संतबानी संग्रह (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर, दादू, तुलसी, पलटू आदि प्रमुख संतों की वाणी)
Santbani Sangrah: Belvedere Steam Printing Press Allahabad
महामहोपाध्याय पं. सुधाकर द्विवेदी एवं बेलवेडियर प्रेस द्वारा
नामदेवजी ३१
॥ भेद ॥
एक अनेक बियापक पूरक, जित देखौँ तित सोई ।
माया चित्र विचित्र बिमोहत, बिरला बूझै कोई ॥१॥
सब गोबिंद है सब गोबिंद है, गोबिंद बिन नहिँ कोई ।
सूत एक मनि सत्तसहस जस, ओत पोत प्रभु सोई ॥२॥
जल-तरंग अरु फेन बुदबुदा, जल तैँ भिन्न न होई ।
यह प्रपंच परब्रह्म की लीला, बिचरत आन न होई ॥३॥
मिथ्या भ्रम अरु स्वपन मनोरथ, सत्य पदारथ जाना ।
सुकिरत मनसा गुरु उपदेसी, जागत ही मन माना ॥४॥
कहत नामदेव हरि की रचना, देखो हृदय बिचारी ।
घट घट अंतर सर्व निरंतर, केवल एक मुरारी ॥५॥
॥ उपदेश ॥
(१)
परधन परदारा परिहरी१। ता के निकट बसहि नरहरी२ १
जो न भजंते नारायना । तिन का मैं न करौँ दर्सना ॥२॥
जिन के भीतर है अन्तरा । जैसे पसु तैसे वह नरा ॥३॥
प्रनवत नामदेव नाकहिँ बिना। ना सोहै बत्तीस लच्छना३॥४
(२)
काहे मन बिपना बन जाय । भूलो रे ठगमूरी४ खाय ॥१
जैसे मीन पानी मैं रहै। काल जाल की सुधि नहिँ लहै ॥२
जिभ्या स्वादी लीलत लोह। ऐसे कनिक कामिनी मोह ॥३॥
ज्यौँ मधुमाखी संचि अपार। मधु५ लीन्हो मुख दीन्हो छार४
गऊं बाछ को संचै छीर। गला बाँधि दुहि लेहि अहीर ॥५॥
(१) त्याग करै । (२) नरसिंह अर्थात ईश्वर । (३) आभरन, भूषन । (४) ठगाई,
धोखा । (५) मधुआ चिड़िया जो मधुमक्खी के बटोरे हुए शहद को खा जाती है ।
३२ शब्द संग्रह
माया कारन स्रम अति करै । सो माया लै गाड़ै नै ॥६॥
अति संचै समझै नहिं मूढ़ । धन धरती तन ह्वै गयो धूड़१॥७
काम क्रोध त्रिसना अति जरै । साधु संगत कबहूँ नहिं करै ॥८
कहत नामदेव ता चीआन², निरभय ह्वै भजिये भगवान ॥९
रैदासजी
[संक्षिप्त जीवन-चरित्र के लिये देखो पृष्ठ ६५ संतवानी संग्रह भाग १ ]
॥ चितावनी ॥
कहु मन राम नाम सँभारि ।
माया के भ्रम कहाँ भूल्यो, जाहुगे कर झारि ॥ टेक
देखि धौं इहाँ कौन तेरो, सगा सुत नहिं नारि ।
तोर उतंग सब दूरि करिहैं, देहिंगे तन जारि ॥१॥
प्रान गये कहो कौन तेरा, देखि सोच बिचारि ।
बहुरि येहि कलि काल नाहीं, जीति आवै हारि ॥२॥
यहु माया सब थोथरी रे, भगति दिस प्रतिहारि ।
कह रैदास सत बचन गुरु के, सो जिव तैं न बिसारि ॥३
॥ बिनय ॥
(१)
नरहरि³ चंचल है मति मेरी, कैसे भगति करूँ मैं तेरी ॥ टेक
तूँ मोहिं देखै हौं तोहि देखूँ, प्रीति परसपर होई ।
तूँ मोहिं देखै तोहि न देखूँ, यह मति सब बुधि खोई ॥१॥
सब घट अंतर रमसि निरंतर, मैं देखन नहिं जाना ।
गुन सब तोर मोर सब औगुन, कृत उपकार न माना ॥२॥
मैं तैं तोरि मोरि असमझि सौं, कैसे करि निस्तारा ।
