संतबानी संग्रह (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर, दादू, तुलसी, पलटू आदि प्रमुख संतों की वाणी)
Santbani Sangrah: Belvedere Steam Printing Press Allahabad
महामहोपाध्याय पं. सुधाकर द्विवेदी एवं बेलवेडियर प्रेस द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंशब्द संग्रह ४७
मृग-तृस्ना ज्यौँ जग रचना यह, देखो हृदे बिचार ।
कहु नानक भजु राम नाम नित, जा तैँ होत उधार ॥३॥
(४)
साधो यह तन मिथ्या जानो ।
या भीतर जो राम बसत है, साचो ताहि पिछानो ॥१॥
यह जग है संपति सुपने की, देख कहा ऐड़ानो ।
संग तिहारे कछू न चालै, ताहि कहा लपटानो ॥२॥
अस्तुति निंदा दोऊ परिहरि, हरि कीरति उर आनो ।
जन नानक सबही मैं पूरन, एक पुरुष भगवानो ॥३॥
(५)
चेतना है तो चेत ले, निसि दिन मैं प्रानी ।
छिन छिन अवधि बिहात है, फूटै घट ज्यौँ पानी ॥१॥
हरि गुन काहे न गावही, मूरख अज्ञाना ।
झूठे लालच लागि के, नहिँ मर्म पिछाना ॥२॥
अजहूँ कछु बिगरयो नहीं, जो प्रभु गुन गावै ।
कहु नानक तेहिँ भजन तैँ, निरभय पद पावै ॥३॥
॥ प्रेम ॥
(१)
हौँ कुरबाने जाउँ पियारे, हौँ कुरबाने जाउँ ॥टेक॥
हौँ कुरबाने जाउँ तिन्हाँ दे, लैन जो तेरा नाउँ ।
लैन जो तेरा नाउँ तिन्हाँ दे, हौँ सद कुरबाने जाउँ ॥१॥
काया रंगन जे थिये प्यारे, पाइये नाउँ मजीठ१ ।
रंगन वाला जे रँगे साहिब, ऐसा रंग न डीठ ॥२॥
जिन के चोलड़े रत्तड़े२ प्यारे, कंत तिन्हाँ के पास ।
धूड़३ तिन्हाँ की जे मिले जी को, नानक की अरदास ॥३॥
(१) काया तब रँगी जायगी जब नाम रूपी लाल रंग (त्रिकुटी के धनी का)
मिलै । (२) रँगे हुए । (३) धूल ।