संतबानी संग्रह (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर, दादू, तुलसी, पलटू आदि प्रमुख संतों की वाणी)
Santbani Sangrah: Belvedere Steam Printing Press Allahabad
महामहोपाध्याय पं. सुधाकर द्विवेदी एवं बेलवेडियर प्रेस द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४८ गुरु नानक
(२)
बिसरत नाहिं मन तैं हरी ।
अब यह प्रीति सदा प्रबल भइ, आन विषय जरी ॥१॥
बूँद कँहा तियागि चातक, मीन रहत न घरी ।
गुन गोपाल उचारत रसना, टेंव¹ एह परी ॥२॥
महा नाद कुरंग मोह्यो, बेध तीच्छन सरी ।
प्रभु चरन कमल रसाल नानक, गाँठ बाँधि परी ॥३॥
(३)
गोबिंद जी तूँ मेरे प्रान-अधार ।
साजन मीत सहाई तुम्हीं, तूँ मेरो परिवार ॥
कर बिसाल धार्यो मेरे माथे, साधु संग गुन गाये ।
तुम्हरी कृपा तैं सब फल पाये, रसिक नाम धियाये ॥२॥
अबिचल नींव धराई सतगुरु, कबहूँ डोलत नाहीं ।
गुर नानक जब भये दयाला, सर्व सुखाँ निधि पाहीं ॥३॥
(४)
प्रभु जी तूँ मेरे प्रान-अधारे ।
नमसकार डँडौत बंदना, अनिक वार जाऊँ बलिहारे ॥१॥
ऊठत बैठत सोवत जागत, इहु मन तुम्हे चितारे ।
सूख दूख इस मन की बिरथा, तुम्ह ही आगे सारे ॥२॥
तूँ मेरी ओट बल बुधि धन तुम्हीं, तुम्हिं मेरे परिवारे ।
जो तुम करो सोई भल हमरे, पेख नानक सुख चरना रे॥३॥
॥ घट मठ ॥
(१)
मुरसिद मेरा महरमी, जिनं मरम बताया ।
दिल अंदर दीदार है, खोजा तिन पाया ॥ १ ॥
(१) आदत ।