शिवताण्डव स्तोत्रम् (लङ्काधिपति रावण प्रणीत - सान्वय संस्कृत मूल एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shiva Tandava Stotram of Ravana
दशानन रावण (व्याख्याकार: पं. ज्वाला प्रसाद चतुर्वेदी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( २८ )
हे देवाधिदेव ! १. भव (उत्पत्तिकर्ता) २. शर्व (सर्वरूप
शुभ कर्ता) ३. रुद्र (रोदन कर्ता) ४. पशुपति (जीवों का पालक)
५. उग्र (क्रोधी) ६. महादेव सब में महान विशिष्ट, ७. भीम
(भयंकर) ८. ईशान (विशिष्ट, ऐश्वर्यवान) के लिए सभी
नमस्कार करते हैं ॥२८॥
नमो नेदिष्ठाय प्रियदव दविष्ठाय च नमो ।
नमः क्षोदिष्ठाय स्मरहर ! महिष्ठाय च नमः
निमोवर्षष्ठाय त्रिनयन ! यविष्ठाय च नमो
नमः सर्वस्मै ते तदिदमिति शर्वाय च नमः॥२९॥
एहो बन वीथिन में बिहरन बारे ! अति
निकट हमारे भगवान कौ प्रनाम है
अति दूरबारे कौं प्रनाम मदनारे ! त्योंही
लघुतर परम महान कौं प्रनाम है
तीन नैनवारे प्रभो ! अतिवय बूढ़हू कौं
नव वय रूढ़ त्यों जबान को प्रनाम है
सब मैं तुम्हीं हौ, सब रूप में तुम्ही हौ देव
'यह', 'वह' सकल जहान को प्रनाम है ॥२९॥
हे कामदेवनाशक ! आप समीप रहने वाले हो और दूर
रहने वाले भी हो, सूक्ष्म-से-सूक्ष्म और बड़े-से-बड़े रूप को धारण
करते हो, सब रीति से शिव आपको नमस्कार है ॥२९॥