शिवताण्डव स्तोत्रम् (लङ्काधिपति रावण प्रणीत - सान्वय संस्कृत मूल एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shiva Tandava Stotram of Ravana
दशानन रावण (व्याख्याकार: पं. ज्वाला प्रसाद चतुर्वेदी) द्वारा
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इति चकितमन्दीकृत्य मां भक्तिराधा-
द्वरद ! चरणयोस्ते वाक्यपुष्पोपहारम् ॥३१॥
मेरो यह चित्त कहाँ चेरौ सै कलेसन कौ
सुध बुध कलप अलप अति पायौ है,
सीमा हीन रावरी सनातन समृद्धि कहाँ
लाँघि गुन सीमा के परेई दरसायौ, है
याते लखि चकित चकित मोहि भक्ति तव
बरद बलात गुन गान में लगायौ है
रुचि अनुसार यह बचन सुमन हार
रावरे चरन उपहार लै चढ़ायौ है ॥३१॥
हे वर देने वाले ! आपकी महिमा का तो अन्त नहीं है
और मेरा चित्त रागद्वेष और क्लेश आदि के वश होकर परिणाम
में दुर्बल है । इसी प्रकार जब मैं गुणों के वर्णन से भयभीत हुआ
तब मेरी भक्ति ने उत्साह देकर वाणीरूपी फूल की माला
आपके चरणारविन्दों को पहना दी अर्थात मेरी सामर्थ्य कहाँ
जो आपके गुणों का वर्णन करूँ, यह मेरी भक्ति ने थोड़ा सा
वर्णन कराया है ॥३१॥
असितगिरिसमं स्यात्कज्जलं सिंधुपात्रे
सुरतरुवरशाखा लेखनी पत्रमुर्वी ।
लिखति यदि गृहीत्वा शारदा सर्वकालं
तदपि तव गुणानामीश पारं ! न याति ॥३२॥•
• ये ३२ श्लोक शिवजी की महिमा के हैं । इसके आगे के
स्तोत्रों में अन्त तक फल और आपके नामों की विशेषता लिखी है ।