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सर्वकोश
शिवताण्डव स्तोत्रम् (लङ्काधिपति रावण प्रणीत - सान्वय संस्कृत मूल एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

शिवताण्डव स्तोत्रम् (लङ्काधिपति रावण प्रणीत - सान्वय संस्कृत मूल एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shiva Tandava Stotram of Ravana

दशानन रावण (व्याख्याकार: पं. ज्वाला प्रसाद चतुर्वेदी) द्वारा

DevanagariHindipublished52 पृष्ठ

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पृष्ठ 33

( ३१ )
कारे गिरिराज तुल्य काजर कौं घोरि घोरि............
स्याही करि राखै, महासिंधु मसिदानी है,
भाषा लिखिबे को साखा सुरतरु लेखनी है
कागद की करी त्योंही पूरी वसुधानी है
लै कै सब साधन अराथन में लीन सदा
लिखित महेस गुन गन की कहानी है
हारैथकि साथ, गुन गाथ कौं तिहारे नाथ
तदपि न पावै पार सारदा सयानी है ॥३२॥
हे भगवन ! यदि सरस्वती नील-पर्वत के बराबर काजल
स्याही समुद्ररूपी पात्र में डालकर कल्पवृक्ष रूपी लेखनी से
आपके गुणों को लिखे तो भी पार नहीं पा सकती क्योंकि आपके
अनन्त गुण हैं और हमारो तो सामर्थ्य ही क्या है जो आपके
गुणों का वर्णन कर सकें ॥३२॥
असुरसुरमुनीन्द्रैरर्चितस्येन्दुमौले-
र्ग्रथितगुणमहिम्नो निगुर्णस्येश्वरस्य ।
सकलगुणवरिष्ठः पुष्पदन्ताभिधानो
रुचिरमलघुवृत्तैऽ स्तोत्रमेतच्चकार ॥३३॥
पूजत जिनहि सुर असुर मुनींद्र बृन्द
भाल जिनकेई बाल इन्दु छबि पायौ है
गुन ते रहित हित रूप वे महेश जिन,
गुन महिमा कौं इते बरनि सुनायौ है