संतबानी संग्रह (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर, दादू, तुलसी, पलटू आदि प्रमुख संतों की वाणी)
Santbani Sangrah: Belvedere Steam Printing Press Allahabad
महामहोपाध्याय पं. सुधाकर द्विवेदी एवं बेलवेडियर प्रेस द्वारा
पृष्ठ 46, कुल 267 में से
संदर्भ में पढ़ेंधनी धर्म्मदास
जीवन समय—पंद्रहवेँ शतक के आख़िर हिस्से और सोलहवेँ शतक के
दर्मियान । जन्म स्थान—बांधोगढ़ । सतसंग स्थान—काशी । जाति और
आश्रम—कसौंधन बनिया, गृहस्थ । गुरू—कबीर साहिब ।
यह बड़े साहूकार थे पर कबीर साहिब की शरण मेँ आने के पीछे यह काशी
ही मेँ उन के चरनों मेँ रहे और उन के गुप्त होने पर उन की गद्दी पर बैठे । यह
और इन के बड़े बेटे चूड़ामणि जी दोनों प्रचंड भक्त हुए और पूरी संत गति को
प्राप्त हुए ।
॥ गुरुदेव ॥
(१)
बाजा बाजा रहित¹ का, पड़ा नगर मैं सोर ।
(मेरे) सतगुरु संत कबीर हैं, नजर न आवै और ॥१॥
भूमी पर पग धरत हैं, सुनौ संत मतधीर ।
माथ नाय बिनती करौं, दरसन देव कबीर ॥२॥
घाट बाट औघट महीं, मोहिं कबीर की आस ।
धर्मनि सुमिरै नाम गुरु, कभी न होय बिनास ॥३॥
(२)
गुरु मिले अगम के बासी ॥ टेक ॥
उनके चरन कमल चित दीजे, सतगुरु मिले अबिनासी १॥
उनकी सीत प्रसादी लीजे, छूटि जाय चौरासी ॥२॥
अमृत बुंद झरै घट भीतर, साध संत जन लासी² ॥३॥
धरमदास बिनवै कर जोरी, सार सबद मन बासी ॥४॥
॥ नाम महिमा ॥
हम सत्त नाम के बैपारी ॥ टेक ॥
कोइ कोइ लादै काँसा पीतल, कोइ कोइ लौंग सुपारी ।
हम तो लाद्यो नाम धनी को, पूरन खेप हमारी ॥१॥
(१) मुक्ति, उद्धार । (२) चाशनी ।