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सर्वकोश
शिवताण्डव स्तोत्रम् (लङ्काधिपति रावण प्रणीत - सान्वय संस्कृत मूल एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

शिवताण्डव स्तोत्रम् (लङ्काधिपति रावण प्रणीत - सान्वय संस्कृत मूल एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shiva Tandava Stotram of Ravana

दशानन रावण (व्याख्याकार: पं. ज्वाला प्रसाद चतुर्वेदी) द्वारा

DevanagariHindipublished52 पृष्ठ

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( ४६ )
महाराजाधिराजाओं में समान दृष्टि रखते हुए कब मैं श्री
सदाशिव जी का भजन करूँगा ॥१२॥
कदा निलिम्पनिर्झरीनिकुंजकोटरे वसन्
विमुक्तदुर्मतिः सदा शिरःस्थमंजलिं वहन् ।
विलोललोललोचनो ललामभाललग्नकः
शिवेति मंत्रमुच्चरन् सदा सुखी भवाम्यहम् ॥१३॥
कब मैं श्री गंगाजी के कछारकुञ्ज में निवास करता हुआ,
निष्कपटी होकर शिर पर अञ्जली धारण किए हुए, चंचल
नेत्रों वाली ललनाओं में परम सुन्दरी श्री पार्वतीजी के मस्तक
में अंकित शिव मन्त्र उच्चारण करते हुए अक्षय सुख को प्राप्त
करूँगा ॥१३॥
निलिम्पनाथनागरीकदंबमोलमल्लिका-
निगुम्फनिर्भरक्षरन्म धूष्णिकामनोहरः ।
तनोतु नो मनोमुदं विनोदिनीमहर्निशं
परश्रिय परं पदं तदंगजत्विषां चयः ॥१४॥
देवाँगनाओं के सिर में गुंथे पुष्पों की मालाओं के झड़ते