संतबानी संग्रह (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर, दादू, तुलसी, पलटू आदि प्रमुख संतों की वाणी)
Santbani Sangrah: Belvedere Steam Printing Press Allahabad
महामहोपाध्याय पं. सुधाकर द्विवेदी एवं बेलवेडियर प्रेस द्वारा
पृष्ठ 45, कुल 267 में से
संदर्भ में पढ़ेंसदनाजी
जीवन समय-पंद्रहवें शतक का पिछला हिस्सा। जाति और आश्रम—
कसाई, भेष।
यह यद्यपि जाति के कसाई थे। परंतु जीवहिंसा नहीं करते थे माँस इकट्ठा
मोल लेकर फुटकल बेचते थे, बटखरे की जगह शालग्राम की एक बटिया थी
उसी से तौला करते थे चाहे कोई पावभर ले चाहे पाँच सेर। एक दिन एक
वैष्णव ने उस बटिया में शालग्राम के पूरे आकार देखकर उन से माँगा उन्होंने
तुरंत देदिया। वैष्णव ने उसे घर पर लाकर और पंचामृत से स्नान करा कर
सिंहासन पर विराजमान किया और उत्तम भोग आगे घरे पर रात को उसे स्वप्न
हुआ कि हमें तू हमारे उसी परम भक्त के घर पहुँचादे जहाँ तराजू पर बैठ
कर हम को पालना भूलने का आनंद आता है। वैष्णव ने सदनाजी को सब हाल
आ सुनाया और बटिया लौटादी। सदनाजी ने उसी दिन से बैराग ले लिया
और उस बटिया को सिर पर धर कर जगन्नाथपुरी को चले गये। रास्ते में
एक स्त्री के मोहित होने और इन के साथ भाग निकलने के अभिप्राय से अपने
पति का सिर काट डालने और फिर सदनाजी के इनकार पर हाकिम के सामने
उन पर अपने पति के घात का झूठा दोष लगाने और सदनाजी के उस दोष को
स्वीकार कर लेने पर उनके दोनों हाथों के काटे जाने और जगन्नाथजी के
सम्मुख होते ही हाथ ज्यों के त्यों निकल आने की कथा भक्तमाल में लिखी है।
॥ विनय ॥
नृप कन्या के कारने, एक भयो भेष धारी।
कामारथी सुवारथी, वा की पैज¹ सँवारी ॥ १ ॥
तब गुन कहा जगत-गुरा, जो कर्म न नासै।
सिंह सरन कत जाइये, जो जंबुक² ग्रासै ॥ २ ॥
एक बूँद जल कारने, चातक दुख पावै।
प्रान गये सागर मिलै, पुनि काम न आवै ॥ ३ ॥
प्रान जो थाके थिर नहीं, कैसे बिरमावै।
बूड़ि मुए नौका मिलै, कहु काहि चढ़ावै ॥ ४ ॥
मैं नाहीं कछु हौँ नहीं, कछु आहि न मोरा।
औसर लज्जा राख लेहु, सदना जन तोरा ॥ ५ ॥
(१) प्रण। (२) स्यार।