संतबानी संग्रह (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर, दादू, तुलसी, पलटू आदि प्रमुख संतों की वाणी)
Santbani Sangrah: Belvedere Steam Printing Press Allahabad
महामहोपाध्याय पं. सुधाकर द्विवेदी एवं बेलवेडियर प्रेस द्वारा
पृष्ठ 40, कुल 267 में से
संदर्भ में पढ़ेंनामदेवजी ३१
॥ भेद ॥
एक अनेक बियापक पूरक, जित देखौँ तित सोई ।
माया चित्र विचित्र बिमोहत, बिरला बूझै कोई ॥१॥
सब गोबिंद है सब गोबिंद है, गोबिंद बिन नहिँ कोई ।
सूत एक मनि सत्तसहस जस, ओत पोत प्रभु सोई ॥२॥
जल-तरंग अरु फेन बुदबुदा, जल तैँ भिन्न न होई ।
यह प्रपंच परब्रह्म की लीला, बिचरत आन न होई ॥३॥
मिथ्या भ्रम अरु स्वपन मनोरथ, सत्य पदारथ जाना ।
सुकिरत मनसा गुरु उपदेसी, जागत ही मन माना ॥४॥
कहत नामदेव हरि की रचना, देखो हृदय बिचारी ।
घट घट अंतर सर्व निरंतर, केवल एक मुरारी ॥५॥
॥ उपदेश ॥
(१)
परधन परदारा परिहरी१। ता के निकट बसहि नरहरी२ १
जो न भजंते नारायना । तिन का मैं न करौँ दर्सना ॥२॥
जिन के भीतर है अन्तरा । जैसे पसु तैसे वह नरा ॥३॥
प्रनवत नामदेव नाकहिँ बिना। ना सोहै बत्तीस लच्छना३॥४
(२)
काहे मन बिपना बन जाय । भूलो रे ठगमूरी४ खाय ॥१
जैसे मीन पानी मैं रहै। काल जाल की सुधि नहिँ लहै ॥२
जिभ्या स्वादी लीलत लोह। ऐसे कनिक कामिनी मोह ॥३॥
ज्यौँ मधुमाखी संचि अपार। मधु५ लीन्हो मुख दीन्हो छार४
गऊं बाछ को संचै छीर। गला बाँधि दुहि लेहि अहीर ॥५॥
(१) त्याग करै । (२) नरसिंह अर्थात ईश्वर । (३) आभरन, भूषन । (४) ठगाई,
धोखा । (५) मधुआ चिड़िया जो मधुमक्खी के बटोरे हुए शहद को खा जाती है ।