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सर्वकोश
शिवताण्डव स्तोत्रम् (लङ्काधिपति रावण प्रणीत - सान्वय संस्कृत मूल एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

शिवताण्डव स्तोत्रम् (लङ्काधिपति रावण प्रणीत - सान्वय संस्कृत मूल एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shiva Tandava Stotram of Ravana

दशानन रावण (व्याख्याकार: पं. ज्वाला प्रसाद चतुर्वेदी) द्वारा

DevanagariHindipublished52 पृष्ठ

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शिवताण्डवस्तोत्रम्
जटाटवीगलज्जलप्रवाहपावितस्थले
गलेऽवलम्ब्य लम्बितां भुजंगतुंगमालिकाम ।
डमड्डमड्डमड्डमन्निनादवड्डमर्वयं
चकार चण्डताण्डवं तनोतु नः शिवः शिवम ॥१॥
सघन जटामण्डल रूपवन से प्रभावित होकर श्रीगंगाजी की
धारायें जिन शिवजी के पवित्र कण्ठ प्रदेश को प्रक्षालित करती
(धोती) हैं, और जिनके गले में लम्बे-लम्बे बड़े-बड़े सर्पों की
मालायें लटक रही हैं, तथा जो शिवजी डमरू को डम डम डम
बजाकर प्रचण्ड ताण्डव नृत्य करते हैं, वे शिव जी हमारा
कल्याण करें ॥१॥
जटाकटाहसम्भ्रमन्निलिम्पनिर्झरी-
विलोलवीचिवल्लरीविराजमानमूर्धनि ।
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