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सर्वकोश
संतबानी संग्रह (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर, दादू, तुलसी, पलटू आदि प्रमुख संतों की वाणी)

संतबानी संग्रह (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर, दादू, तुलसी, पलटू आदि प्रमुख संतों की वाणी)

Santbani Sangrah: Belvedere Steam Printing Press Allahabad

महामहोपाध्याय पं. सुधाकर द्विवेदी एवं बेलवेडियर प्रेस द्वारा

DevanagariHindipublished267 पृष्ठ

पृष्ठ 48, कुल 267 में से

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पृष्ठ 48

शब्द संग्रह ३६
॥ बिरह ॥
(१)
सतगुरु आवो हमरे देस, निहारौँ बाट खड़ी ॥ टेक ॥
वाहि देस की बतियाँ रे, लावैँ संत सुजान ।
उन संतन के चरन पखारौँ, तन मन करौँ कुरबान ॥१॥
वाहि देस की बतियाँ हम से, सतगुरु आन कही ।
आठ पहर के निरखत हमरे, नैन की नींद गई ॥ २ ॥
भूलि गई तन मन धन सारा, व्याकुल भया सरीर ।
बिरह पुकारै विरहनी, ढरकत नैनन नीर ॥ ३ ॥
धरमदास के दाता सतगुरु, पल मैं कियो निहाल ।
आवागवन की डोरी कटि गई, मिटे भरम जंजाल ॥४॥
(२)
कहौँ बुझाय दरद पिय तो से ॥ टेक ॥
दरद मिटै तरवार तीर से ।
किधौँ मिटै जब मिलहुँ पीव से ॥ १ ॥
तन तलफै हिय कछु न सुहाय ।
तोहि बिन पिय मो से रहल न जाय ॥ २ ॥
धरमदास की अरज गुसाईँ ।
साहिब कबीर रहौँ तुम छाँहौं ॥ ३ ॥
॥ प्रेम ॥
(१)
नैन दरस बिन मरत पियासा ॥ टेक ॥
तुमहीं छोड़ि भजूँ नहिँ औरै, नाहिँ दूसरी आसा ॥ १ ॥
आठो पहर रहूँ कर जोरी, करि लेहु आपन दासा ॥२॥
निसु बासर रहूँ लव लीना, बिनुदेखे नहिँ बिस्वासा ॥३॥
धरमदास बिनवै कर जोरी, द्यो निज लोक निवासा ॥४॥