कह रैदास कृष्ण करुनामय, जै जै जगत अधारा ॥३॥
(१) धूल । (२) चिल्ला कर, पुकार कर । (३) नरसिंह ईश्वर का एक अवतार ।
रैदासजी ३३
(२)
रामा हो जग-जीवन मोरा ।
तूँ न बिसारी मैं जन तोरा ॥ टेक ॥
संकट सोच पोच दिन राती ।
करम कठिन मोरि जाति कुजाती ॥१॥
हरहु विपति भावै करहु सो भाव ।
चरन न छाड़ौँ जाव सो जाव ॥२॥
कह रैदास कछु देहु अवलंबन ।
बेगि मिलौ जनि करौ विलंबन ॥३॥
॥ प्रेम ॥
(१)
देहु कलाली एक पियाला, ऐसा अवधू है मतवाला ॥ टेक
हे हे कलाली तैं क्या किया, सिरका सातैँ प्याला दिया ॥१
कहै कलाली प्याला देऊँ, पीवनहारे का सिर लेऊँ ॥२॥
चंद सूर दोउ सनमुख होई, पीवै प्याला मरै न कोई ॥३॥
सहज सुन्न मैं भाठी सरवै, पीवै रैदास गुरुमुख दरवै ॥४॥
(२)
जौ तुम तोरौ राम मैं नहिँ तोरूँ ।
तुम सौँ तोरि कवन सौँ जोरूँ ॥ टेक ॥
तीरथ बरत न करूँ अँदेसा ।
तुम्हरे चरन कमल क भरोसा ॥१॥
जहँ जहँ जाउँ तुम्हरी पूजा ।
तुम सा देव और नहिँ दूजा ॥२॥
मैं अपनो मन हरि सौँ जोर्यौँ ।
हरि सौँ जोरि सबन से तोर्यौँ ॥३॥
सबही पहर तुम्हारी आसा ।
मन क्रम बचन कहै रैदासा ॥४॥
५
३४ शब्द संग्रह
(३)
अब कैसे छुटै नाम रट लागी ॥ टेक ॥
प्रभु जी तुम चंदन हम पानी ।
जा की अँग अँग बास समानी ॥१॥
प्रभु जी तुम घन बन हम मोरा ।
जैसे चितवत चंद चकोरा ॥२॥
प्रभु जी तुम दीपक हम बाती ।
जा की जोति बरै दिन राती ॥३॥
प्रभु जी तुम मोती हम धागा ।
जैसे सोनहिं मिलत सुहागा ॥४॥
प्रभु जी तुम स्वामी हम दासा ।
ऐसी भक्ति करै रैदासा ॥५॥
(४)
साची प्रीति हम तुम सँग जोड़ी। तुम सँग जोड़ि अवर सँग तोड़ी १
जौ तुम बादर तो हम मोरा। जौ तुम चंद हम भये चकोरा २
जौ तुम दीवा तो हम बाती। जौ तुम तीरथ तो हम जात्री ३
जहाँ जाउँ तहँ तुम्हरी सेवा । तुम सा ठाकुर और न देवा ४
तुम्हरे भजन कटे भव फाँसा। भक्ति हेतु गावै रैदासा ॥५॥
॥ साधु ॥
आज दिवस¹ लेऊँ बलिहारा ।
मेरे गृह आया राम का प्यारा ॥ टेक ॥
आँगन बँगला भवन भयो पावन ।
हरिजन बैठे हरिजस गावन ॥ १ ॥
करूँ डंडवत चरन पखारूँ ।
तन मन धन उन ऊपरि वारूँ ॥ २ ॥
(१) दिन ।
रैदासजी ३५
कथा कहैं अरु अर्थ बिचारैं ।
आप तरैं औरन को तारैं ॥ ३ ॥
कह रैदास मिलैं निज दास ।
जनम जनम कै काटैं पास१ ॥ ४ ॥
॥ उपदेश ॥
परिचै राम रमै जो कोई। या रस परसे दुबिधि न होई ॥टेक
जे दीसे ते सकल बिनास । अनदीठे नाहीं बिसवास ॥१॥
बरन कहंत कहैं जे राम । सो भगता केवल निःकाम ॥२॥
फल कारन फूलै बनराई। उपजै फल तब पुहुप बिलाई ॥३
ज्ञानहिं कारन करम कराई। उपजै ज्ञान तो करम नसाई॥४
बट क बीज जैसा आकार । पसरयो तीन लोक पासार ॥५
जहाँ क उपजा तहाँ बिलाइ । सहज सुन्नि मैं रह्यो लुकाइ ६
जे मन बिंदै सोई बिंद । अमा२ समय ज्यौं दीसै चंद ॥७॥
जल मैं जैसे तूंबा तिरै । परिचै३ पिंड जीव नहिं मरै ॥८
सो मन कौन जो मन को खाइ। बिन छोरे तिरलोक समाइ ९
