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सर्वकोश
शिवताण्डव स्तोत्रम् (लङ्काधिपति रावण प्रणीत - सान्वय संस्कृत मूल एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

शिवताण्डव स्तोत्रम् (लङ्काधिपति रावण प्रणीत - सान्वय संस्कृत मूल एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shiva Tandava Stotram of Ravana

दशानन रावण (व्याख्याकार: पं. ज्वाला प्रसाद चतुर्वेदी) द्वारा

DevanagariHindipublished52 पृष्ठ

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( २६ )
बहलरजसे विश्वोत्पत्तौ भवाय नमो नमः
प्रबलतमसे तत्संहारे हराय नमो नमः
जनसुखकृते सत्वोद्रिक्तौ मृडाय नमो नमः
प्रमहसि पदे निस्त्रैगुण्ये शिवाय नमो नमः ॥३०॥
बिस्व बिरचैवे कौ रजोगुन अधिक जाको
भव के प्रभाव भव रूप को नमन है,
तम के बढ़े पै जान समय संहारहू को
हर है हरत, हर रूप कौं नमन है ।
शुद्ध सत्व वृद्धि की सुजोग पाय लोगन कौं
सुख दैनवारे मृडरूप कौं नमन है,
त्रिगुन रहित हित परम प्रकासमय
पद में लसित शिव रूप कौं नमन है ॥३०॥
संसार की उत्पत्ति के समय आपने रजोगुण सहित जो भव
रूप धारण किया, और सृष्टि के पालन करने को सत्व गुण
सहित सत्यरूप और प्रलय करने के समय तमोगुण सहित हर
रूप धारण किया; मोक्ष के समय तीनों गुणों से रहित अर्थात
निर्गुण शिव शान्त रूप धारण किया। हे भगवन ! आपके स्वयं
प्रकाश अनेक शिव स्वरूपों को नमस्कार है ॥३०॥

  • कृशहरिणति चेतः क्लेशवश्यं क्व चेदं
    क्व च तव गुणसीमोल्लङ्घिनो शश्वदृद्धि ।