संतबानी संग्रह (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर, दादू, तुलसी, पलटू आदि प्रमुख संतों की वाणी)
Santbani Sangrah: Belvedere Steam Printing Press Allahabad
महामहोपाध्याय पं. सुधाकर द्विवेदी एवं बेलवेडियर प्रेस द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंशब्द संग्रह ४३
धरमदास की बीनती, साहिब सुनि लीजै हो ।
दरस देहु पट खोलि कै, अपना करि लीजै हो ॥ ५ ॥
(३)
साहिब बूडत नाव अब मोरी ॥ टेक ॥
काम क्रोध की लहर उठतु है, मोह पवन झकझोरी ।
लोभ मोरे हिरदे घुमरतु है, सागर वार न पारी ॥ १ ॥
कपट की भँवर परतु है बहुतै, वा मैं बेड़ा अटको ।
फाँसी काल लिये है द्वारे, आया सरन तुम्हारी ॥ २ ॥
धरमदास पर दाया कीन्हो, काटि फंद जिव तारी ।
कहै कबीर सुनो हो धर्मन, सतगुरु सरन उबारी ॥ ३ ॥
(४)
चरन छाड़ि प्रभु जावँ कहाँ, मोरे और न कोई ।
जग मेँ आपन कोइ नहीं, देखा सब टोई ॥ १ ॥
मात पिता हित बंधु तुम, का से दुख रोई ।
सब कछु तुम्हरे हाथ है, तुम्हरै मुख जोही ॥ २ ॥
गुन तो मोरे है नहीं, औगुन बहुतेरे ।
ओट लई तुम नाम की, राखो पत सोई ॥ ३ ॥
सतगुरु तुम चीन्हे बिना, मति बुधि सब खोई ।
सब जीवन के एक तुम, दूजा नहिँ कोई ॥ ४ ॥
मैं गरजी अरजी करौँ, मरजी जस होई ।
अरज विपति लिखौँ आपनी, राखौँ नहिँ गोई¹ ॥ ५ ॥
धरमदास सत साहिबी, घट घटहिँ समाई ।
साहिब कबीर सतगुरु मिले, आवागवन न होई ॥ ६ ॥
(१) छिपी।