मन की महिमा सब कोइ कहै । पंडित सो जो अनतै रहै १०
कहरैदासयहपरमबैराग। रामनाम किन४ जपहु सभाग ११
घृत कारन दधि मथैं सयान। जीवन मुक्ति सदा निरबान ॥१२
(१) फाँसी । (२) अमावस । (३) परिचय हो जाने से पिंड का भेद जान ले
तो जीवन मुक्ति हो जाय । (४) क्यों न ।
सदनाजी
जीवन समय-पंद्रहवें शतक का पिछला हिस्सा। जाति और आश्रम—
कसाई, भेष।
यह यद्यपि जाति के कसाई थे। परंतु जीवहिंसा नहीं करते थे माँस इकट्ठा
मोल लेकर फुटकल बेचते थे, बटखरे की जगह शालग्राम की एक बटिया थी
उसी से तौला करते थे चाहे कोई पावभर ले चाहे पाँच सेर। एक दिन एक
वैष्णव ने उस बटिया में शालग्राम के पूरे आकार देखकर उन से माँगा उन्होंने
तुरंत देदिया। वैष्णव ने उसे घर पर लाकर और पंचामृत से स्नान करा कर
सिंहासन पर विराजमान किया और उत्तम भोग आगे घरे पर रात को उसे स्वप्न
हुआ कि हमें तू हमारे उसी परम भक्त के घर पहुँचादे जहाँ तराजू पर बैठ
कर हम को पालना भूलने का आनंद आता है। वैष्णव ने सदनाजी को सब हाल
आ सुनाया और बटिया लौटादी। सदनाजी ने उसी दिन से बैराग ले लिया
और उस बटिया को सिर पर धर कर जगन्नाथपुरी को चले गये। रास्ते में
एक स्त्री के मोहित होने और इन के साथ भाग निकलने के अभिप्राय से अपने
पति का सिर काट डालने और फिर सदनाजी के इनकार पर हाकिम के सामने
उन पर अपने पति के घात का झूठा दोष लगाने और सदनाजी के उस दोष को
स्वीकार कर लेने पर उनके दोनों हाथों के काटे जाने और जगन्नाथजी के
सम्मुख होते ही हाथ ज्यों के त्यों निकल आने की कथा भक्तमाल में लिखी है।
॥ विनय ॥
नृप कन्या के कारने, एक भयो भेष धारी।
कामारथी सुवारथी, वा की पैज¹ सँवारी ॥ १ ॥
तब गुन कहा जगत-गुरा, जो कर्म न नासै।
सिंह सरन कत जाइये, जो जंबुक² ग्रासै ॥ २ ॥
एक बूँद जल कारने, चातक दुख पावै।
प्रान गये सागर मिलै, पुनि काम न आवै ॥ ३ ॥
प्रान जो थाके थिर नहीं, कैसे बिरमावै।
बूड़ि मुए नौका मिलै, कहु काहि चढ़ावै ॥ ४ ॥
मैं नाहीं कछु हौँ नहीं, कछु आहि न मोरा।
औसर लज्जा राख लेहु, सदना जन तोरा ॥ ५ ॥
(१) प्रण। (२) स्यार।
धनी धर्म्मदास
जीवन समय—पंद्रहवेँ शतक के आख़िर हिस्से और सोलहवेँ शतक के
दर्मियान । जन्म स्थान—बांधोगढ़ । सतसंग स्थान—काशी । जाति और
आश्रम—कसौंधन बनिया, गृहस्थ । गुरू—कबीर साहिब ।
यह बड़े साहूकार थे पर कबीर साहिब की शरण मेँ आने के पीछे यह काशी
ही मेँ उन के चरनों मेँ रहे और उन के गुप्त होने पर उन की गद्दी पर बैठे । यह
और इन के बड़े बेटे चूड़ामणि जी दोनों प्रचंड भक्त हुए और पूरी संत गति को
प्राप्त हुए ।
॥ गुरुदेव ॥
(१)
बाजा बाजा रहित¹ का, पड़ा नगर मैं सोर ।
(मेरे) सतगुरु संत कबीर हैं, नजर न आवै और ॥१॥
भूमी पर पग धरत हैं, सुनौ संत मतधीर ।
