शिवताण्डव स्तोत्रम् (लङ्काधिपति रावण प्रणीत - सान्वय संस्कृत मूल एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shiva Tandava Stotram of Ravana
दशानन रावण (व्याख्याकार: पं. ज्वाला प्रसाद चतुर्वेदी) द्वारा
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दीक्षा दानं तपस्तीर्थ ज्ञानं योगादिकाः क्रियाः ।
महिम्नस्तवपाठस्य कलां नार्हन्ति षोडशीम् ॥३६॥
दीक्षा, दान, सुतीर्थ; तप
अग्य आदि कृति ग्यान ।
होत न महिम्न पाठ की
षोडश कला समान ॥३६॥
दीक्षा, दान, तप, तीर्थ करना, ज्ञान और यज्ञादिक कर्म
महिम्न स्तोत्र के पाठ के फल के सोलहवें भाग के भी बराबर
फल नहीं देते ॥३६॥
कुसुमदशननामा सर्वगन्धर्वराजः
शशिधर वर मोलेर्देवदेवस्य दासः ।
स खलु निज महिम्नो भ्रष्ट एवास्य रोषात्
स्तवनमिदमकार्षीद्दिव्यदिव्यं महिम्नः ॥३७॥
जिनके भाल बिसाल बल विधु शोभा पावत
जो देवन के देव, देव जिन्हें सीस नवावत,
तिन कोई इक दास पास रहि विजन डुलावत
पुष्पदन्त गन्धर्वराज जग बीच कहावत ।
निज प्रभु के ही कोप ते निज महिमा सों जो गिरयौ
वाने स्तवन महिम्न कौ दिव्य दिव्यतर यह करयौ ॥३७॥