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सर्वकोश
शिवताण्डव स्तोत्रम् (लङ्काधिपति रावण प्रणीत - सान्वय संस्कृत मूल एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

शिवताण्डव स्तोत्रम् (लङ्काधिपति रावण प्रणीत - सान्वय संस्कृत मूल एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shiva Tandava Stotram of Ravana

दशानन रावण (व्याख्याकार: पं. ज्वाला प्रसाद चतुर्वेदी) द्वारा

DevanagariHindipublished52 पृष्ठ

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प्राप्त कराने वाला है। ऐसे स्तोत्र को जो मनुष्य एकचित्त
होकर हाथ जोड़कर पढ़ता है, वह शिवजी के समीप जाता है
और उसकी स्तुति किन्नर आदि करते हैं ॥३८॥
आसमाप्तमिदं स्तोत्रं पुष्पगन्धर्वभाषितम्
अनौपम्य मनोहारि पुण्यमीश्वरवर्णनम् ॥३९॥
स्तवन रचित गन्धर्व कौ परिपूरन यह जान ।
सिब वरनन मय मनहरन अनुपमसुचि कल्यान ॥३९॥
गन्धर्व अर्थात पुष्पदंताचार्य का कहा हुआ पुण्यकारी यह
महिम्न स्तोत्र सम्पूर्ण हुआ, इसके बराबर कोई दूसरा स्तोत्र
नहीं है, इसमें शंकर का ही वर्णन है ॥३९॥
इत्येषा वांगमयी पूजा श्रीमच्छंकरपादयोः ।
अर्पिता तेन मे देवः प्रीयतां च सदाशिवः ॥४०॥
बचन रचनमय अर्चना यह अरपित सिव पाद ।
सदा सदाशिव देवबर सोपर करें प्रसाद ॥४०॥
यह स्तोत्ररूपी पूजा श्रीमहादेवजी के चरणकमल पर मैं
(पुष्पदन्ताचायें) ने चढ़ाई। इस स्तोत्र से श्रीसाम्बसदा शिव
शंकर मुझ पर प्रसन्न होवें ॥४०॥