माथ नाय बिनती करौं, दरसन देव कबीर ॥२॥
घाट बाट औघट महीं, मोहिं कबीर की आस ।
धर्मनि सुमिरै नाम गुरु, कभी न होय बिनास ॥३॥
(२)
गुरु मिले अगम के बासी ॥ टेक ॥
उनके चरन कमल चित दीजे, सतगुरु मिले अबिनासी १॥
उनकी सीत प्रसादी लीजे, छूटि जाय चौरासी ॥२॥
अमृत बुंद झरै घट भीतर, साध संत जन लासी² ॥३॥
धरमदास बिनवै कर जोरी, सार सबद मन बासी ॥४॥
॥ नाम महिमा ॥
हम सत्त नाम के बैपारी ॥ टेक ॥
कोइ कोइ लादै काँसा पीतल, कोइ कोइ लौंग सुपारी ।
हम तो लाद्यो नाम धनी को, पूरन खेप हमारी ॥१॥
(१) मुक्ति, उद्धार । (२) चाशनी ।
३८ धनी धर्म्मदास
पूँजी न टूटै नफा चौगुना, बनिज किया हम भारी ।
हाट जगाती रोक न सकिहै, निर्भय गैल हमारी ॥२॥
मोति बुंद घट ही मैं उपजै, सुकिरत अरत कोठारी१ ।
नाम पदारथ लाद चला है, धर्मदास वैपारी ॥३॥
॥ चितावनी ॥
(१)
सोहर
कहँवाँ से जिव आइल, कहँवाँ समाइल हो ।
कहँवाँ कइल मुकाम, कहाँ लपटाइल हो ॥ १ ॥
निरगुन से जिव आइल, सगुन समाइल हो ।
काया गढ़ कइल मुकाम, माया लपटाइल हो ॥ २ ॥
एक बुंद से काया महल, उठावल हो ।
बुंद परे गलि जाय, पाछे पछितावल हो ॥ ३ ॥
हंस कहै आई सरवर, हम उड़ि जाइब हो ।
मोर तोर इतन दिदार, बहुरि नहिँ पाइब हो ॥ ४ ॥
(२)
कहो केते दिन जियबौ हो, का करत गुमान ॥ टेक ॥
कच्चे बासन का पिंजरा हो, जा मैं पवन समान ।
पंछी का कौन भरोसा हो, छिन मैं उड़ि जान ॥१॥
कच्ची माटी कै घडुवा हो, रस बूँदन सान ।
पानी बीच बतासा हो, छिन मैं गलि जान ॥२॥
कागद की नइया बनी, डोरी साहिब हाथ ।
जौने नाच नचैहैं हो, नाचब वोहि नाच ॥३॥
धरमदास इक बनिया हो, करै झूठी बजार ।
साहिब कबीर बनिजारा हो, करैं सत बैपार ॥४॥
(१) भंडार ।
शब्द संग्रह ३६
॥ बिरह ॥
(१)
सतगुरु आवो हमरे देस, निहारौँ बाट खड़ी ॥ टेक ॥
वाहि देस की बतियाँ रे, लावैँ संत सुजान ।
उन संतन के चरन पखारौँ, तन मन करौँ कुरबान ॥१॥
वाहि देस की बतियाँ हम से, सतगुरु आन कही ।
आठ पहर के निरखत हमरे, नैन की नींद गई ॥ २ ॥
भूलि गई तन मन धन सारा, व्याकुल भया सरीर ।
बिरह पुकारै विरहनी, ढरकत नैनन नीर ॥ ३ ॥
धरमदास के दाता सतगुरु, पल मैं कियो निहाल ।
आवागवन की डोरी कटि गई, मिटे भरम जंजाल ॥४॥
(२)
कहौँ बुझाय दरद पिय तो से ॥ टेक ॥
दरद मिटै तरवार तीर से ।
किधौँ मिटै जब मिलहुँ पीव से ॥ १ ॥
तन तलफै हिय कछु न सुहाय ।
तोहि बिन पिय मो से रहल न जाय ॥ २ ॥
धरमदास की अरज गुसाईँ ।
साहिब कबीर रहौँ तुम छाँहौं ॥ ३ ॥
॥ प्रेम ॥
(१)
नैन दरस बिन मरत पियासा ॥ टेक ॥
तुमहीं छोड़ि भजूँ नहिँ औरै, नाहिँ दूसरी आसा ॥ १ ॥
आठो पहर रहूँ कर जोरी, करि लेहु आपन दासा ॥२॥
निसु बासर रहूँ लव लीना, बिनुदेखे नहिँ बिस्वासा ॥३॥
धरमदास बिनवै कर जोरी, द्यो निज लोक निवासा ॥४॥
४० धनी धर्म्मदास
(२)
साहिब चितवो हमरी ओर ॥ टेक ॥
