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सर्वकोश
शिवताण्डव स्तोत्रम् (लङ्काधिपति रावण प्रणीत - सान्वय संस्कृत मूल एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

शिवताण्डव स्तोत्रम् (लङ्काधिपति रावण प्रणीत - सान्वय संस्कृत मूल एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shiva Tandava Stotram of Ravana

दशानन रावण (व्याख्याकार: पं. ज्वाला प्रसाद चतुर्वेदी) द्वारा

DevanagariHindipublished52 पृष्ठ

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( २७ )
तिन ते परे जो हीनविकृत तुरीय धाम
ताकौ अर्धमात्र सूक्ष्म ध्वनि सौं जतावै है
एक है कै एक, त्यों अनेक हैं अनेक रूप
सरनद ! आप कौं प्रनवपद गावे है ॥२७॥
हे शरण देने वाले ! आप सब में व्यापक होकर अर्थात
ओंकार से ऋग्, यजु, साम तीनों वेद जाग्रत, स्वप्न, सुषुप्ति
तीनों अवस्था स्वर्ग, मृत्यु और पाताल तीनों लोक—ब्रह्मा,
विष्णु, रुद्र तीनों देवता इनको धारण करते हुए आपका चौथा
पवित्र धाम है, जिनको तुरीय कहते हैं, उस चैतन्य स्वरूप को भी
स्मरण करता हुआ हे भगवन ! समस्त रूप में व्यस्त ऐसे आपकी
स्तुति किया करता हूँ ॥२७॥
भवः शर्वा रुद्रः पशुपतिरथोग्रः सह महां-
स्तथा भीमेशानाविति तदाभिधानाष्टकमिदम् ।
अमुष्मिन् प्रत्येकं प्रविचरति देव ! श्रुतिरपि
प्रियायास्मैधामने प्रणिहितनमस्योऽस्मिभवते॥२८॥
भव, शर्व, रुद्र, पशुपति, महादेव उग्र
भीम औ ईसान—ये जो आठ दिव्य नाम हैं
एहो देव ! वेद इन में ते एक एकहू कौं
बोलिबे के हेतु बरनत आठों जाम हैं
प्रानहू ते प्यारे मेरे परम अधार आप
आप कौ सरूप दिव्य ललित ललाम हैं
याते हम भक्ति अनुरक्ति भरे अन्तर में
आप को निरन्तर ही करत प्रनाम हैं ॥२८॥