शिवताण्डव स्तोत्रम् (लङ्काधिपति रावण प्रणीत - सान्वय संस्कृत मूल एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shiva Tandava Stotram of Ravana
दशानन रावण (व्याख्याकार: पं. ज्वाला प्रसाद चतुर्वेदी) द्वारा
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ये पुष्प दंताचार्य जो पहली योनि में कुसुमदर्शन नामक
गन्धर्व थे, ये किसी समय एकान्त में शिवजी और पार्वती जी
की आनन्द की बातें छिपकर सुनने लगे तो शिवजी ने देखते ही
यह शाप दिया कि—"जाओ तुम गन्धर्व पदवी से पतित होकर
मनुष्य लोक में जन्म लो।" तब उन्होंने यहाँ जन्म लेकर परम
दिव्य इस महिम्न स्तोत्र से शिवजी को अत्यन्त प्रसन्न कर मनो-
वांछित फल प्राप्त किया ॥३७॥
सुरवरमुनिपूज्यं स्वर्गमोक्षैकहेतुं
पठति यदि मनुष्यः प्राञ्जलिर्नन्यचेताः ।
व्रजति शिवसमीपं किन्नरैः स्तूयमानः
स्तवनमिदममोघं पुष्पदन्तप्रणीतम् ॥३८॥
सुर नर मुनि सब पढ़ें, करें याकौ आराधन,
स्वर्ग और अपवर्गहु को यह एकै साधन ।
पुष्पदन्त कौ रचिन स्तोत्र अनुपम गुनवारौ,
आराधन कौ यह अचूक फल साधनहारौ ।
जोरि जुगल कर पढ़त नर यदि इकचित नित प्रात है,
किन्नर गन सौं गुन सुनत सिव समीप वह जात है ॥३८॥
पुष्पदंताचार्य का बनाया जो यह सुन्दर महिम्न स्तोत्र है;
वह देवता और मुनियों से पूजित और स्वर्ग तथा मोक्ष को