हम चितवैं तुम चितवो नाहीं, तुम्हरा हृदय कठोर ॥१॥
औरन को तो और भरोसा, हमैँ भरोसा तोर ॥ २ ॥
सुखमनि सेज बिछावाँ गगन मैं, नित उठि करौं निहोर ॥३॥
धरमदास बिनवै कर जोरी, साहिब कबीर बंदी-छोर ॥४॥
(३)
हमरे का करै हाँसी लोग ॥ टेक ॥
मोरा मन लागा सतगुरु से, भला होय कै खोर¹ ।
जब से सतगुरु ज्ञान भयो है, चलै न केहु कै जोर ' ॥
मात रिसाई पिता रिसाई, रिसाय बटोहिया लोग ।
ज्ञान खड़ग तिरगुन को मारौँ, पाँच पचीसो चोर ॥२॥
अब तो मोहिँ ऐसी बनि आवै, सतगुरु रचा सँजोग ।
आवत साध बहुत सुख लागै, जात बियापै रोग ॥ ३ ॥
धरमदास बिनवै कर जोरी, सुनु हो बंदी-छोर ।
जा को पद तिरलोक से न्यारा, सो साहिब कस²होय ॥४॥
(४)
बधावा
सतगुरु आये घर, मन में बजत बधाइया ॥ टेक ॥
सतगुरु साहिब दीन-दयाला, द्वारे मोरे आइया ।
जुगन जुगन के करम मिटत भे, सतगुरु दरस दिखाइया ॥१
प्रेम सुरत की करी रसोई, व्यंजन³ आसन लाइया ।
जेंवन बैठे सतगुरु साहिब, अधर से चौंर डोलाइया ॥२॥
दया भाव के पलँग बिछाये, प्रेम दुलीचा लाइया ।
ता पर सोये सतगुरु साहिब, सुरति कै तेल लगाइया ॥३
(१) बुरा। (२) कैसा। (३) भोजन।
शब्द संग्रह ४१
धरमदास बिनवै कर जोरी, सुनिये समरथ साँइयाँ ।
साहिब कबीर प्रभु मिले विदेही, झीना दरस दिखाइया ॥४॥
(५)
होली
हमरी उमिरिया होरी खेलन की ।
पिय मो सैं मिलि के बिछुरि गयो हो ॥ १ ॥
पिय हमरे हम पिय की पियारी ।
पिय बिच अंतर परि गयो हो ॥ २ ॥
पिया मिलैं तब जियौं मोरी सजनी ।
पिय बिन जियरा निकरि गयो हो ॥ ३ ॥
इत गोकुल उत मथुरा नगरी ।
बीच डगर पिय मिलि गयो हो ॥ ४ ॥
धरमदास बिरहिन पिय पाये ।
चरन कँवल चित गहि रह्यो हो ॥ ५ ॥
॥ कपट भक्ति ॥
साहिब यहि विधि ना मिलै, चित चंचल भाई ॥ टेक ॥
माला तिलक उरझाइ कै, नाचै अरु गावै ।
अपना मरम जानै नहीं, औरन समुझावै ॥ १ ॥
देखे को बक ऊजला, मन मैला भाई ।
आँखि मूँदि मौनी भया, मछरी धरि खाई ॥ २ ॥
कपट कतरनी पेट मँ, मुख बचन उचारी ।
अंतर-गति साहिब लखै, उन कहा छिपाई ॥ ३ ॥
आदि अंत की बारता, सतगुरु से पावै ।
कह कबीर धर्मदास से, मूरख समझावो ॥ ४ ॥
६
४२ धनी धरमदास
॥ भेद ॥
झरि लागै महलिया, गगन गहराय ॥ टेक ॥
खन गरजै खन बिजुली चमकै ।
लहर उठै सोभा बरनि न जाय ॥ १ ॥
सुन्न महल से अमृत बरसै ।
प्रेम अनँद ह्वै साध नहाय ॥ २ ॥
खुली किवरिया मिटी अँधिरिया ।
धन सतगुरु जिन दिया है लखाय ॥ ३ ॥
धरमदास बिनवै कर जोरी ।
सतगुरु चरन मैं रहत समाय ॥ ४ ॥
॥ विनय ॥
(१)
गुरु पैयाँ लागौँ नाम लखा दीजो रे ॥ टेक ॥
जनम जनम का सोया मनुवाँ, सबदन मार जगादीजो रे ॥१
घट अँधियार नैन नहिँ सूझै, ज्ञान का दीप जगा दीजो रे २
बिष की लहर उठत घट अंतर, अमृत बूँद चुवा दीजो रे ॥३
गहिरी नदिया अगम बहै धरवा, खेय के पार लगा दीजो रे ४
धरमदास की अरज गुसाईँ, अब के खेप निभा दीजो रे ॥५॥
