो नास्ति तत्त्वं गुरोः परम् ॥३५॥
देव न दूजो महेश्वर के सिवा
है जो कहीं तौ समत्व न कोई,
त्यों ही समीप महिम्न के हैं स्तुति
और जो राखै महत्व न कोई
मन्त्र अघोर ते और बड़ी नहीं
और कौ इते सत्व न कोई
श्रीगुरु ही त्यों महान जहान में;
है गुरु सों बड़ौ तत्व न कोई ॥३५॥
सम्पूर्ण देवताओं में शिवजी के बराबर कोई दूसरा देवता
नहीं है । शिव की स्तुति करने के बाद किसी दूसरे देवता की
स्तुति की आवश्यकता नहीं । अघोर मन्त्र से बड़ा कोई दूसरा
मन्त्र नहीं है । शिवजी के समान इस पृथ्वी पर और कोई बड़ा
तत्व गुरु से बढ़कर नहीं है ॥३५॥

स्तोत्र फलश्रुति, शिव नामावली एवं आरती ताण्डव

( ३४ )
दीक्षा दानं तपस्तीर्थ ज्ञानं योगादिकाः क्रियाः ।
महिम्नस्तवपाठस्य कलां नार्हन्ति षोडशीम् ॥३६॥
दीक्षा, दान, सुतीर्थ; तप
अग्य आदि कृति ग्यान ।
होत न महिम्न पाठ की
षोडश कला समान ॥३६॥
दीक्षा, दान, तप, तीर्थ करना, ज्ञान और यज्ञादिक कर्म
महिम्न स्तोत्र के पाठ के फल के सोलहवें भाग के भी बराबर
फल नहीं देते ॥३६॥
कुसुमदशननामा सर्वगन्धर्वराजः
शशिधर वर मोलेर्देवदेवस्य दासः ।
स खलु निज महिम्नो भ्रष्ट एवास्य रोषात्
स्तवनमिदमकार्षीद्दिव्यदिव्यं महिम्नः ॥३७॥
जिनके भाल बिसाल बल विधु शोभा पावत
जो देवन के देव, देव जिन्हें सीस नवावत,
तिन कोई इक दास पास रहि विजन डुलावत
पुष्पदन्त गन्धर्वराज जग बीच कहावत ।
निज प्रभु के ही कोप ते निज महिमा सों जो गिरयौ
वाने स्तवन महिम्न कौ दिव्य दिव्यतर यह करयौ ॥३७॥

( ३५ )
ये पुष्प दंताचार्य जो पहली योनि में कुसुमदर्शन नामक
गन्धर्व थे, ये किसी समय एकान्त में शिवजी और पार्वती जी
की आनन्द की बातें छिपकर सुनने लगे तो शिवजी ने देखते ही
यह शाप दिया कि—"जाओ तुम गन्धर्व पदवी से पतित होकर
मनुष्य लोक में जन्म लो।" तब उन्होंने यहाँ जन्म लेकर परम
दिव्य इस महिम्न स्तोत्र से शिवजी को अत्यन्त प्रसन्न कर मनो-
वांछित फल प्राप्त किया ॥३७॥
सुरवरमुनिपूज्यं स्वर्गमोक्षैकहेतुं
पठति यदि मनुष्यः प्राञ्जलिर्नन्यचेताः ।
व्रजति शिवसमीपं किन्नरैः स्तूयमानः
स्तवनमिदममोघं पुष्पदन्तप्रणीतम् ॥३८॥
सुर नर मुनि सब पढ़ें, करें याकौ आराधन,
स्वर्ग और अपवर्गहु को यह एकै साधन ।
पुष्पदन्त कौ रचिन स्तोत्र अनुपम गुनवारौ,
आराधन कौ यह अचूक फल साधनहारौ ।
जोरि जुगल कर पढ़त नर यदि इकचित नित प्रात है,
किन्नर गन सौं गुन सुनत सिव समीप वह जात है ॥३८॥
पुष्पदंताचार्य का बनाया जो यह सुन्दर महिम्न स्तोत्र है;
वह देवता और मुनियों से पूजित और स्वर्ग तथा मोक्ष को

