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सर्वकोश
शिवताण्डव स्तोत्रम् (लङ्काधिपति रावण प्रणीत - सान्वय संस्कृत मूल एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

शिवताण्डव स्तोत्रम् (लङ्काधिपति रावण प्रणीत - सान्वय संस्कृत मूल एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shiva Tandava Stotram of Ravana

दशानन रावण (व्याख्याकार: पं. ज्वाला प्रसाद चतुर्वेदी) द्वारा

DevanagariHindipublished52 पृष्ठ

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( ४१ )
जटाभुजंगपिंगलस्फुरत्फणामणिप्रभा-
कदम्बकुंकमद्रवप्रलिप्तदिग्वधूमुखे ।
मदान्धसिन्धुरस्फुरत्त्वगुत्तरीयेमेदुरे
मनो विनोदमद्भुतं विभर्तु भूतभर्तरि ॥४॥
जटाओं में लिपटे सर्प के फण के मणियों के प्रकाशमान
पीलेवर्ण प्रभा-समूह केसर कान्ति से दिशा बन्धुओं के मुख
मण्डल को चमकाने वाले, मतवाले गजासुर के चर्म रूप ओढ़ने
से विभूषित, प्राणियों की रक्षा करने वाले शिवजी में मेरा चित्त
विनोद को प्राप्त हो ॥४॥
ललाटचत्वरज्वलद्धनञ्जयस्फुलिंगया-
निपीतपञ्चसायकं नमन्निलिम्पनायकम् ।
सुधामयूखलेखया विराजमानशेखरं
महाकपालिसंपदे सरिज्जटालमस्तु नः ॥५॥
इन्द्रादि देवताओं का गर्व चूर्ण करते हुए जिन शिवजी ने
अपने विशाल मस्तक की अग्नि ज्वाला से कामदेव को भस्म
कर दिया, वे अमृत किरणों वाले चन्द्रमा की कांति तथा गंगा