(२)
भक्ति दान गुरु दीजिये, देवन के देवा हो ।
चरन कँवल बिसरौँ नहीं, करिहौँ पद सेवा हो ॥ १ ॥
तीरथ ब्रत मैं ना करौँ, ना देवल पूजा हो ।
तुमहिँ ओर निरखत रहौँ, मेरे और न दूजा हो ॥ २ ॥
आठ सिद्धि नौ निधि हैं, बैकुंठ निवासा हो ।
सो मैं ना कछु माँगहूँ, मेरे समरथ दाता हो ॥ ३ ॥
सुख सम्पति परिवार धन, सुन्दर वर नारी हो ।
सुपनेहु इच्छा ना उठै, गुरु आन तुम्हारी हो ॥ ४ ॥
शब्द संग्रह ४३
धरमदास की बीनती, साहिब सुनि लीजै हो ।
दरस देहु पट खोलि कै, अपना करि लीजै हो ॥ ५ ॥
(३)
साहिब बूडत नाव अब मोरी ॥ टेक ॥
काम क्रोध की लहर उठतु है, मोह पवन झकझोरी ।
लोभ मोरे हिरदे घुमरतु है, सागर वार न पारी ॥ १ ॥
कपट की भँवर परतु है बहुतै, वा मैं बेड़ा अटको ।
फाँसी काल लिये है द्वारे, आया सरन तुम्हारी ॥ २ ॥
धरमदास पर दाया कीन्हो, काटि फंद जिव तारी ।
कहै कबीर सुनो हो धर्मन, सतगुरु सरन उबारी ॥ ३ ॥
(४)
चरन छाड़ि प्रभु जावँ कहाँ, मोरे और न कोई ।
जग मेँ आपन कोइ नहीं, देखा सब टोई ॥ १ ॥
मात पिता हित बंधु तुम, का से दुख रोई ।
सब कछु तुम्हरे हाथ है, तुम्हरै मुख जोही ॥ २ ॥
गुन तो मोरे है नहीं, औगुन बहुतेरे ।
ओट लई तुम नाम की, राखो पत सोई ॥ ३ ॥
सतगुरु तुम चीन्हे बिना, मति बुधि सब खोई ।
सब जीवन के एक तुम, दूजा नहिँ कोई ॥ ४ ॥
मैं गरजी अरजी करौँ, मरजी जस होई ।
अरज विपति लिखौँ आपनी, राखौँ नहिँ गोई¹ ॥ ५ ॥
धरमदास सत साहिबी, घट घटहिँ समाई ।
साहिब कबीर सतगुरु मिले, आवागवन न होई ॥ ६ ॥
(१) छिपी।
४४ धनी धरमदास
॥ मिश्रित ॥
(१)
मितऊ मड़ैया सूनी करि गैला ॥ टेक ॥
अपन बलम परदेस निकरि गैला।
हमरा के कछुवो न गुन दै गैला ॥ १ ॥
जोगिन होइ के मैं बन बन ढूँढ़ौं।
हमरा के बिरह वैराग दै गैला ॥ २ ॥
संग की सखी सब पार उतरि गैलीं।
हम धन ठाढ़ी अकेली रहि गैला ॥ ३ ॥
धरमदास यह अरज करतु है।
सार सबद सुमिरन दै गैला ॥ ४ ॥
(२)
मोरा पिया बसै कौने देस हो ॥ टेक ॥
अपने पिया के ढूँढ़न हम निकसी,
कोई न कहत सनेस हो ॥ १ ॥
पिय कारन हम भई हैं बावरी,
धर्यो जोगिनिया कै भेस हो ॥ २ ॥
ब्रह्मा बिस्नु महेस न जाने,
का जानै सारद सेस हो ॥ ३ ॥
धनि जो अगम अगोचर पइलन,
हम सब सहत कलेस हो ॥ ४ ॥
उहाँ कै हाल कबीर गुरु जानैँ,
आवत जात हमेस हो ॥ ५ ॥
(३)
गाँठ परी पिय बोले न हम से ॥ टेक ॥
माल मुलुक कछु संग न जैहै।
नाहक बैर कियो है जग से ॥ १ ॥
शब्द संग्रह ४५
जो मैं जनितिउँ पिया रिसियै है ।
नाहक प्रीति लगाती न जग से ॥ २ ॥
निसु वासर पिय सँग मैं सूतिउँ ।
नैन अलसानी निकरि गये घर से ॥ ३ ॥
जस पनिहारि घरे सिर गागर ।
सुरति न टरै बतरावत१ सब से ॥ ४ ॥
धरमदास बिनवै कर जोरी ।
साहिब कबीर को पावै सुभग२ से ॥ ५ ॥
(४)
कैसे आरत करौँ तिहारी। महा मलिन गति देँह हमारी ॥
