संतबानी संग्रह (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर, दादू, तुलसी, पलटू आदि प्रमुख संतों की वाणी)
Santbani Sangrah: Belvedere Steam Printing Press Allahabad
महामहोपाध्याय पं. सुधाकर द्विवेदी एवं बेलवेडियर प्रेस द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंरैदासजी ३५
कथा कहैं अरु अर्थ बिचारैं ।
आप तरैं औरन को तारैं ॥ ३ ॥
कह रैदास मिलैं निज दास ।
जनम जनम कै काटैं पास१ ॥ ४ ॥
॥ उपदेश ॥
परिचै राम रमै जो कोई। या रस परसे दुबिधि न होई ॥टेक
जे दीसे ते सकल बिनास । अनदीठे नाहीं बिसवास ॥१॥
बरन कहंत कहैं जे राम । सो भगता केवल निःकाम ॥२॥
फल कारन फूलै बनराई। उपजै फल तब पुहुप बिलाई ॥३
ज्ञानहिं कारन करम कराई। उपजै ज्ञान तो करम नसाई॥४
बट क बीज जैसा आकार । पसरयो तीन लोक पासार ॥५
जहाँ क उपजा तहाँ बिलाइ । सहज सुन्नि मैं रह्यो लुकाइ ६
जे मन बिंदै सोई बिंद । अमा२ समय ज्यौं दीसै चंद ॥७॥
जल मैं जैसे तूंबा तिरै । परिचै३ पिंड जीव नहिं मरै ॥८
सो मन कौन जो मन को खाइ। बिन छोरे तिरलोक समाइ ९
मन की महिमा सब कोइ कहै । पंडित सो जो अनतै रहै १०
कहरैदासयहपरमबैराग। रामनाम किन४ जपहु सभाग ११
घृत कारन दधि मथैं सयान। जीवन मुक्ति सदा निरबान ॥१२
(१) फाँसी । (२) अमावस । (३) परिचय हो जाने से पिंड का भेद जान ले
तो जीवन मुक्ति हो जाय । (४) क्यों न ।