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सर्वकोश
शिवताण्डव स्तोत्रम् (लङ्काधिपति रावण प्रणीत - सान्वय संस्कृत मूल एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

शिवताण्डव स्तोत्रम् (लङ्काधिपति रावण प्रणीत - सान्वय संस्कृत मूल एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shiva Tandava Stotram of Ravana

दशानन रावण (व्याख्याकार: पं. ज्वाला प्रसाद चतुर्वेदी) द्वारा

DevanagariHindipublished52 पृष्ठ

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( ४३ )
के स्तन के अग्रभाग पर विविध भाँति की चित्रकारी करने में
अति चतुर त्रिलोचन में मेरी प्रीति अटल हो ॥७॥
नवीनमेघमण्डलीनिरुद्धदुर्धरस्फुरत्
कुहूनिशीथिनीतमःप्रबन्धवद्धकन्धरः ।
निलिम्पनिर्झरीधरस्तनोतु कृति सुन्दरः ।
कलानिधानबन्धुरः श्रियं जगद्धुरन्धरः ॥८॥
नवीन मेघों की घटाओं से परिपूर्ण अमावस्याओं की रात्रि
के घने अन्धकार की तरह अति गूढ़ कण्ठ वाले, दव नदी गंगा
को धारण करने वाले, गजचर्म से सुशोभित, बालचन्द्र की
कलाओं के बोझ से विनत, जगत के बोझ को धारण करने वाले
शिवजी हमको सब प्रकार की सम्पत्ति दें ॥८॥
प्रफुल्लनीलपंकजप्रपञ्चकालिमप्रभा-
वलम्बिकण्ठकन्दलीरुचि प्रबद्धकन्धरम् ।
स्मरच्छिदं पुरच्छिदं भवच्छिदं मखच्छिदं
गजच्छिदान्धकच्छिदं तमन्तकच्छिदं भजे ॥६॥