( ३६ )
प्राप्त कराने वाला है। ऐसे स्तोत्र को जो मनुष्य एकचित्त
होकर हाथ जोड़कर पढ़ता है, वह शिवजी के समीप जाता है
और उसकी स्तुति किन्नर आदि करते हैं ॥३८॥
आसमाप्तमिदं स्तोत्रं पुष्पगन्धर्वभाषितम्
अनौपम्य मनोहारि पुण्यमीश्वरवर्णनम् ॥३९॥
स्तवन रचित गन्धर्व कौ परिपूरन यह जान ।
सिब वरनन मय मनहरन अनुपमसुचि कल्यान ॥३९॥
गन्धर्व अर्थात पुष्पदंताचार्य का कहा हुआ पुण्यकारी यह
महिम्न स्तोत्र सम्पूर्ण हुआ, इसके बराबर कोई दूसरा स्तोत्र
नहीं है, इसमें शंकर का ही वर्णन है ॥३९॥
इत्येषा वांगमयी पूजा श्रीमच्छंकरपादयोः ।
अर्पिता तेन मे देवः प्रीयतां च सदाशिवः ॥४०॥
बचन रचनमय अर्चना यह अरपित सिव पाद ।
सदा सदाशिव देवबर सोपर करें प्रसाद ॥४०॥
यह स्तोत्ररूपी पूजा श्रीमहादेवजी के चरणकमल पर मैं
(पुष्पदन्ताचायें) ने चढ़ाई। इस स्तोत्र से श्रीसाम्बसदा शिव
शंकर मुझ पर प्रसन्न होवें ॥४०॥

( ३७ )
तव तत्त्वं न जानामि कीदृशोऽसि महेश्वर ।
यादृशोऽसि महादेव तादृशाय नमो नमः ॥४१॥
तत्व न जानौं ईस तब, कस तुम महिमा धाम ।
महादेव जाविध जहाँ ताविध तुम्हें प्रनाम ॥४१॥
हे महेश्वर ! हम आपका तत्व नहीं जानते, तुम्हारी महिमा
भी नहीं जानी जा सकती । आप जैसे भी हैं जहाँ भी हैं मैं
आपको प्रणाम करता हूँ ॥४१॥
एककालं द्विकालं वा त्रिकालं यः पठेत् सदा ।
सर्वपापविनिर्मुक्तः शिवलोकं स गच्छति ॥४२॥
एक, दोय, तीनों समय पढ़त जो नर अभिराम ।
सब पापन ते मुक्त सो बसत, सदा सिवधाम ॥४२॥
जो मनुष्य इस महिम्नस्तोत्र को एक बार, दो बार या
तीन बार नित्य पढ़ेगा, वह संसार के पापों से छूटकर शिवलोक
को प्राप्त होगा ॥४२॥
श्री पुष्पदन्तमुखपंकज निर्गतेन
स्तोत्रेण किल्विषहरेण हरप्रियेण ।

( ३८ )
कण्ठस्थितेन पठितेन समाहितेन,
सुप्रीणितो भवति भूतपतिर्महेशः ॥४३॥
पुष्पदन्त मुख कंज ते प्रगटयौ स्तोत्र उदार,
रासि रासि अघ हरत है, हर कौ परम पियार ।
कंठ किएं याकें पढ़ें, करिबे ते नित ध्यान,
होत प्रसन्न महेस वर भूतनाथ भगवान ॥४३॥
श्रीपुष्पदन्ताचार्य के मुख से कहा हुआ जो यह शिव प्रिय
पापनाशक महिम्नस्तोत्र है, चित्त लगाकर इसको याद कर पाठ
करने से भूतपति श्री महादेव जी अत्यन्त प्रसन्न होते हैं ॥४३॥
॥ शिवमहिम्नः स्तोत्र सम्पूर्ण ॥

शिवताण्डवस्तोत्रम्
जटाटवीगलज्जलप्रवाहपावितस्थले
गलेऽवलम्ब्य लम्बितां भुजंगतुंगमालिकाम ।
डमड्डमड्डमड्डमन्निनादवड्डमर्वयं
चकार चण्डताण्डवं तनोतु नः शिवः शिवम ॥१॥
सघन जटामण्डल रूपवन से प्रभावित होकर श्रीगंगाजी की
धारायें जिन शिवजी के पवित्र कण्ठ प्रदेश को प्रक्षालित करती
(धोती) हैं, और जिनके गले में लम्बे-लम्बे बड़े-बड़े सर्पों की
मालायें लटक रही हैं, तथा जो शिवजी डमरू को डम डम डम
बजाकर प्रचण्ड ताण्डव नृत्य करते हैं, वे शिव जी हमारा
कल्याण करें ॥१॥
जटाकटाहसम्भ्रमन्निलिम्पनिर्झरी-
विलोलवीचिवल्लरीविराजमानमूर्धनि ।
( ३६ )

