शिवताण्डव स्तोत्रम् (लङ्काधिपति रावण प्रणीत - सान्वय संस्कृत मूल एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

शिवताण्डव स्तोत्रम् (लङ्काधिपति रावण प्रणीत - सान्वय संस्कृत मूल एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shiva Tandava Stotram of Ravana
दशानन रावण (व्याख्याकार: पं. ज्वाला प्रसाद चतुर्वेदी) द्वारा
DevanagariHindipublished52 पृष्ठ
पृष्ठ 39, कुल 52 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 39
( ३७ )
तव तत्त्वं न जानामि कीदृशोऽसि महेश्वर ।
यादृशोऽसि महादेव तादृशाय नमो नमः ॥४१॥
तत्व न जानौं ईस तब, कस तुम महिमा धाम ।
महादेव जाविध जहाँ ताविध तुम्हें प्रनाम ॥४१॥
हे महेश्वर ! हम आपका तत्व नहीं जानते, तुम्हारी महिमा
भी नहीं जानी जा सकती । आप जैसे भी हैं जहाँ भी हैं मैं
आपको प्रणाम करता हूँ ॥४१॥
एककालं द्विकालं वा त्रिकालं यः पठेत् सदा ।
सर्वपापविनिर्मुक्तः शिवलोकं स गच्छति ॥४२॥
एक, दोय, तीनों समय पढ़त जो नर अभिराम ।
सब पापन ते मुक्त सो बसत, सदा सिवधाम ॥४२॥
जो मनुष्य इस महिम्नस्तोत्र को एक बार, दो बार या
तीन बार नित्य पढ़ेगा, वह संसार के पापों से छूटकर शिवलोक
को प्राप्त होगा ॥४२॥
श्री पुष्पदन्तमुखपंकज निर्गतेन
स्तोत्रेण किल्विषहरेण हरप्रियेण ।