मैलहिँ तेँ उपज्यो संसारा। मैं कैसे गुन गावौँ तुम्हारा ॥
झरना झरै दसो दिसिद्वारे।कस ढिग आवौँ साहिब तुम्हारे॥
जो प्रभु देहु अगर की देँही। तब होवौँ मैं सबद सनेही ॥
मलयागिरि मैं बसत भुवंगा । विष अमृत रहै एकै संगा ॥
तिनुका तोड़ दिया परवाना। तब हम पायौ पद निर्बाना ॥
धरमदास कबीर बल गाजै। गुरु परताप आरती साजै ॥
(१) बात चीत करती है । (२) अच्छे भाग ।
गुरु नानक
[ संक्षिप्त जीवन-चरित्र के लिये देखो पृष्ठ ६७ संतवानी संग्रह, भाग १ ]
(१)
राम सुमिर राम सुमिर एही तेरो काज है ॥टेक॥
माया को संग त्याग, हरि जू की सरन लाग ।
जगत सुख मान मिथ्या, झूठौ सब साज है ॥ १ ॥
सुपने ज्योँ धन पिछान, काहे पर करत मान ।
बारू की भीत तैसे, बसुधा को राज है ॥ २ ॥
नानक जन कहत बात, बिनसि जैहै तेरो गात ।
छिन छिन करि गयो काल्ह, तैसे जात आज है ॥ ३ ॥
(२)
इस दम दा मैनूँ की बे भरोसा,
आया आया न आया न आया ॥ १ ॥
सोच बिचार करै मत मन मैं,
जिस ने ढूँढा उसने पाया ॥ २ ॥
या संसार रैन दा सपना,
कहिँ दीखा कहिँ नाहिँ दिखाया ॥ ३ ॥
नानक भक्तन के पद परसे,
निस दिन राम चरन चित लाया ॥ ४ ॥
(३)
सब कछु जीवत को ब्यौहार ।
मात पिता भाई सुत बांधव, अरु पुनि गृह की नार ॥१॥
तन तैं प्रान होत जब न्यारे, टेरत प्रेत पुकार ।
आध घरी कोऊ नहिँ राखै, घर तैं देत निकार ॥२॥
शब्द संग्रह ४७
मृग-तृस्ना ज्यौँ जग रचना यह, देखो हृदे बिचार ।
कहु नानक भजु राम नाम नित, जा तैँ होत उधार ॥३॥
(४)
साधो यह तन मिथ्या जानो ।
या भीतर जो राम बसत है, साचो ताहि पिछानो ॥१॥
यह जग है संपति सुपने की, देख कहा ऐड़ानो ।
संग तिहारे कछू न चालै, ताहि कहा लपटानो ॥२॥
अस्तुति निंदा दोऊ परिहरि, हरि कीरति उर आनो ।
जन नानक सबही मैं पूरन, एक पुरुष भगवानो ॥३॥
(५)
चेतना है तो चेत ले, निसि दिन मैं प्रानी ।
छिन छिन अवधि बिहात है, फूटै घट ज्यौँ पानी ॥१॥
हरि गुन काहे न गावही, मूरख अज्ञाना ।
झूठे लालच लागि के, नहिँ मर्म पिछाना ॥२॥
अजहूँ कछु बिगरयो नहीं, जो प्रभु गुन गावै ।
कहु नानक तेहिँ भजन तैँ, निरभय पद पावै ॥३॥
॥ प्रेम ॥
(१)
हौँ कुरबाने जाउँ पियारे, हौँ कुरबाने जाउँ ॥टेक॥
हौँ कुरबाने जाउँ तिन्हाँ दे, लैन जो तेरा नाउँ ।
लैन जो तेरा नाउँ तिन्हाँ दे, हौँ सद कुरबाने जाउँ ॥१॥
काया रंगन जे थिये प्यारे, पाइये नाउँ मजीठ१ ।
रंगन वाला जे रँगे साहिब, ऐसा रंग न डीठ ॥२॥
जिन के चोलड़े रत्तड़े२ प्यारे, कंत तिन्हाँ के पास ।
धूड़३ तिन्हाँ की जे मिले जी को, नानक की अरदास ॥३॥
(१) काया तब रँगी जायगी जब नाम रूपी लाल रंग (त्रिकुटी के धनी का)
मिलै । (२) रँगे हुए । (३) धूल ।
४८ गुरु नानक
(२)
बिसरत नाहिं मन तैं हरी ।
अब यह प्रीति सदा प्रबल भइ, आन विषय जरी ॥१॥
बूँद कँहा तियागि चातक, मीन रहत न घरी ।