( ४० )
धगद्धगद्धगज्ज्वलल्ललाटपट्टपावके
किशोरचन्द्रशेखरे रतिः प्रतिक्षणं मम ॥२॥
अति गम्भीर कटाहरूप जटाओं में अतिवेग से विलास
पूर्वक भ्रमण करती हुई देवनदी गंगाजी की चंचल लहरें जिन
शिवजी के शीश पर लहरा रही हैं, तथा जिनके मस्तक में
अग्नि की प्रचण्ड ज्वालायें धधक-धधक करके प्रज्वलित हो
रही हैं, ऐसे बालचन्द्रमा से विभूषित मस्तक वाले शिव जी में
मेरा अनुराग (प्रेम) प्रतिक्षण बढ़ता रहे ॥२॥
धराधरेन्द्रनन्दिनीविलासबन्धुबन्धुर-
स्फुरद्दगन्तसन्ततिप्रमोदमानमानसे ।
कृपाकटाक्षधोरणीनिरुद्धदुर्धरापदि
क्वचिद्दिगम्बरे मनो विनोदमैतु वस्तुनि ॥३॥
पर्वतराजसुता के विलासमय रमणीय कटाक्षों से परम
आनन्दित चित्त वाले (महेश्वर) तथा जिनकी कृपादृष्टि से
भक्तों की बड़ी से बड़ी विपत्तियाँ दूर हो जाती हैं ऐसे (दिशाही
है वस्त्र जिसके) दिगम्बर शिवजी की आराधना में मेरा चित्त
कब आनन्दित होगा ॥३॥

( ४१ )
जटाभुजंगपिंगलस्फुरत्फणामणिप्रभा-
कदम्बकुंकमद्रवप्रलिप्तदिग्वधूमुखे ।
मदान्धसिन्धुरस्फुरत्त्वगुत्तरीयेमेदुरे
मनो विनोदमद्भुतं विभर्तु भूतभर्तरि ॥४॥
जटाओं में लिपटे सर्प के फण के मणियों के प्रकाशमान
पीलेवर्ण प्रभा-समूह केसर कान्ति से दिशा बन्धुओं के मुख
मण्डल को चमकाने वाले, मतवाले गजासुर के चर्म रूप ओढ़ने
से विभूषित, प्राणियों की रक्षा करने वाले शिवजी में मेरा चित्त
विनोद को प्राप्त हो ॥४॥
ललाटचत्वरज्वलद्धनञ्जयस्फुलिंगया-
निपीतपञ्चसायकं नमन्निलिम्पनायकम् ।
सुधामयूखलेखया विराजमानशेखरं
महाकपालिसंपदे सरिज्जटालमस्तु नः ॥५॥
इन्द्रादि देवताओं का गर्व चूर्ण करते हुए जिन शिवजी ने
अपने विशाल मस्तक की अग्नि ज्वाला से कामदेव को भस्म
कर दिया, वे अमृत किरणों वाले चन्द्रमा की कांति तथा गंगा

( ४२ )
जो से सुशोभित जटावाले, तेज रूप नरमुंडधारी शिवजी हमको
अक्षय सम्पत्ति दें ॥५॥
सहस्त्रलोचनप्रभृत्यशेषलेखशेखर-
प्रसूनधूलिधोरणीविधूसराङ्‌घ्रिपीठभूः ।
भुजंगराजमालया विबद्धजाटजूटकः
श्रियै चिराय जायतां चकोर बन्धुशेखरः ॥६॥
इन्द्रादि समस्त देवताओं के सिर में सुसज्जित पुष्पों की
धूलिराशि से धूसरित पादपृष्ठ वाले सर्पराजों की मालाओं से
विभूषित जटा वाले चन्द्रशेखर भगवान हमें चिरकाल के लिए
सम्पदा दें ॥६॥
करालभालपट्टिकाधगद्धगद्धगज्ज्वल-
द्धनञ्जयाहुतीकृतप्रचण्डपञ्चसायके ।
धराधरेन्द्रनन्दिनीकुचाग्रचित्रपत्रक-
प्रकल्पनैकशिल्पिनि त्रिलोचने रतिर्मम ॥७॥
धक् धक् धक् जलती हुई अपने मस्तक की भयंकर ज्वाला
से प्रचण्ड कामदेव को भस्म करने वाले तथा पर्वत राजसुता

( ४३ )
के स्तन के अग्रभाग पर विविध भाँति की चित्रकारी करने में
अति चतुर त्रिलोचन में मेरी प्रीति अटल हो ॥७॥
नवीनमेघमण्डलीनिरुद्धदुर्धरस्फुरत्
कुहूनिशीथिनीतमःप्रबन्धवद्धकन्धरः ।
निलिम्पनिर्झरीधरस्तनोतु कृति सुन्दरः ।
कलानिधानबन्धुरः श्रियं जगद्धुरन्धरः ॥८॥
नवीन मेघों की घटाओं से परिपूर्ण अमावस्याओं की रात्रि
के घने अन्धकार की तरह अति गूढ़ कण्ठ वाले, दव नदी गंगा
को धारण करने वाले, गजचर्म से सुशोभित, बालचन्द्र की
कलाओं के बोझ से विनत, जगत के बोझ को धारण करने वाले
शिवजी हमको सब प्रकार की सम्पत्ति दें ॥८॥
प्रफुल्लनीलपंकजप्रपञ्चकालिमप्रभा-
वलम्बिकण्ठकन्दलीरुचि प्रबद्धकन्धरम् ।
स्मरच्छिदं पुरच्छिदं भवच्छिदं मखच्छिदं
गजच्छिदान्धकच्छिदं तमन्तकच्छिदं भजे ॥६॥

