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सर्वकोश
शिवताण्डव स्तोत्रम् (लङ्काधिपति रावण प्रणीत - सान्वय संस्कृत मूल एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

शिवताण्डव स्तोत्रम् (लङ्काधिपति रावण प्रणीत - सान्वय संस्कृत मूल एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shiva Tandava Stotram of Ravana

दशानन रावण (व्याख्याकार: पं. ज्वाला प्रसाद चतुर्वेदी) द्वारा

DevanagariHindipublished52 पृष्ठ

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जयत्वदभ्रमभ्रमद् भुजंगमश्वसद-
विनिर्गमत्क्रमस्फुरत्करालभालहव्यवाट ।
धिमिद्धिमिद्धिमिध्वनन्मृदंगतुं मंगल-
ध्वनिक्रमप्रवर्तितः प्रचंडतांडवः शिवः ॥११॥
अत्यन्त शीघ्र वेगपूर्वक भ्रमण करते हुए सर्पों के फुफकार
छोड़ने से क्रमशः ललाट में बढ़ी हुई प्रचण्ड अग्नि वाले मृदंग
की धिम धिम धिम मंगलकारी उच्च ध्वनि के क्रमारोह से
चण्ड ताण्डव नृत्य में लीन होने वाले शिवजी सब भाँति से
सुशोभित हो रहे हैं ॥११॥
दृषद्विचित्रतल्पयोर्भु जंगमौक्तिकस्रजो-
र्गरिष्ठरत्नलोष्टयोः सुहृद्वि पक्षपक्षयोः ।
तृणारविन्दचक्षुषोः प्रजामहीमहेन्द्रयोः
समप्रवृत्तिकः कदा सदाशिवं भजाम्यहम् ॥१२॥
कड़े पत्थर और कोमल विचित्र शय्या में सर्प और मोतियों
की मालाओं में, मिट्टी के टुकड़ों और बहुमूल्य रत्नों में, शत्रु
और मित्र में तिनके और कमललोचनियों में, प्रजा और