गुन गोपाल उचारत रसना, टेंव¹ एह परी ॥२॥
महा नाद कुरंग मोह्यो, बेध तीच्छन सरी ।
प्रभु चरन कमल रसाल नानक, गाँठ बाँधि परी ॥३॥
(३)
गोबिंद जी तूँ मेरे प्रान-अधार ।
साजन मीत सहाई तुम्हीं, तूँ मेरो परिवार ॥
कर बिसाल धार्यो मेरे माथे, साधु संग गुन गाये ।
तुम्हरी कृपा तैं सब फल पाये, रसिक नाम धियाये ॥२॥
अबिचल नींव धराई सतगुरु, कबहूँ डोलत नाहीं ।
गुर नानक जब भये दयाला, सर्व सुखाँ निधि पाहीं ॥३॥
(४)
प्रभु जी तूँ मेरे प्रान-अधारे ।
नमसकार डँडौत बंदना, अनिक वार जाऊँ बलिहारे ॥१॥
ऊठत बैठत सोवत जागत, इहु मन तुम्हे चितारे ।
सूख दूख इस मन की बिरथा, तुम्ह ही आगे सारे ॥२॥
तूँ मेरी ओट बल बुधि धन तुम्हीं, तुम्हिं मेरे परिवारे ।
जो तुम करो सोई भल हमरे, पेख नानक सुख चरना रे॥३॥
॥ घट मठ ॥
(१)
मुरसिद मेरा महरमी, जिनं मरम बताया ।
दिल अंदर दीदार है, खोजा तिन पाया ॥ १ ॥
(१) आदत ।
शब्द संग्रह ४६
तसब्री एक अजूब है, जा मैं हर दम दाना ।
कुंज किनारे बैठि के, फेरा तिन्ह जाना ॥ २ ॥
क्या बकरी क्या गाय है, क्या अपने जाया ।
सब को लोहू एक है, साहिब फरमाया ॥ ३ ॥
पीर पैगंबर औलिया, सब मरने आया ।
नाहक जीव न मारिये, पोषन को काया ॥ ४ ॥
हिरिस हिये हैवान है, बसि करिले आई ।
दाद¹ इलाही नानका, जिसे देवे खुदाई ॥ ५ ॥
(२)
काहे रे बन खोजन जाई ।
सर्व निवासी सदा अलेपा, तोही संग समाई ॥ १ ॥
पुष्प मध्य ज्यौं बास बसत है, मुकर माहिं जस छाँईँ ।
तैसेही हरि बसै निरंतर, घट ही खोजो भाई ॥ २ ॥
बाहर भीतर एकै जानो, यह गुरु ज्ञान बताई ।
जन नानक बिन आपा चीन्हे, मिटै न भ्रम की काई ॥३।
॥ विनय ॥
(१)
प्रब² मेरे प्रीतम प्रान पियारे ।
प्रेम भक्ति निज नाम दीजिये, द्याल अनुग्रह धारे ॥१॥
सुमिरौं चरन तिहारे प्रीतम, रिदे तिहारी आसा ।
संत जनाँ पै करौं बेनती, मन दरसन को प्यासा ॥ २ ॥
बिछुरत मरन जीवन हरि मिलते, जन को दरसन दीजै ।
नाम अधार जीवन धन नानक, प्रब मेरे किरपा कीजै ॥३॥
(२)
माई मैं केहि बिधि लखौं गुसाईं ।
महा मोह अज्ञान तिमिर मैं, मन रहियो उरझाई ॥१॥
(१) दात, बख़्शिश । (२) प्रभु ।
७
५० गुरु नानक
सकल जनम भ्रम ही भ्रम खोयो, नहिँ इस्थिर मति . ई ।
बिषयासक्त रह्यो निसि बासर, नहिँ छूटी अधमाई ॥२॥
साधु संग कबहुँ नहिँ कीन्हा, नहिँ कीरति प्रभ¹ गाई ।
जन नानक मैं नाहीँ कोउ गुन, राखि लेहु सरनाई ॥३॥
(३)
प्रभ जी यही मनोरथ मेरा ।
कृपा-निधान दयाल मोहिँ दीजै, करि संतन का चेरा ॥१॥
प्रात काल लागौँ जन चरनी, निसि बासर दरसन पावौँ ।
तन मन अरप करौँ जन सेवा, रसना हरि गुन ⸴ ⸴" ॥२॥
साँस साँस सुमिरौँ प्रभु अपना, संत संग नित रहिये ।
एक अधार नाम धन मेरा, आनंद नानक यह लहिये ॥३॥
(४)
अब हम चली ठाकुर पहिँ हार ।
जब हम सरन प्रभू की आईँ, राख प्रभु भावै मार ॥१॥
लोगन की चतुराई उपमा, ते