शिवताण्डव स्तोत्रम् (लङ्काधिपति रावण प्रणीत - सान्वय संस्कृत मूल एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

शिवताण्डव स्तोत्रम् (लङ्काधिपति रावण प्रणीत - सान्वय संस्कृत मूल एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shiva Tandava Stotram of Ravana
दशानन रावण (व्याख्याकार: पं. ज्वाला प्रसाद चतुर्वेदी) द्वारा
DevanagariHindipublished52 पृष्ठ
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( ३८ )
कण्ठस्थितेन पठितेन समाहितेन,
सुप्रीणितो भवति भूतपतिर्महेशः ॥४३॥
पुष्पदन्त मुख कंज ते प्रगटयौ स्तोत्र उदार,
रासि रासि अघ हरत है, हर कौ परम पियार ।
कंठ किएं याकें पढ़ें, करिबे ते नित ध्यान,
होत प्रसन्न महेस वर भूतनाथ भगवान ॥४३॥
श्रीपुष्पदन्ताचार्य के मुख से कहा हुआ जो यह शिव प्रिय
पापनाशक महिम्नस्तोत्र है, चित्त लगाकर इसको याद कर पाठ
करने से भूतपति श्री महादेव जी अत्यन्त प्रसन्न होते हैं ॥४३॥
॥ शिवमहिम्नः स्तोत्र सम्पूर्ण ॥