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सर्वकोश
शिवताण्डव स्तोत्रम् (लङ्काधिपति रावण प्रणीत - सान्वय संस्कृत मूल एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

शिवताण्डव स्तोत्रम् (लङ्काधिपति रावण प्रणीत - सान्वय संस्कृत मूल एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shiva Tandava Stotram of Ravana

दशानन रावण (व्याख्याकार: पं. ज्वाला प्रसाद चतुर्वेदी) द्वारा

DevanagariHindipublished52 पृष्ठ

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( ४० )
धगद्धगद्धगज्ज्वलल्ललाटपट्टपावके
किशोरचन्द्रशेखरे रतिः प्रतिक्षणं मम ॥२॥
अति गम्भीर कटाहरूप जटाओं में अतिवेग से विलास
पूर्वक भ्रमण करती हुई देवनदी गंगाजी की चंचल लहरें जिन
शिवजी के शीश पर लहरा रही हैं, तथा जिनके मस्तक में
अग्नि की प्रचण्ड ज्वालायें धधक-धधक करके प्रज्वलित हो
रही हैं, ऐसे बालचन्द्रमा से विभूषित मस्तक वाले शिव जी में
मेरा अनुराग (प्रेम) प्रतिक्षण बढ़ता रहे ॥२॥
धराधरेन्द्रनन्दिनीविलासबन्धुबन्धुर-
स्फुरद्दगन्तसन्ततिप्रमोदमानमानसे ।
कृपाकटाक्षधोरणीनिरुद्धदुर्धरापदि
क्वचिद्दिगम्बरे मनो विनोदमैतु वस्तुनि ॥३॥
पर्वतराजसुता के विलासमय रमणीय कटाक्षों से परम
आनन्दित चित्त वाले (महेश्वर) तथा जिनकी कृपादृष्टि से
भक्तों की बड़ी से बड़ी विपत्तियाँ दूर हो जाती हैं ऐसे (दिशाही
है वस्त्र जिसके) दिगम्बर शिवजी की आराधना में मेरा चित्त
कब आनन्दित होगा ॥३॥