" or "दक्षयज्ञविध्वंसक"?
Wait! Look at line 5:
"दक्षयज्ञविध्वंसक," -> wait! Look at the letter after 'वि':
It's 'ध' or 'छ'?
Wait! Look at line 5:
"दक्षयज्ञविछ्वंसक," or "दक्षयज्ञविध्वंसक,"?
LOOK AT LINE 5:
द - क्ष - य - ज्ञ - वि - छ - वं - स - क !
Wait, is that a 'छ' or a 'ध्'?
Look at the circle/loop: it has a vertical bar, and a 'छ' with a loop at the bottom!
Wait! In line 14:
"दक्षयज्ञविध्वंसक" -> here it is clearly 'ध' + 'व' = 'ध्व'!
In line 5: it is 'छ' with 'व' underneath: 'छ्व'! "दक्षयज्ञविछ्वंसक"!
The typesetter literally used 'छ्व' or a broken 'ध्व'!
This confirms that this printing has several typesetter quirks/errors typical of old Indian presses!
Look at line 6: "॥६॥" instead of "॥९॥" or "॥८॥"!
Look at line 5: "दक्षयज्ञविछ्वंसक"!
Look at line 4: "काटतै वाले;" or "काटने वाले;"!

Wait, let's be extremely careful: should we transcribe the

( ४५ )
जयत्वदभ्रमभ्रमद् भुजंगमश्वसद-
विनिर्गमत्क्रमस्फुरत्करालभालहव्यवाट ।
धिमिद्धिमिद्धिमिध्वनन्मृदंगतुं मंगल-
ध्वनिक्रमप्रवर्तितः प्रचंडतांडवः शिवः ॥११॥
अत्यन्त शीघ्र वेगपूर्वक भ्रमण करते हुए सर्पों के फुफकार
छोड़ने से क्रमशः ललाट में बढ़ी हुई प्रचण्ड अग्नि वाले मृदंग
की धिम धिम धिम मंगलकारी उच्च ध्वनि के क्रमारोह से
चण्ड ताण्डव नृत्य में लीन होने वाले शिवजी सब भाँति से
सुशोभित हो रहे हैं ॥११॥
दृषद्विचित्रतल्पयोर्भु जंगमौक्तिकस्रजो-
र्गरिष्ठरत्नलोष्टयोः सुहृद्वि पक्षपक्षयोः ।
तृणारविन्दचक्षुषोः प्रजामहीमहेन्द्रयोः
समप्रवृत्तिकः कदा सदाशिवं भजाम्यहम् ॥१२॥
कड़े पत्थर और कोमल विचित्र शय्या में सर्प और मोतियों
की मालाओं में, मिट्टी के टुकड़ों और बहुमूल्य रत्नों में, शत्रु
और मित्र में तिनके और कमललोचनियों में, प्रजा और

( ४६ )
महाराजाधिराजाओं में समान दृष्टि रखते हुए कब मैं श्री
सदाशिव जी का भजन करूँगा ॥१२॥
कदा निलिम्पनिर्झरीनिकुंजकोटरे वसन्
विमुक्तदुर्मतिः सदा शिरःस्थमंजलिं वहन् ।
विलोललोललोचनो ललामभाललग्नकः
शिवेति मंत्रमुच्चरन् सदा सुखी भवाम्यहम् ॥१३॥
कब मैं श्री गंगाजी के कछारकुञ्ज में निवास करता हुआ,
निष्कपटी होकर शिर पर अञ्जली धारण किए हुए, चंचल
नेत्रों वाली ललनाओं में परम सुन्दरी श्री पार्वतीजी के मस्तक
में अंकित शिव मन्त्र उच्चारण करते हुए अक्षय सुख को प्राप्त
करूँगा ॥१३॥
निलिम्पनाथनागरीकदंबमोलमल्लिका-
निगुम्फनिर्भरक्षरन्म धूष्णिकामनोहरः ।
तनोतु नो मनोमुदं विनोदिनीमहर्निशं
परश्रिय परं पदं तदंगजत्विषां चयः ॥१४॥
देवाँगनाओं के सिर में गुंथे पुष्पों की मालाओं के झड़ते