संतबानी संग्रह (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर, दादू, तुलसी, पलटू आदि प्रमुख संतों की वाणी)
Santbani Sangrah: Belvedere Steam Printing Press Allahabad
महामहोपाध्याय पं. सुधाकर द्विवेदी एवं बेलवेडियर प्रेस द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३८ धनी धर्म्मदास
पूँजी न टूटै नफा चौगुना, बनिज किया हम भारी ।
हाट जगाती रोक न सकिहै, निर्भय गैल हमारी ॥२॥
मोति बुंद घट ही मैं उपजै, सुकिरत अरत कोठारी१ ।
नाम पदारथ लाद चला है, धर्मदास वैपारी ॥३॥
॥ चितावनी ॥
(१)
सोहर
कहँवाँ से जिव आइल, कहँवाँ समाइल हो ।
कहँवाँ कइल मुकाम, कहाँ लपटाइल हो ॥ १ ॥
निरगुन से जिव आइल, सगुन समाइल हो ।
काया गढ़ कइल मुकाम, माया लपटाइल हो ॥ २ ॥
एक बुंद से काया महल, उठावल हो ।
बुंद परे गलि जाय, पाछे पछितावल हो ॥ ३ ॥
हंस कहै आई सरवर, हम उड़ि जाइब हो ।
मोर तोर इतन दिदार, बहुरि नहिँ पाइब हो ॥ ४ ॥
(२)
कहो केते दिन जियबौ हो, का करत गुमान ॥ टेक ॥
कच्चे बासन का पिंजरा हो, जा मैं पवन समान ।
पंछी का कौन भरोसा हो, छिन मैं उड़ि जान ॥१॥
कच्ची माटी कै घडुवा हो, रस बूँदन सान ।
पानी बीच बतासा हो, छिन मैं गलि जान ॥२॥
कागद की नइया बनी, डोरी साहिब हाथ ।
जौने नाच नचैहैं हो, नाचब वोहि नाच ॥३॥
धरमदास इक बनिया हो, करै झूठी बजार ।
साहिब कबीर बनिजारा हो, करैं सत बैपार ॥४॥
(१) भंडार ।