संतबानी संग्रह (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर, दादू, तुलसी, पलटू आदि प्रमुख संतों की वाणी)
Santbani Sangrah: Belvedere Steam Printing Press Allahabad
महामहोपाध्याय पं. सुधाकर द्विवेदी एवं बेलवेडियर प्रेस द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४२ धनी धरमदास
॥ भेद ॥
झरि लागै महलिया, गगन गहराय ॥ टेक ॥
खन गरजै खन बिजुली चमकै ।
लहर उठै सोभा बरनि न जाय ॥ १ ॥
सुन्न महल से अमृत बरसै ।
प्रेम अनँद ह्वै साध नहाय ॥ २ ॥
खुली किवरिया मिटी अँधिरिया ।
धन सतगुरु जिन दिया है लखाय ॥ ३ ॥
धरमदास बिनवै कर जोरी ।
सतगुरु चरन मैं रहत समाय ॥ ४ ॥
॥ विनय ॥
(१)
गुरु पैयाँ लागौँ नाम लखा दीजो रे ॥ टेक ॥
जनम जनम का सोया मनुवाँ, सबदन मार जगादीजो रे ॥१
घट अँधियार नैन नहिँ सूझै, ज्ञान का दीप जगा दीजो रे २
बिष की लहर उठत घट अंतर, अमृत बूँद चुवा दीजो रे ॥३
गहिरी नदिया अगम बहै धरवा, खेय के पार लगा दीजो रे ४
धरमदास की अरज गुसाईँ, अब के खेप निभा दीजो रे ॥५॥
(२)
भक्ति दान गुरु दीजिये, देवन के देवा हो ।
चरन कँवल बिसरौँ नहीं, करिहौँ पद सेवा हो ॥ १ ॥
तीरथ ब्रत मैं ना करौँ, ना देवल पूजा हो ।
तुमहिँ ओर निरखत रहौँ, मेरे और न दूजा हो ॥ २ ॥
आठ सिद्धि नौ निधि हैं, बैकुंठ निवासा हो ।
सो मैं ना कछु माँगहूँ, मेरे समरथ दाता हो ॥ ३ ॥
सुख सम्पति परिवार धन, सुन्दर वर नारी हो ।
सुपनेहु इच्छा ना उठै, गुरु आन तुम्हारी हो ॥ ४ ॥