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सर्वकोश
शिवताण्डव स्तोत्रम् (लङ्काधिपति रावण प्रणीत - सान्वय संस्कृत मूल एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

शिवताण्डव स्तोत्रम् (लङ्काधिपति रावण प्रणीत - सान्वय संस्कृत मूल एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shiva Tandava Stotram of Ravana

दशानन रावण (व्याख्याकार: पं. ज्वाला प्रसाद चतुर्वेदी) द्वारा

DevanagariHindipublished52 पृष्ठ

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पृष्ठ 34

( ३२ )
खास उनकेई दस गन में महान एक
नामवन्त है जो पुष्पदन्त कहलायो है
वानेई अलघु मृदु छन्द बन्द बारो यह
वन्दन के काज अभिनन्दन बनायो है ॥३३॥
सकल गुणों में श्रेष्ठ पुष्पदंताचार्य ने यह सुन्दर स्तोत्र
देवताओं, राक्षसों और मुनियों से पूजित और चन्द्रमा जिस के
मस्तक पर शोभायमान है। प्रसिद्ध जिनके गुण हैं। ऐसे निर्गुण
श्री शिव जी की महिमा मनोहर विस्तृत छन्दों में की है ॥३३॥
अहरहरनवद्यं धूर्जटेः स्तोत्रमेतत्
पठति परमभक्त्या शुद्धचित्तः पुमान्यः ।
स भवति शिवलोके रुद्रतुल्यस्तथाऽत्र
प्रचुरतरधनायुः पुत्रवान्कीर्तिमांश्च ॥३४॥
मानस में भारि भूरि भक्ति अनुरक्ति भरे
नित्त जो मनुज शुद्धचित्त है रहत है
स्तवन बिसेस या महेस महिमा को मन्जु
रोज रोज बदन सरोज सौ कहत है
तजि सो असिव लोक सजि सिवलोक जाय
सिव भगवान की समानता गहत है
त्यौंही इतै सम्पदा अनन्त आयु दीर्घ लै
सुतहू कीरति औ सुकीरति लहत है ॥३४॥