संतबानी संग्रह (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर, दादू, तुलसी, पलटू आदि प्रमुख संतों की वाणी)
Santbani Sangrah: Belvedere Steam Printing Press Allahabad
महामहोपाध्याय पं. सुधाकर द्विवेदी एवं बेलवेडियर प्रेस द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४४ धनी धरमदास
॥ मिश्रित ॥
(१)
मितऊ मड़ैया सूनी करि गैला ॥ टेक ॥
अपन बलम परदेस निकरि गैला।
हमरा के कछुवो न गुन दै गैला ॥ १ ॥
जोगिन होइ के मैं बन बन ढूँढ़ौं।
हमरा के बिरह वैराग दै गैला ॥ २ ॥
संग की सखी सब पार उतरि गैलीं।
हम धन ठाढ़ी अकेली रहि गैला ॥ ३ ॥
धरमदास यह अरज करतु है।
सार सबद सुमिरन दै गैला ॥ ४ ॥
(२)
मोरा पिया बसै कौने देस हो ॥ टेक ॥
अपने पिया के ढूँढ़न हम निकसी,
कोई न कहत सनेस हो ॥ १ ॥
पिय कारन हम भई हैं बावरी,
धर्यो जोगिनिया कै भेस हो ॥ २ ॥
ब्रह्मा बिस्नु महेस न जाने,
का जानै सारद सेस हो ॥ ३ ॥
धनि जो अगम अगोचर पइलन,
हम सब सहत कलेस हो ॥ ४ ॥
उहाँ कै हाल कबीर गुरु जानैँ,
आवत जात हमेस हो ॥ ५ ॥
(३)
गाँठ परी पिय बोले न हम से ॥ टेक ॥
माल मुलुक कछु संग न जैहै।
नाहक बैर कियो है जग से ॥ १ ॥