संतबानी संग्रह (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर, दादू, तुलसी, पलटू आदि प्रमुख संतों की वाणी)
Santbani Sangrah: Belvedere Steam Printing Press Allahabad
महामहोपाध्याय पं. सुधाकर द्विवेदी एवं बेलवेडियर प्रेस द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४० धनी धर्म्मदास
(२)
साहिब चितवो हमरी ओर ॥ टेक ॥
हम चितवैं तुम चितवो नाहीं, तुम्हरा हृदय कठोर ॥१॥
औरन को तो और भरोसा, हमैँ भरोसा तोर ॥ २ ॥
सुखमनि सेज बिछावाँ गगन मैं, नित उठि करौं निहोर ॥३॥
धरमदास बिनवै कर जोरी, साहिब कबीर बंदी-छोर ॥४॥
(३)
हमरे का करै हाँसी लोग ॥ टेक ॥
मोरा मन लागा सतगुरु से, भला होय कै खोर¹ ।
जब से सतगुरु ज्ञान भयो है, चलै न केहु कै जोर ' ॥
मात रिसाई पिता रिसाई, रिसाय बटोहिया लोग ।
ज्ञान खड़ग तिरगुन को मारौँ, पाँच पचीसो चोर ॥२॥
अब तो मोहिँ ऐसी बनि आवै, सतगुरु रचा सँजोग ।
आवत साध बहुत सुख लागै, जात बियापै रोग ॥ ३ ॥
धरमदास बिनवै कर जोरी, सुनु हो बंदी-छोर ।
जा को पद तिरलोक से न्यारा, सो साहिब कस²होय ॥४॥
(४)
बधावा
सतगुरु आये घर, मन में बजत बधाइया ॥ टेक ॥
सतगुरु साहिब दीन-दयाला, द्वारे मोरे आइया ।
जुगन जुगन के करम मिटत भे, सतगुरु दरस दिखाइया ॥१
प्रेम सुरत की करी रसोई, व्यंजन³ आसन लाइया ।
जेंवन बैठे सतगुरु साहिब, अधर से चौंर डोलाइया ॥२॥
दया भाव के पलँग बिछाये, प्रेम दुलीचा लाइया ।
ता पर सोये सतगुरु साहिब, सुरति कै तेल लगाइया ॥३
(१) बुरा। (२) कैसा। (३) भोजन।