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सर्वकोश
शिवताण्डव स्तोत्रम् (लङ्काधिपति रावण प्रणीत - सान्वय संस्कृत मूल एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

शिवताण्डव स्तोत्रम् (लङ्काधिपति रावण प्रणीत - सान्वय संस्कृत मूल एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shiva Tandava Stotram of Ravana

दशानन रावण (व्याख्याकार: पं. ज्वाला प्रसाद चतुर्वेदी) द्वारा

DevanagariHindipublished52 पृष्ठ

पृष्ठ 35, कुल 52 में से

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पृष्ठ 35

( ३३ )
जो मनुष्य श्री शिवजी के इस सुन्दर स्तोत्र को प्रति दिन
शुद्ध चित्त से पढ़ेगा वह शिवलोक में इन्द्र के समान गिना
जायेगा और इस संसार में धन, आयु, सन्तान और अच्छी
कीर्ति पावेगा ॥३४॥
महेशान्नापरो देवो महिम्नो नापरा स्तुतिः ।
अघोरान्नापरो मंत्रो नास्ति तत्त्वं गुरोः परम् ॥३५॥
देव न दूजो महेश्वर के सिवा
है जो कहीं तौ समत्व न कोई,
त्यों ही समीप महिम्न के हैं स्तुति
और जो राखै महत्व न कोई
मन्त्र अघोर ते और बड़ी नहीं
और कौ इते सत्व न कोई
श्रीगुरु ही त्यों महान जहान में;
है गुरु सों बड़ौ तत्व न कोई ॥३५॥
सम्पूर्ण देवताओं में शिवजी के बराबर कोई दूसरा देवता
नहीं है । शिव की स्तुति करने के बाद किसी दूसरे देवता की
स्तुति की आवश्यकता नहीं । अघोर मन्त्र से बड़ा कोई दूसरा
मन्त्र नहीं है । शिवजी के समान इस पृथ्वी पर और कोई बड़ा
तत्व गुरु से बढ़कर नहीं है ॥३५॥